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ऐतिहासिक दरगाह हज़रत अब्बास अ.स पार्ट -5, अवैध दुकानों का मामला गहराया, प्रशासक के विरोधाभासी बयानों ने खड़े किए गंभीर सवाल
ज़की भारतीय ✍🏼
दरगाह हज़रत अब्बास से जुड़े विगत दिनों से चल रहे चार अवैध दुकानों के निर्माण प्रकरण ने अब नया और गंभीर मोड़ ले लिया है। मामले में सामने आए तथ्यों, वीडियो बयानों ने पूरे प्रकरण को संदेह और जांच के घेरे में ला खड़ा किया है। पूर्व में प्रकाशित खबरों का संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (CEO) द्वारा जिलाधिकारी एवं पुलिस कमिश्नरेट लखनऊ को पत्र भेजकर आवश्यक कार्रवाई की बात कही गई थी। सूत्रों के अनुसार उक्त पत्र के बाद निर्माण कार्य रुकवाया गया। बताया जा रहा है कि दरगाह के प्रशासक मीसम रिजवी द्वारा एक वीडियो इंटरव्यू में स्वयं यह स्वीकार किया गया था कि दुकानों का निर्माण दरगाह कमेटी द्वारा कराया जा रहा था। इंटरव्यू में उन्होंने यह भी कहा था कि दो दुकानें उन लोगों को दी जानी थीं जिनसे मुकदमा चल रहा था, जबकि शेष दुकानों का उपयोग दरगाह हित में किया जाना था। इतना ही नहीं, उन्होंने दुकानों की अनुमानित कीमत लगभग 17 लाख रुपये तक बताई थी। वीडियो में उन्होंने यह भी कहा था कि यदि शिया वक्फ बोर्ड निर्माण रोकने को कहेगा तो कार्य रोक दिया जाएगा। इन बयानों से स्पष्ट संकेत मिलता था कि निर्माण कार्य उनकी जानकारी और सहमति से चल रहा था। किन्तु अब सूत्रों के हवाले से जो जानकारी सामने आ रही है, उसने पूरे मामले को और अधिक संदिग्ध बना दिया है। बताया जा रहा है कि शिया वक्फ बोर्ड को भेजे गए एक पत्र में प्रशासक मीसम रिजवी द्वारा यह उल्लेख किया गया कि जिन लोगों से मुकदमा चल रहा था, वही लोग स्वयं दुकानें बनवा रहे थे। यदि यह पत्र वास्तविक है, तो यह कथित रूप से उनके पूर्व वीडियो बयान से सीधा विरोधाभास दर्शाता है। एक ओर सार्वजनिक वीडियो में स्वयं निर्माण कराने की बात स्वीकार की गई, वहीं दूसरी ओर बोर्ड को भेजे गए कथित पत्र में जिम्मेदारी अन्य लोगों पर डालने का प्रयास दिखाई देता है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उक्त वीडियो लोगों द्वारा सुरक्षित कर लिया गया है। यदि भविष्य में वीडियो हटाया भी जाता है, तब भी उसके रिकॉर्ड और प्रतियां उपलब्ध होने की बात कही जा रही है। वीडियो में प्रशासक कथित रूप से यह कहते भी सुनाई देते हैं कि वह “अलम की कसम” खाकर सच बोल रहे हैं। ऐसे में अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर सत्य क्या है? कानूनी जानकारों के अनुसार यदि बिना वक्फ बोर्ड की पूर्व अनुमति किसी वक्फ संपत्ति पर निर्माण कराया गया है, तो यह वक्फ एक्ट 1995 के प्रावधानों का उल्लंघन माना जा सकता है। विशेष रूप से: वक्फ संपत्ति के दुरुपयोग, बिना स्वीकृति निर्माण, वक्फ हित को क्षति पहुंचाने, तथा तथ्यों को छुपाने, जैसे आरोपों के तहत जांच हो सकती है। ऐसी स्थिति में वक्फ एक्ट की धारा 61 एवं धारा 64 के अंतर्गत कार्रवाई, प्रशासक को पद से हटाने, वित्तीय जांच, तथा जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई तक की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। सूत्रों का कहना है कि यदि निर्माण वास्तव में बिना स्वीकृत नक्शे, बिना बोर्ड अनुमति और बिना विधिक प्रक्रिया के कराया गया है, तो यह केवल प्रशासनिक अनियमितता नहीं बल्कि वक्फ संपत्ति को संभावित नुकसान पहुंचाने का मामला भी बन सकता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि दुकानों का निर्माण वैध प्रक्रिया से कराया जाता, तो: नक्शा तैयार होता, आर्किटेक्ट की स्वीकृति ली जाती, वक्फ बोर्ड अनुमति देता, किराया निर्धारण होता, तथा समस्त आय वक्फ खाते में दर्ज होती। लेकिन अब विरोधाभासी बयानों ने पूरे प्रकरण को और अधिक गंभीर बना दिया है। हालांकि इस संबंध में अभी तक शिया वक्फ बोर्ड के मुख्य कार्यपालक अधिकारी से आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हो सकी है, लेकिन यदि बोर्ड के समक्ष दिए गए कथित पत्र और सार्वजनिक वीडियो की जांच की जाती है, तो यह मामला गहन जांच का विषय बन सकता है। जनचर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि यदि किसी अधिकारी या प्रशासक द्वारा पहले सार्वजनिक रूप से निर्माण स्वीकार किया गया हो और बाद में जिम्मेदारी से पीछे हटने का प्रयास किया जाए, तो इससे उनकी भूमिका स्वतः जांच के दायरे में आ जाती है। फिलहाल मामला लगातार चर्चा में बना हुआ है और क्षेत्रीय नागरिकों व दरगाह से जुड़े लोगों की निगाहें अब उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के मुख्य कार्यपालक अधिकारी की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई हैं। बहरहाल, इस प्रकरण में जब तक वक्फ बोर्ड अंतिम निर्णय या स्पष्ट निस्तारण नहीं कर देता, तब तक यह मामला और इससे जुड़ी खबरें लगातार जारी रहेंगी।
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