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छोटे अखबारों पर नई सख्ती, आरएनआई नियमों को लेकर उठे सवाल — प्रेस की आज़ादी पर हमला, सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी

ज़की भारतीय

लखनऊ, 29 सितंबर। देश के छोटे और क्षेत्रीय समाचार-पत्रों के लिए सरकार द्वारा बनाए गए नए नियम अब विवादों में फँस गए हैं। प्रेस एंड रजिस्ट्रेशन ऑफ पीरियॉडिकल्स एक्ट 2023 के तहत आरएनआई (Registrar of Newspapers for India) अब हर अखबार से उनकी छपाई, प्रतियों की संख्या, वितरण और वित्तीय विवरण की मासिक रिपोर्ट माँग रहा है। पहले यह व्यवस्था वार्षिक रिटर्न के रूप में होती थी, जिसमें प्रकाशक अपने अखबार का पूरा वित्तीय ब्योरा, छपाई की संख्या और वितरण की जानकारी चार्टर्ड अकाउंटेंट द्वारा प्रमाणित कर आरएनआई को जमा करते थे।
छोटे और मध्यम समाचार-पत्रों का कहना है कि यह नया नियम उनके लिए अत्यधिक बोझिल और अनुचित है। वे पहले से ही अपनी निजी पूँजी से पत्रकारिता कर रहे हैं, स्टाफ रख रहे हैं, प्रेस का खर्च उठा रहे हैं और जनता तक समाचार पहुँचा रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि जब सरकार छोटे अखबारों को कोई आर्थिक मदद या डीएवीपी (DAVP) विज्ञापन लाभ नहीं देती, तो फिर आरएनआई को उन्हें मासिक रिपोर्ट और अतिरिक्त शर्तें लगाने का कानूनी अधिकार क्यों है।

छोटे अखबारों की दलील

उत्तर प्रदेश के लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, इलाहाबाद और गोरखपुर समेत देश के विभिन्न हिस्सों के प्रकाशकों का कहना है कि वे अपने निजी संसाधनों से समाचार-पत्र निकालते हैं।
वे बताते हैं कि:
यदि कोई अखबार 15,000 या 50,000 प्रतियाँ छाप रहा है, तो यह आंकड़ा केवल जमा की गई कुछ प्रतियों से साबित नहीं किया जा सकता।
बड़े अखबार अक्सर करोड़ों प्रतियों का दावा करते हैं, जबकि वास्तविक छपाई कई बार लाखों से भी कम होती है। फिर भी उन्हें सरकारी विज्ञापनों का भारी-भरकम लाभ मिलता है।
छोटे अखबार, जो पूरी तरह अपनी पूँजी से चल रहे हैं, उन्हें न तो सरकारी विज्ञापन मिलता है और न ही ऐसे नए नियमों के लिए प्रशासनिक सहूलियत।
प्रकाशकों का तर्क है कि छोटे अखबार जनता की समस्याएँ उजागर कर रहे हैं, सरकारी नीतियों पर सवाल उठा रहे हैं और कई बार बड़े मीडिया हाउस की तरफ़दारी से अलग स्वतंत्र खबरें दे रहे हैं। ऐसे में उन पर अतिरिक्त रिपोर्टिंग और नियमों का दबाव डालना पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर हमला है।

प्रेस मशीन और जबरन एग्रीमेंट की शर्त

नई व्यवस्था में आरएनआई ने यह भी शर्त जोड़ दी है कि अखबार केवल उन्हीं ऑफ़सेट प्रेस पर छपेंगे जो आरएनआई-लिस्टेड हों और जिनसे प्रकाशक ने औपचारिक एग्रीमेंट किया हो। प्रकाशकों का कहना है कि यह शर्त छोटे समाचार-पत्रों के लिए अतिरिक्त बोझ है।
कई छोटे प्रेस स्पष्ट कह रहे हैं कि वे लिस्टेड नहीं होंगे क्योंकि उनके पास पहले से ही सरकारी और निजी काम बहुत हैं।जो प्रेस लिस्टेड हैं, वे प्रकाशकों से सालाना 10,000–20,000 रुपये तक शुल्क मांग रहे हैं। छोटे अखबारों का कहना है कि उन्हें अपनी पूँजी बचाने के लिए छपाई का विकल्प चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।
प्रकाशकों ने पूछा — “हम अपनी जेब से अखबार छपवा रहे हैं, सरकारी विज्ञापन नहीं ले रहे। फिर क्यों हमें केवल उन्हीं प्रेस से छपवाने के लिए मजबूर किया जा रहा है जो लिस्टेड हैं?”
कई प्रकाशक ने यह भी बताया कि उनके पास ऑफ़सेट प्रेस हैं जो काम करने के लिए तैयार हैं, लेकिन उन्हें लिस्टिंग के कारण आरएनआई मान्यता नहीं दी गई। इससे उनका खर्च बढ़ रहा है और समय पर छपाई का काम भी प्रभावित हो रहा है। वार्षिक रिटर्न पहले से मौजूद था । प्रकाशकों ने यह भी सवाल उठाया कि मासिक रिपोर्टिंग की क्या जरूरत है, जब पहले से वार्षिक रिटर्न प्रणाली मौजूद है।

