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सोशल मीडिया पर बढ़ती सांप्रदायिक उकसावे की पोस्टें: क्या किसी बड़ी साज़िश की ओर बढ़ रहा है समाज?
ज़की भारतीय ✍🏼
लखनऊ,25 जून। देश में मुहर्रम का महीना शुरू होते ही सोशल मीडिया ख़ासकर फेसबुक पर कुछ ऐसे पोस्ट, वीडियो, मीम और टिप्पणियां बड़ी संख्या में सामने आने लगी हैं, जिनमें हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) की अज़ीम कुर्बानी, कर्बला की घटना तथा शिया समुदाय की धार्मिक परंपराओं को निशाना बनाकर व्यंग्य, उपहास और आपत्तिजनक टिप्पणियां की जा रही हैं। इन पोस्टों में न केवल धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली भाषा का प्रयोग किया जा रहा है, बल्कि ऐसी सामग्री भी प्रसारित की जा रही है जो समाज में वैमनस्य और तनाव को बढ़ावा दे सकती है।
हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे अनेक स्क्रीनशॉट यह दर्शाते हैं कि कुछ लोग मुहर्रम, मातम, अज़ादारी, कर्बला और हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) से जुड़ी मान्यताओं का मज़ाक उड़ाने का प्रयास कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर कुछ पोस्ट ऐसे भी हैं जिनमें जवाबी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। यदि यह सिलसिला इसी प्रकार चलता रहा तो स्थिति केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसका असर समाज की शांति और कानून व्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

भारत का संविधान देता है धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
भारत एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। यहां प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म और संप्रदाय के अनुसार पूजा-पद्धति, धार्मिक आयोजन और सांस्कृतिक परंपराओं का पालन करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। चाहे वह मुहर्रम हो, ईद हो, दीपावली हो, होली हो, गुरुपर्व हो या क्रिसमस—किसी भी समुदाय के धार्मिक आयोजनों का उपहास उड़ाना या उन्हें विवाद का विषय बनाना सामाजिक सौहार्द के विरुद्ध माना जाता है।
यदि किसी व्यक्ति को किसी धार्मिक परंपरा से वैचारिक असहमति है तो उसे अपनी बात सभ्य और संवैधानिक तरीके से रखने का अधिकार है, किंतु किसी समुदाय की आस्था का मज़ाक बनाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं बल्कि सामाजिक तनाव को जन्म देने वाला कार्य माना जा सकता है।

सोशल मीडिया की निगरानी पर उठ रहे प्रश्न
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब देश में साइबर सेल, सोशल मीडिया मॉनिटरिंग यूनिट और विभिन्न एजेंसियां निरंतर डिजिटल गतिविधियों पर नजर रखती हैं, तब इस प्रकार की भड़काऊ और आपत्तिजनक पोस्टें लंबे समय तक सार्वजनिक रूप से कैसे प्रसारित होती रहती हैं?
कई लोगों का मानना है कि यदि समय रहते ऐसी सामग्री पर कार्रवाई नहीं की गई तो यह स्थिति भविष्य में बड़े विवाद का कारण बन सकती है। विशेष रूप से तब, जब धार्मिक भावनाओं से जुड़े विषयों पर दोनों पक्षों से प्रतिक्रियाएं शुरू हो जाएं।

क्या यह किसी संगठित साज़िश का हिस्सा है?
सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं में विभिन्न प्रकार की आशंकाएं भी व्यक्त की जा रही हैं। कुछ लोगों का मानना है कि भारत में मुसलमानों के विभिन्न वर्गों के बीच तनाव पैदा करने के लिए सुनियोजित ढंग से फर्जी अकाउंटों और एडिटेड सामग्री का उपयोग किया जा रहा है। वहीं कुछ लोगों का आरोप है कि विदेशों में चल रहे राजनीतिक और सामरिक संघर्षों के बाद पैदा हुई परिस्थितियों का लाभ उठाकर समाज में विभाजन पैदा करने की कोशिश हो रही है।

हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है और बिना जांच किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। लेकिन यह तथ्य अवश्य है कि सोशल मीडिया आज अफवाह फैलाने का सबसे तेज माध्यम बन चुका है और कई बार नकली प्रोफाइल, फर्जी पहचान तथा संपादित ऑडियो-वीडियो के माध्यम से समाज को भड़काने का प्रयास किया जाता है।

