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1901 से मौजूद पैतृक मकान की मरम्मत पर विवाद, एएसआई की कार्रवाई सही या ग़लत ?
पुराने भवन के संरक्षण को बताया गया नया निर्माण, मौलाना अली अब्बास ने पुरातत्व विभाग को सौंपा विस्तृत प्रतिवेदन
ज़की भारतीय
लखनऊ। सआदतगंज क्षेत्र स्थित दरगाह हज़रत अब्बास (अ.स.) के निकट भवन संख्या 390/96 को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गया है। भवन स्वामी एवं शिया धर्मगुरु मौलाना अली अब्बास ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को विस्तृत प्रार्थना पत्र देकर दावा किया है कि जिस भवन को लेकर लगातार शिकायतें की जा रही हैं, वह कोई नया निर्माण नहीं बल्कि वर्ष 1901 से अस्तित्व में चला आ रहा पैतृक मकान है और वर्तमान में वहां केवल आवश्यक मरम्मत एवं संरक्षण कार्य किया जा रहा है।
मामले को लेकर बीते कई दिनों से विभिन्न स्तरों पर शिकायतें की जा रही थीं। कुछ लोगों द्वारा आरोप लगाया गया कि संरक्षित स्मारक के निकट अवैध निर्माण कराया जा रहा है, जबकि भवन स्वामी का कहना है कि यह आरोप तथ्यों से परे हैं और उनके पुराने मकान की मरम्मत को जानबूझकर नया निर्माण बताने का प्रयास किया जा रहा है। मौलाना अली अब्बास के अनुसार उक्त भवन उनके पूर्वजों की संपत्ति है तथा उपलब्ध अभिलेखों में इसका उल्लेख वर्ष 1901 से मिलता है। उनका कहना है कि जिस समय दरगाह हज़रत अब्बास (अ.स.) को संरक्षित स्मारक घोषित किया गया, उससे पहले से यह भवन वहां मौजूद था। इसी आधार पर उन्होंने पुरातत्व विभाग से मांग की है कि किसी भी निर्णय से पहले ऐतिहासिक अभिलेखों, रजिस्ट्री, राजस्व अभिलेखों तथा अन्य उपलब्ध दस्तावेजों का परीक्षण किया जाए।
सूत्रों के अनुसार भवन का कुछ हिस्सा समय के साथ जर्जर हो गया था। दीवारों में दरारें आ गई थीं और कुछ हिस्सों को सुरक्षा की दृष्टि से पुनर्निर्मित करना आवश्यक हो गया था। इसी कारण मरम्मत और संरक्षण का कार्य शुरू कराया गया। भवन स्वामी का दावा है कि यह कार्य भवन को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से किया जा रहा है और इसका किसी भी प्रकार से संरक्षित स्मारक को प्रभावित करने से कोई संबंध नहीं है।
स्थानीय स्तर पर हुए विवाद के बाद मामला पुलिस तक भी पहुंचा। जानकारी के अनुसार स्थानीय पुलिस ने शिकायतों के आधार पर तथ्य जुटाए और स्थल की स्थिति का अवलोकन किया। बताया जाता है कि संबंधित भूमि का एक हिस्सा मौलाना अली अब्बास ने अपने भाई से विधिवत क्रय किया था, जिस पर लगभग 600 वर्गफुट क्षेत्र में निर्माण एवं मरम्मत संबंधी कार्य किया जा रहा है। इस संबंध में आवश्यक सूचनाएं लखनऊ विकास प्राधिकरण सहित अन्य विभागों को भी उपलब्ध कराई गई थीं।
इसके बावजूद पुरातत्व विभाग के स्थानीय कार्यालय की ओर से थाना सआदतगंज को पत्र भेजकर निर्माण कार्य रोके जाने तथा आवश्यक कार्रवाई किए जाने का अनुरोध किया गया। विभागीय पत्र में संरक्षित स्मारक के प्रतिबंधित एवं विनियमित क्षेत्र का उल्लेख करते हुए पुलिस से हस्तक्षेप की मांग की गई है।

मौलाना अली अब्बास ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि उन्होंने उसी दिन पुरातत्व विभाग को विस्तृत प्रार्थना पत्र देकर वास्तविक स्थिति से अवगत कराया था। उनका कहना है कि जब मामला विभाग के संज्ञान में था और संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत किए जा चुके थे, तब बिना तथ्यों की पूर्ण जांच किए स्थानीय थाना पुलिस को कार्रवाई के लिए पत्र भेजना उचित नहीं कहा जा सकता


उन्होंने अपने प्रार्थना पत्र में यह भी उल्लेख किया है कि यदि किसी व्यक्ति द्वारा उनके भवन के संबंध में शिकायत की गई है तो निर्णय लेने से पूर्व वर्ष 1901 के अभिलेखों तथा सूचना के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत प्राप्त दस्तावेजों का परीक्षण किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि इन अभिलेखों से स्पष्ट हो जाएगा कि भवन संरक्षित स्मारक घोषित किए जाने से पूर्व से ही अस्तित्व में था।
क्षेत्र के लोगों का कहना है कि पुराने शहर में अनेक ऐसे मकान हैं जो एक सदी से भी अधिक पुराने हैं और समय-समय पर उनकी मरम्मत एवं संरक्षण की आवश्यकता पड़ती रहती है। ऐसे मामलों में प्रशासनिक एवं विभागीय कार्रवाई तथ्यों और अभिलेखों के आधार पर ही की जानी चाहिए ताकि किसी भी पक्ष के साथ अन्याय न हो।
अब निगाहें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के वरिष्ठ अधिकारियों पर टिकी हैं। यदि विभाग मौलाना अली अब्बास द्वारा प्रस्तुत अभिलेखों और दावों का परीक्षण करता है तो यह स्पष्ट हो सकेगा कि कार्य वास्तव में नया निर्माण है या फिर एक पुराने भवन की आवश्यक मरम्मत एवं संरक्षण प्रक्रिया का हिस्सा।
फिलहाल मामला प्रशासनिक और विभागीय विचाराधीन है, लेकिन एएसआई के पत्र और उसके जवाब में दिए गए प्रतिवेदन के बाद यह विवाद एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। मौलाना अली अब्बास ने निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए कहा है कि उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेखों और वास्तविक तथ्यों के आधार पर निर्णय लिया जाए ताकि किसी प्रकार की गलतफहमी और अनावश्यक विवाद की स्थिति समाप्त हो सके। उन्होंने कहा कि जो महिला पुरातत्व विभाग में संरक्षित स्मारक के 100 मीटर के अंतर्गत कार्य को अवैध बता रही है वो स्वंय अपना भवन 100 मीटर की परिधि के अंतर्गत तीन मंज़िला बनवा चुकी है। उन्होंने कहा कि क्या पुरातत्व विभाग इस महिला को कोई नोटिस या कार्रवाई करेगा अथवा नहीं।
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