हर अखबार को पहले सालाना दाखिल करना होता था वार्षिक रिटर्न

इसमें यह दिखाना पड़ता था कि प्रतिवर्ष कितनी प्रतियाँ छपीं, सालाना आय कितनी हुई, खर्च कितना हुआ और क्या बचत या घाटा हुआ।
यह विवरण चार्टर्ड अकाउंटेंट द्वारा प्रमाणित कर के जमा कराया जाता था।
चार्टर्ड अकाउंटेंट, जो सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त और जिम्मेदार अधिकारी के रूप में कार्य करता है, पहले ही सुनिश्चित करता है कि सभी आंकड़े सही हैं।
प्रकाशकों का तर्क है कि जब यह पूरी व्यवस्था पहले से है और जिम्मेदार अधिकारी द्वारा मान्यता भी दी जाती है, तो मासिक रिपोर्ट और प्रेस-लिस्टिंग की शर्त अनावश्यक और गैर-जरूरी शक्ति का प्रयोग है।

डीएवीपी और आरएनआई का असंतुलन

प्रकाशकों का कहना है कि DAVP विज्ञापन नीति और RNI पंजीकरण प्रक्रिया में अंतर है।
DAVP बड़े अखबारों को विज्ञापन देती है और इसका लाभ आर्थिक रूप से सुरक्षित प्रकाशकों को मिलता है।RNI का दायित्व केवल पंजीकरण करना और अखबार की प्रामाणिकता सुनिश्चित करना है।लेकिन अब RNI ने भी विवरण और प्रेस-लिस्टिंग के लिए ऐसे नियम लागू कर दिए हैं जो केवल बड़े प्रकाशकों को लाभ पहुंचाने की प्रवृत्ति रखते हैं, जबकि छोटे प्रकाशक सरकारी विज्ञापन के दायरे से बाहर हैं।
प्रकाशकों ने सवाल उठाया कि — “जब हम सरकार से कोई आर्थिक लाभ नहीं ले रहे हैं, तो यह नियम हमें क्यों प्रभावित कर रहे हैं?”

आर्थिक और प्रशासनिक बोझ

प्रकाशकों का कहना है कि लिस्टेड प्रेस पर छपाई के नियम और अतिरिक्त शुल्क उन्हें असामान्य आर्थिक बोझ में डाल रहे हैं। लिस्टेड प्रेस एग्रीमेंट के लिए सालाना शुल्क मांग रहे हैं।इससे छोटे प्रकाशकों का खर्च बढ़ता है और उनकी प्रतिस्पर्धा प्रभावित होती है।
कई प्रेस कह रहे हैं कि उनके पास पहले से बड़े सरकारी और निजी आदेश हैं, इसलिए छोटे अखबारों के लिए लगातार छपाई करना मुश्किल है। प्रकाशकों का कहना है कि यह स्थिति छोटे अखबारों की स्वतंत्रता और अस्तित्व पर सीधा हमला है।

सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी

छोटे और मध्यम समाचार पत्रों के मालिकों का कहना है कि यह नियम पत्रकारिता की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है। वे मानते हैं कि यह केवल बड़े मीडिया हाउस को सशक्त करने के लिए बनाया गया है।
छोटे प्रकाशक अपनी पूँजी से काम कर रहे हैं, सरकार से कोई मदद नहीं ले रहे और फिर भी उन्हें यह दबाव झेलना पड़ रहा है। कई अखबार मालिकों ने कहा है कि अगर प्रशासन उनकी शिकायतों पर ध्यान नहीं देगा, तो वे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करेंगे।

प्रकाशकों का कहना है कि कोर्ट से यह तय होना चाहिए कि:

1. क्या सरकार निजी पूँजी से चल रहे अखबारों पर अतिरिक्त नियम लागू कर सकती है?

2. क्या यह अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं है?

3. DAVP और RNI की भूमिकाओं में पारदर्शी अंतर क्यों नहीं रखा गया?

छोटे समाचार पत्र अब आरएनआई के नियमों के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। उनका कहना है कि “हम जनता की समस्याओं को अपने खर्च पर सामने ला रहे हैं। सरकार का बोझ हम पर नहीं है, फिर भी हमें नियमों के नाम पर दबाया जा रहा है।”

प्रकाशक चाहते हैं कि प्रेस-चयन की स्वतंत्रता बरकरार रहे, छपाई का वास्तविक विकल्प रहना चाहिए और यदि लिस्टेड प्रेस की कोई ज़रूरत है, तो उसकी प्रक्रिया पारदर्शी और किफायती हो। यदि प्रशासन इस पर ध्यान नहीं देता, तो प्रकाशक संयुक्त रूप से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा देंगे। उनका मानना है कि कोर्ट इस मामले में प्रेस की आज़ादी और स्थानीय जनहितकारी पत्रकारिता की सुरक्षा तय करेगा। छोटे समाचार पत्रों के प्रतिनिधियों का कहना है कि वे जनता की आवाज़ बने रहेंगे — चाहे इसे अपनी जेब से ही क्यों न चलाना पड़े — और किसी भी कदम के लिए तैयार हैं ताकि प्रेस की स्वतंत्रता और लोकतंत्र की विविधता बनी रहे।

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