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दरगाह पार्ट – 4 : फर्श, दुकान और बैलेंस शीट की सच्चाई पर बड़ा सवाल
ज़की भारतीय ✍🏼
दरगाह हज़रत अब्बास के फर्श पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद ज़ायरीन की सुरक्षा आज भी सवालों के घेरे में है। आए दिन फर्श पर फिसलकर गिरने की घटनाएं सामने आ रही हैं, लेकिन जिम्मेदारों की ओर से न कोई स्पष्ट जवाब दिया जा रहा है और न ही स्थायी समाधान दिखाई दे रहा है। फर्श उस स्थान पर बनाया गया जहां पहले से फर्श था,जिससे किसी को कोई परेशानी भी नहीं थी।अब एक सवाल यह उठता है कि क्या इतना महंगा फर्श बनवाने से पहले अंजुमन हाए मातमी दस्तों की मीटिंग करके ये प्लान बताया गया था या नहीं ? क्या वाक़िफ की मंशा को पढ़ा गया था या नहीं? जिस तरह विगत दिनों मीसम रिज़वी ने मोहर्रम के बाद बनने वाले रौज़ा ए इमाम हुसैन अस के निर्माण के बाबत कुछ अंजुमन हाए मातमी दस्तों की बैठक करके उन्हें इस रौज़ा ए इमाम हुसैन अस के बारे में बताया था,तो क्या ठीक वैसे ही फर्श के नए निर्माण के लिए भी बैठक नहीं करना चाहिए थी ?
पिछली खबर में कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए थे। विशेष रूप से प्रशासक द्वारा दिए गए एक इंटरव्यू के आधार पर यह साबित किया गया था कि बिना शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड, लखनऊ विकास प्राधिकरण और पुरातत्व विभाग की अनुमति के दुकानों का निर्माण नियमों के विपरीत माना जा सकता है।हालांकि प्रशासक मीसम रिज़वी ने अपने एक बयान में परमीशन ना लिए जाने की बात स्वयं स्वीकार की है। इन दुकानों को शिया सेन्ट्रल वक़्फ़ बोर्ड ने फिलहाल रुकवा कर ये साबित कर दिया कि मीसम रिज़वी द्वारा वक़्फ़ क़ानून को ताख़ पर रखकर कार्य किया जा रहा था। मीसम रिज़वी ने बयान में ये भी कहा था,2 दुकानें उन लोगों की थीं जिनसे मुक़दमा चल रहा था। ज्ञात हुआ है कि इनमें एक दुकान आरिफ हसन पूर्व मुतवल्ली दरगाह हज़रत अब्बास अस और दूसरी दुकान ट्विंकल नामक एक व्यक्ति के नाम से बनी है। सूत्र बताते हैं कि आरिफ कई वर्षों से दरगाह को एक हज़ार रुपए किराया देते आ रहे थे और उनके नाम से पहले भी 2 दुकानें दरगाह की थीं। बहरहाल इसी इंटरव्यू में मीसम रिज़वी ने कहा था कि “जो चाहे शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड जाए, 100 रुपये शुल्क जमा करे और दरगाह की बैलेंस शीट निकलवाकर देख ले, एक-एक पाई का हिसाब मौजूद है।” आज की यह खबर उसी “बैलेंस शीट” की वास्तविकता और उसकी कानूनी व व्यावहारिक हैसियत को समझने के लिए लिखी जा रही है, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि किसी भी वक्फ में नया निर्माण — चाहे दुकान हो, हाल हो या अन्य कोई ढांचा — सीधे शुरू नहीं किया जा सकता। उसके लिए बाकायदा प्रस्ताव, अनुमानित लागत, नक्शा, अनुमति और बोर्ड आदेश की प्रक्रिया होती है।