फर्जी पहचान बनाकर भड़काने की आशंका
कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और समुदाय के लोगों का कहना है कि आज के डिजिटल युग में किसी भी धर्म, संप्रदाय या संगठन के नाम से फर्जी आईडी बनाना बेहद आसान हो गया है। ऐसी स्थिति में यह संभावना भी नकारा नहीं जा सकती कि कोई शरारती तत्व किसी एक समुदाय के नाम से दूसरे समुदाय के विरुद्ध पोस्ट करके तनाव बढ़ाने का प्रयास कर रहा हो।
यदि आज किसी समुदाय की भावनाओं को आहत करने वाली सामग्री प्रसारित की जा रही है, तो कल किसी अन्य समुदाय की पूज्य हस्तियों या धार्मिक प्रतीकों के विरुद्ध भी यही तरीका अपनाया जा सकता है। इसलिए यह केवल किसी एक संप्रदाय का मुद्दा नहीं बल्कि पूरे समाज की शांति और राष्ट्रीय एकता से जुड़ा विषय है।

पुलिस की सक्रियता से पहले भी बेनकाब हो चुकी हैं साज़िशें
हाल ही में मुहर्रम के दौरान कुछ स्थानों पर लगाए गए विवादित नारों के मामलों में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपियों को गिरफ्तार किया था। जांच में कई बार ऐसे तथ्य सामने आए कि जिन लोगों पर प्रारंभिक रूप से संदेह किया जा रहा था, वास्तविकता उससे अलग थी। ऐसे मामलों में पुलिस और जांच एजेंसियों की सतर्कता प्रशंसनीय है।
यही कारण है कि सोशल मीडिया पर फैल रही इस प्रकार की भड़काऊ सामग्री की भी निष्पक्ष और गहन जांच आवश्यक है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि इसके पीछे वास्तव में कौन लोग हैं और उनका उद्देश्य क्या है।

समाज के जिम्मेदार लोगों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण
शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी केवल प्रशासन की नहीं बल्कि समाज के जिम्मेदार नागरिकों, धार्मिक विद्वानों, सामाजिक संगठनों और युवाओं की भी है। किसी भी उकसावे वाली पोस्ट पर भावनात्मक प्रतिक्रिया देने के बजाय उसकी सत्यता की जांच करना, उसे आगे न बढ़ाना और आवश्यक होने पर संबंधित प्लेटफॉर्म या पुलिस को रिपोर्ट करना अधिक उचित कदम होगा।
विशेष रूप से धार्मिक नेताओं और प्रभावशाली सामाजिक व्यक्तियों को ऐसे समय में संयम, संवाद और भाईचारे का संदेश देना चाहिए, ताकि किसी भी प्रकार की गलतफहमी या अफवाह को बढ़ावा न मिले।

प्रशासन से अपेक्षित कार्रवाई
सोशल मीडिया पर प्रसारित भड़काऊ सामग्री की निगरानी बढ़ाई जाए,फर्जी आईडी और संगठित दुष्प्रचार नेटवर्क की पहचान की जाए और धार्मिक भावनाएं भड़काने वाले तत्वों पर कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए।
साइबर सेल को सक्रिय करते हुए शिकायतों का त्वरित निस्तारण किया जाए। दोनों समुदायों के सम्मानित प्रतिनिधियों के साथ संवाद स्थापित कर शांति बनाए रखी जाए।

हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत केवल किसी एक समुदाय की विरासत नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध संघर्ष, सत्य, इंसाफ और मानवता की रक्षा का प्रतीक मानी जाती है। इसी प्रकार हर धर्म और समुदाय की अपनी-अपनी धार्मिक भावनाएं और परंपराएं हैं, जिनका सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सोशल मीडिया को नफरत फैलाने का माध्यम नहीं बल्कि संवाद और सद्भाव का मंच बनाया जाए। यदि समय रहते प्रशासन, सोशल मीडिया कंपनियां और समाज के जिम्मेदार लोग सक्रिय नहीं हुए, तो कुछ शरारती तत्वों की हरकतें देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब और सामाजिक एकता को नुकसान पहुंचा सकती हैं। इसलिए हर नागरिक को सतर्क रहना होगा और किसी भी प्रकार के उकसावे का हिस्सा बनने के बजाय शांति, कानून और आपसी सम्मान का रास्ता अपनाना होगा।
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