HomeArticleअज़ादारी और ताज़ियादारी: क़ुरआन, हदीस और अहलेबैत की सीरत की रोशनी में

अज़ादारी और ताज़ियादारी: क़ुरआन, हदीस और अहलेबैत की सीरत की रोशनी में

तुमको कभी क़ुरआन ने रोका ही नहीं जब।

क्यों जिंदा ए जावेद का मातम नहीं करते।।

ज़की भारतीय

मुहर्रम का महीना केवल एक ऐतिहासिक घटना की याद नहीं, बल्कि सत्य, न्याय, इंसानियत और ज़ुल्म के विरुद्ध प्रतिरोध का प्रतीक है। कुछ लोग यह आपत्ति करते हैं कि “अज़ादारी” या “ताज़ियादारी” का आदेश क़ुरआन में कहाँ है? जबकि इस प्रश्न का उत्तर इस्लामी शिक्षाओं के व्यापक सिद्धांतों, क़ुरआन, हदीस और अहलेबैत की सीरत के संदर्भ में समझा जाता है। क़ुरआन कहता है:”जो लोग अल्लाह की राह में क़त्ल किए गए, उन्हें मुर्दा न कहो। बल्कि वे ज़िंदा हैं, लेकिन तुम समझते नहीं।” (सूरह अल- बक़रह 2:154) और एक अन्य स्थान पर: “जो लोग अल्लाह की राह में शहीद हुए उन्हें हरगिज़ मुर्दा न समझो, बल्कि वे अपने रब के पास ज़िंदा हैं और उन्हें रोज़ी दी जाती है।” (सूरह आले इमरान 3:169) इसका अर्थ यह नहीं कि शहीद के बिछड़ने का दुख महसूस करना मना हो गया। यह आयतें उनके रूहानी दर्जे को बयान करती हैं, न कि इंसानी भावनाओं को समाप्त करती हैं। दुख प्रकट करना इंसानी फ़ितरत है जब किसी देश का सैनिक सीमा पर शहीद होता है तो पूरा राष्ट्र उसे श्रद्धांजलि देता है। उसके परिवार के लोग रोते हैं, लोग संवेदना प्रकट करते हैं। कोई यह नहीं कहता कि “वह अमर है, इसलिए मत रोओ।” इसी प्रकार इमाम हुसैन (अ.) और उनके साथियों पर जो अत्याचार हुए, उनका ग़म मनाना, उन्हें याद करना और उनके लिए आँसू बहाना इंसानी हमदर्दी और न्यायप्रियता की निशानी माना जाता है। हज़रत याक़ूब (अ.) का उदाहरण क़ुरआन में आता है: “और उनकी आँखें ग़म के कारण सफेद हो गईं और वे दुख से भरे हुए थे।” (सूरह यूसुफ 12:84) हज़रत याक़ूब (अ.) ने अपने बेटे हज़रत यूसुफ (अ.) के ग़म में इतना रोया कि उनकी आँखों की रोशनी चली गई। क़ुरआन ने इसे गुनाह नहीं कहा,बल्कि एक नबी की स्वाभाविक भावना के रूप में बयान किया। रसूलुल्लाह का रोना हदीसों में वर्णित है कि रसूलुल्लाह अपने पुत्र इब्राहीम की मृत्यु पर रोए और फरमाया: “आँख आँसू बहाती है, दिल ग़मगीन होता है, लेकिन हम वही बात कहते हैं जिससे हमारा रब राज़ी हो।” इसी प्रकार आपने अपने चाचा हमज़ा इब्न अब्दुल मुत्तलिब की शहादत पर दुख व्यक्त किया। इससे स्पष्ट होता है कि दुख में आँसू बहाना इस्लाम के विरुद्ध नहीं है। कर्बला की याद और अहलेबैत शिया परंपरा में यह वर्णित है कि अली इब्न हुसैन ज़ैनुल आबिदीन ने कर्बला के बाद वर्षों तक इमाम हुसैन (अ.) को याद कर गिरिया किया। जब भी पानी या भोजन सामने आता, उन्हें कर्बला की प्यास याद आ जाती। इसी प्रकार ज़ैनब बिन्त अली ने कूफ़ा और शाम में अपने ख़ुत्बों के माध्यम से कर्बला के संदेश को जीवित रखा। यह ऐतिहासिक रूप से स्थापित है कि उन्होंने अत्याचार के विरुद्ध आवाज़ उठाई।