आम तौर पर प्रशासक या मुतवल्ली को बोर्ड में इस प्रकार प्रार्थना पत्र देना होता है:
सेवा में,
श्रीमान अध्यक्ष/मुख्य कार्यपालक अधिकारी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड, इंदिरा भवन, लखनऊ
विषय : दरगाह हज़रत अब्बास, रुस्तम नगर, लखनऊ में दुकानों के निर्माण के संबंध में। इसके बाद निर्माण की आवश्यकता, प्रस्तावित दुकानों की संख्या, क्षेत्रफल, अनुमानित लागत, किराये से होने वाली आय, समझौते की स्थिति और बोर्ड शुल्क का विवरण प्रस्तुत किया जाता है। फिर बोर्ड बैठक में प्रस्ताव रखा जाता है, नक्शा और एस्टीमेट देखा जाता है और यदि बोर्ड संतुष्ट होता है तो कुछ शर्तों के साथ अनुमति दी जाती है। इसके बाद प्रशासनिक अधिकारी की ओर से औपचारिक आदेश जारी होता है।
यह जानकारी इसलिए दी गई ताकि भविष्य में उत्तर प्रदेश के अन्य मुतवल्ली और प्रशासक भी यह समझ सकें कि वक्फ संपत्तियों में निर्माण कार्य किस प्रक्रिया से होना चाहिए। अब आते हैं उस “बैलेंस शीट” पर, जिसे ईमानदारी का सबसे बड़ा प्रमाण बताकर पेश किया जा रहा है। असल में वक्फों का लेखा-जोखा दो श्रेणियों में देखा जाता है।
पहला — वह वक्फ जिसकी वार्षिक आमदनी एक लाख रुपये से कम हो।
दूसरा — वह वक्फ जिसकी वार्षिक आमदनी एक लाख रुपये से अधिक हो।
एक लाख से कम आमदनी वाले वक्फ आम तौर पर अपनी आय-व्यय की मूल रसीदें, किराया रजिस्टर, नकद खर्च, भुगतान की पर्चियां और अन्य दस्तावेज सीधे बोर्ड में जमा कर ऑडिट कराते हैं।
लेकिन जिन वक्फों की आय एक लाख रुपये से ऊपर होती है, उनका हिसाब सामान्य तरीके से नहीं बल्कि चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) के माध्यम से तैयार कराया जाता है। यहीं से आम जनता और वास्तविक हिसाब-किताब के बीच सबसे बड़ा अंतर शुरू होता है। दरअसल “बैलेंस शीट” सिर्फ दो-चार पन्नों का एक संक्षिप्त वित्तीय सार होता है। उसमें आम तौर पर निम्न मद दर्ज रहते हैं —
• कुल आय (इनकम / रेवेन्यू)
• किराया आय
• चढ़ावा / दान / नजराना
• बैंक बैलेंस
• कैश इन हैंड (कैश इन हैंड)
• स्थायी संपत्तियां (फिक्स्ड एसेट्स)
• निर्माण व्यय
• वेतन / मजदूरी
• रख-रखाव खर्च
• बिजली-पानी व्यय
• देनदारियां (लायबिलिटी)
• लेनदार / बकायेदार (क्रेडिटर्स / डेब्टर्स)
• लाभ-हानि खाता (प्रॉफिट एंड लॉस अकाउंट / इनकम एंड एक्सपेंडिचर स्टेटमेंट)
• वर्ष के अंत में बची राशि (क्लोजिंग बैलेंस / सरप्लस)
लेकिन इन कॉलमों में सिर्फ रकम लिखी होती है, पूरी कहानी नहीं। यही सबसे महत्वपूर्ण बात है, जिसे आम आदमी समझ नहीं पाता। कोई व्यक्ति केवल बैलेंस शीट देखकर यह तय नहीं कर सकता कि वास्तव में कितना काम हुआ, कितना पैसा लगा और कितना दिखाया गया।
उदाहरण के तौर पर —
