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बिजली उपभोक्ताओं पर एफपीपीएएस का नया बोझ: महंगाई से टूटी कमर पर एक और प्रहार
ज़की भारतीय ✍🏼
उत्तर प्रदेश में जून 2026 के बिजली बिलों पर 10 प्रतिशत एफपीपीएएस (फ्यूल एंड पावर परचेज एडजस्टमेंट सरचार्ज) लगाए जाने की घोषणा ने आम उपभोक्ताओं की चिंताओं को बढ़ा दिया है। उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (यूपीपीसीएल) द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार मार्च 2026 में बिजली खरीद और ट्रांसमिशन लागत में हुई वृद्धि का समायोजन जून माह के बिलों में किया जाएगा। तकनीकी रूप से यह निर्णय नियामक आयोग के प्रावधानों के अनुरूप बताया जा रहा है, लेकिन आम जनता के नजरिए से देखा जाए तो यह फैसला पहले से ही आर्थिक दबाव झेल रहे उपभोक्ताओं पर एक और अतिरिक्त बोझ के रूप में सामने आया है। आज आम आदमी की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। लगातार बढ़ती महंगाई ने घर-गृहस्थी का बजट पूरी तरह बिगाड़ दिया है। रसोई गैस के दाम, पेट्रोल और डीजल की कीमतें, सब्जियों और खाद्य पदार्थों की बढ़ती लागत, मकानों का किराया, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और अन्य आवश्यक खर्च लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में हर महीने आने वाला बिजली का बिल भी अधिकांश परिवारों के लिए चिंता का विषय बन चुका है। लोग अपनी आय का बड़ा हिस्सा केवल आवश्यक खर्चों को पूरा करने में लगा रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब उपभोक्ता अपनी खपत के अनुसार पहले से ही निर्धारित दरों पर बिजली बिल का भुगतान कर रहे हैं, तब बिजली खरीद की बढ़ी हुई लागत का भार सीधे उन्हीं पर डालना कितना उचित है? यदि बिजली उत्पादन, खरीद या ट्रांसमिशन व्यवस्था में लागत बढ़ती है तो उसका समाधान खोजने की जिम्मेदारी बिजली विभाग, सरकार और संबंधित संस्थाओं की भी होनी चाहिए। आम उपभोक्ता तो केवल उतनी ही बिजली का उपयोग करता है जितनी उसे आवश्यकता होती है और वह उसका नियमित भुगतान भी करता है। यूपीपीसीएल के मुख्य अभियंता (रेगुलेटरी अफेयर्स) द्वारा जारी पत्र में कहा गया है कि यह सरचार्ज आयोग के नियमों के तहत लगाया जा रहा है। लेकिन जनता के मन में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि आखिर हर बार बढ़ी हुई लागत का बोझ उपभोक्ताओं पर ही क्यों डाला जाता है? क्या बिजली व्यवस्था में होने वाले नुकसान, प्रबंधन संबंधी कमियां या बढ़ती परिचालन लागत को कम करने के लिए कोई अन्य उपाय नहीं खोजे जा सकते? गांवों और कस्बों में रहने वाले लाखों परिवार ऐसे हैं जिनकी आय सीमित है। मध्यम वर्ग भी बढ़ती महंगाई के बीच अपने मासिक खर्चों को संतुलित करने के लिए संघर्ष कर रहा है। ऐसे में बिजली बिल पर अतिरिक्त 10 प्रतिशत सरचार्ज जोड़ना कई परिवारों के लिए आर्थिक परेशानी का कारण बन सकता है। जिन परिवारों का मासिक बिजली बिल पहले से ही अधिक आता है, उन्हें इस निर्णय का सीधा असर अपनी जेब पर महसूस होगा। यह भी ध्यान देने योग्य है कि बिजली आज कोई विलासिता की वस्तु नहीं है। घरों में पंखे, कूलर, एसी, पानी की मोटर, बच्चों की पढ़ाई, मोबाइल और इंटरनेट जैसी अनेक आवश्यक सुविधाएं बिजली पर निर्भर हैं। गर्मी के मौसम में तो बिजली की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है। ऐसे समय में अतिरिक्त सरचार्ज लगाना जनता के लिए चिंता का विषय बनना स्वाभाविक है। सरकार और बिजली विभाग को चाहिए कि वे आम जनता की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए ऐसे फैसलों पर पुनर्विचार करें। यदि बिजली खरीद की लागत बढ़ रही है तो उसके दीर्घकालिक समाधान तलाशे जाएं, बिजली व्यवस्था में सुधार किया जाए, तकनीकी और वाणिज्यिक हानियों को कम किया जाए तथा ऐसी नीतियां बनाई जाएं जिनसे उपभोक्ताओं पर अनावश्यक आर्थिक बोझ न पड़े। जनता को राहत देने की आवश्यकता उस समय और अधिक बढ़ जाती है जब महंगाई पहले से ही चरम पर हो। ऐसे माहौल में अतिरिक्त सरचार्ज लगाना लोगों के बीच असंतोष और चिंता को बढ़ाने वाला कदम माना जा सकता है। आम उपभोक्ता की अपेक्षा केवल इतनी है कि उसे उसकी वास्तविक खपत के अनुसार ही बिल देना पड़े और व्यवस्था संबंधी अतिरिक्त लागतों का पूरा भार उसकी जेब पर न डाला जाए। आज जरूरत इस बात की है कि जनता की परेशानियों को समझा जाए और ऐसी नीतियां बनाई जाएं जो राहत प्रदान करें, न कि पहले से आर्थिक दबाव झेल रहे परिवारों की मुश्किलों को और बढ़ाएं।
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