अज़ादारी का उद्देश्य

अज़ादारी का उद्देश्य रोने के साथ साथ ज़ुल्म के विरुद्ध आवाज़ बुलंद करना। इमाम हुसैन (अ.) के त्याग को याद रखना। इंसाफ़, सब्र और हक़ की राह पर चलने का संकल्प लेना। आने वाली पीढ़ियों को कर्बला का संदेश पहुँचाना। हज़रत इमाम हुसैन (अ.) का जनाज़ा कर्बला में तत्काल सम्मानपूर्वक दफ़्न नहीं हो सका और उनके शरीर को कई दिनों तक तपते हुए मैदान में छोड़ दिया गया। इसी कारण अनेक लोग ताज़ियादारी को इस भावना की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति मानते हैं कि “यदि हम कर्बला में होते, तो अपने इमाम को इस प्रकार बे-कफ़न और बे-सहारा न छोड़ते।”

क़ुरआन का सिद्धांत

क़ुरआन कहता है:”जो अल्लाह की निशानियों का सम्मान करता है, तो यह दिलों के तक़वा की निशानी है।” (सूरह अल-हज्ज 22:32) शिया विद्वान इमाम हुसैन (अ.) की याद को अल्लाह की राह में दी गई महान क़ुर्बानी की याद मानते हैं और इस आयत को उसके समर्थन में एक सामान्य सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

कुरआन में नहीं है एक बैठक में तीन तलाक़ की प्रथा

इसी संदर्भ में एक और महत्वपूर्ण बात पर विचार करना चाहिए। अक्सर यह कहा जाता है कि “जो चीज़ क़ुरआन में शब्दशः नहीं है, वह मान्य नहीं हो सकती।” यदि यही कसौटी हर विषय पर लागू की जाए, तो इस्लामी इतिहास की अनेक ऐसी प्रथाओं पर भी प्रश्न उठेंगे जो सदियों तक विभिन्न मुस्लिम समाजों में प्रचलित रहीं। उदाहरण के लिए, एक बैठक में तीन तलाक़ की प्रथा लंबे समय तक अनेक सुन्नी समाजों में प्रचलित रही, जबकि क़ुरआन तलाक़ की प्रक्रिया को क्रमबद्ध ढंग से प्रस्तुत करता है। क़ुरआन पति-पत्नी के बीच सुलह, मध्यस्थता, प्रतीक्षा अवधि (इद्दत) और सोच-विचार के अवसर का उल्लेख करता है, न कि ग़ुस्से में एक ही बैठक में तीन बार “तलाक़” कहकर तत्काल वैवाहिक संबंध समाप्त कर देने का। यही कारण है कि इस विषय पर मुस्लिम विद्वानों में लंबे समय से मतभेद रहे हैं और भारत में भी इस प्रथा पर क़ानूनी रोक लगाई गई।
इसी प्रकार, निकाह-ए-हलाला के नाम पर यदि पहले से योजना बनाकर केवल पहले पति के पास लौटने के उद्देश्य से विवाह कराया जाए, तो उसकी वैधता पर भी अनेक प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों ने गंभीर आपत्तियाँ व्यक्त की हैं। इसलिए किसी भी प्रचलित रिवाज को केवल इस आधार पर अंतिम इस्लामी सत्य नहीं कहा जा सकता कि वह किसी समाज में लंबे समय से चलता आ रहा है।
ठीक उसी प्रकार, शिया मुसलमान भी यह नहीं कहते कि हर मुसलमान पर अज़ादारी करना अनिवार्य है। उनका केवल यह कहना है कि अज़ादारी, मजलिस, गिरया, मातम, ताज़ियादारी और तबर्रुक उनके अक़ीदे का हिस्सा हैं, जिनकी बुनियाद वे क़ुरआन के सामान्य सिद्धांतों, रसूलुल्लाह स अ व व, अहलेबैत (अ.) और अपने इमामों की शिक्षाओं में देखते हैं। इसलिए यदि किसी मुसलमान को अज़ादारी न करनी हो, तो वह अपने अक़ीदे के अनुसार अमल करे; लेकिन जो लोग अहलेबैत (अ.) की मुहब्बत में अज़ादारी करते हैं, उनके धार्मिक अभ्यास का सम्मान भी किया जाना चाहिए। इस्लाम ने किसी पर अपने नफ़्ली अमल या धार्मिक अभिव्यक्ति को थोपने की शिक्षा नहीं दी। क़ुरआन का सिद्धांत है कि हर व्यक्ति अपने अमल के लिए स्वयं उत्तरदायी है। इसलिए परस्पर सम्मान, संवाद और एक-दूसरे के धार्मिक दृष्टिकोण को समझने का प्रयास ही उम्मत की एकता और इस्लामी अख़लाक़ के अधिक निकट है।