यदि किसी निर्माण में 5 लाख रुपये खर्च हुए लेकिन कागजों में 8 लाख दिखा दिए गए, तो बैलेंस शीट में केवल “निर्माण व्यय – 8 लाख” लिखा मिलेगा। अब सवाल यह है कि अतिरिक्त 3 लाख कहाँ गए? इसका जवाब बैलेंस शीट नहीं देती। असल सच्चाई तो मूल दस्तावेजों में छिपी होती है — जैसे :
• खरीद के बिल
• जीएसटी इनवॉइस
• ठेकेदार का एग्रीमेंट
• मजदूर भुगतान रजिस्टर
• बैंक एंट्री
• स्टॉक रजिस्टर
• मटेरियल सप्लाई की रसीद
• माप पुस्तिका (मेज़रमेंट बुक)
• साइट निरीक्षण रिपोर्ट
• भुगतान वाउचर
• कोटेशन और टेंडर दस्तावेज
यदि ये दस्तावेज सामने न हों तो केवल बैलेंस शीट किसी भ्रष्टाचार को सिद्ध नहीं कर सकती। यहीं से हेराफेरी की संभावनाएं भी शुरू होती हैं। मान लीजिए —
• 500 फीट मौरंग इस्तेमाल हुई लेकिन बिल 1000 फीट का लगा दिया गया।
• सस्ते या डुप्लीकेट पेंट का इस्तेमाल किया गया लेकिन बिल महंगे ब्रांड का बनवा लिया गया।
• 50 लाख के पत्थर खरीदे गए लेकिन बिल 90 लाख का बनवा लिया गया।
• रिश्तेदार या परिचित ठेकेदार के नाम से फर्जी या बढ़ी हुई भुगतान रसीदें लगा दी गईं।
• मजदूरों की संख्या और मजदूरी बढ़ाकर दिखाई गई।
और फिर यही सारे बिल, वाउचर और कागजात सीए को दे दिए गए। सीए उन्हीं दस्तावेजों के आधार पर बैलेंस शीट तैयार करता है। वह मौके पर जाकर हर पत्थर, हर सीमेंट की बोरी और हर पेंट की बाल्टी की जांच नहीं करता। यानि सीए द्वारा हस्ताक्षरित बैलेंस शीट यह साबित नहीं करती कि हर खर्च वास्तविक और ईमानदार ही था। वह सिर्फ यह बताती है कि प्रस्तुत दस्तावेजों के आधार पर लेखा तैयार किया गया। इतना ही नहीं, यदि बाद में मूल पर्चों या पैड में फेरबदल कर दिया जाए, सप्लायर का नाम बदल दिया जाए या पुराने दस्तावेज हटाकर नए लगा दिए जाएं, तो वर्षों बाद सच्चाई पकड़ना और भी कठिन हो जाता है। इसलिए सिर्फ यह कहना कि “बैलेंस शीट निकलवाकर देख लीजिए” — अपने आप में पारदर्शिता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। वास्तविक पारदर्शिता तब मानी जाएगी जब —
• मूल बिल सार्वजनिक हों,
• निर्माण की स्वीकृतियां उपलब्ध हों,
• टेंडर प्रक्रिया स्पष्ट हो,
• भुगतान बैंकिंग माध्यम से प्रमाणित हों,
• साइट पर हुए वास्तविक कार्य का मिलान दस्तावेजों से कराया जाए,
• और वक्फ संपत्ति का संचालन वाकिफ की मंशा के अनुसार किया जाए।
क्योंकि वक्फ किसी व्यक्ति की निजी जागीर नहीं, बल्कि अमानत होता है। मुतवल्ली या प्रशासक का काम वाकिफ की नीयत और वक्फ कानून के अनुसार संपत्ति का संचालन करना है, न कि व्यक्तिगत इच्छा के अनुसार।
पिछली खबर में बैलेंस शीट की वास्तविक हैसियत पर विस्तार से चर्चा करने का वादा किया गया था। इसी कारण आज पूरी खबर उसी विषय पर केंद्रित रखी गई।
अगली कड़ी में फिर कुछ नए सवालों और कथित भ्रष्टाचार के बिंदुओं पर चर्चा की जाएगी।
जारी……
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