क़ुरआन में पांच वक्त की नमाज और उसका तरीक़ा मौजूद नहीं

अज़ादारी, मजलिस, गिरया, मातम, ताज़ियादारी और तबर्रुक शिया मुसलमानों के लिए केवल रस्में नहीं, बल्कि अहलेबैत (अ.) से मोहब्बत, वफ़ादारी और कर्बला के पैग़ाम को ज़िंदा रखने का माध्यम हैं। शिया मत के अनुसार इन अमलों की बुनियाद क़ुरआन के सामान्य सिद्धांतों, रसूलुल्लाह की सुन्नत, अहलेबैत (अ.) की सीरत और इमामों की शिक्षाओं में पाई जाती है। शिया संप्रदाय कभी यह दावा नहीं करता कि हर मुसलमान पर अज़ादारी करना फ़र्ज़ है या सभी को उसी तरीके से मातम करना चाहिए। जो भाई अपने अक़ीदे के अनुसार अज़ादारी नहीं करते, वे अपने अक़ीदे पर अमल करने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन उसी तरह शिया मुसलमानों को भी अपने धार्मिक विश्वास और इबादत के तरीके पर अमल करने का पूरा अधिकार है। किसी दूसरे के ग़म मनाने के तरीके का उपहास करना या उसे बिना प्रमाण के ग़लत ठहराना न्याय और इस्लामी अख़लाक़ के अनुरूप नहीं है। क़ुरआन में अनेक बातें सिद्धांत के रूप में आई हैं, जबकि उनकी व्याख्या और अमली तरीका रसूलुल्लाह ने सिखाया। क़ुरआन ने नमाज़ का हुक्म दिया, लेकिन पाँच वक़्त की नमाज़ का पूरा तरीका हदीस से मिला। क़ुरआन ने ज़कात का आदेश दिया, लेकिन उसकी विस्तृत दरें और नियम सुन्नत से स्पष्ट हुए। इसी प्रकार हर धार्मिक अमल का नाम क़ुरआन में होना आवश्यक नहीं है; उसका इस्लामी सिद्धांतों के अनुरूप होना महत्वपूर्ण है। शिया रिवायतों में यह भी वर्णित है कि रसूलुल्लाह ने कर्बला की आने वाली त्रासदी की ख़बर दी थी और अहलेबैत पर रोने वालों की फ़ज़ीलत बयान की थी। इन्हीं रिवायतों के आधार पर शिया समुदाय मानता है कि इमाम हुसैन (अ.) के ग़म में आँसू बहाना इबादत और सवाब का माध्यम है। इसी प्रकार तबर्रुक का सिद्धांत भी इस्लामी इतिहास में पाया जाता है। क़ुरआन में यूसुफ की क़मीस से याक़ूब की आँखों की रोशनी लौट आने का उल्लेख (सूरह यूसुफ 12:93–96) इस बात की मिसाल माना जाता है कि अल्लाह जिन चीज़ों को बरकत वाला बनाए, उनसे बरकत हासिल करना अपने आप में शिर्क नहीं है। इसी तरह इस्लामी रिवायतों में यह भी मिलता है कि कुछ नेक सहाबा रसूलुल्लाह के बाल, वुज़ू के पानी और अन्य निशानियों से बरकत हासिल करते थे। शिया मत इन्हीं सिद्धांतों की रोशनी में तबर्रुक को देखता है। अंततः, कर्बला केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि हर दौर में सत्य, न्याय और इंसानियत के लिए खड़े होने का संदेश है। शिया मुसलमान अज़ादारी के माध्यम से इसी संदेश को जीवित रखते हैं। कोई इसमें शामिल हो या न हो, यह उसका व्यक्तिगत और धार्मिक निर्णय है; लेकिन एक-दूसरे की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करना इस्लामी अख़लाक़ और सामाजिक सौहार्द की बुनियादी आवश्यकता है।

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