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रोज़-ए-आशूरा: कर्बला की वह कुर्बानी जिसने हक़ और बातिल के बीच हमेशा के लिए एक लकीर खींच दी
ज़की भारतीय ✍🏼
10 मुहर्रम, जिसे रोज़-ए-आशूरा कहा जाता है, केवल इस्लामी कैलेंडर की एक तारीख़ नहीं है, बल्कि वह दिन है जिसने पूरी इंसानियत को यह सिखाया कि सत्य और असत्य, न्याय और अत्याचार, तथा सिद्धांत और सत्ता के बीच जब संघर्ष हो, तो एक मोमिन का कर्तव्य क्या होना चाहिए। यही वह दिन है जब रसूल-ए-अकरम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (सअवव) के नवासे इमाम हुसैन (अ.स.) ने अपने परिवार, अपने बेटों, अपने भतीजों और अपने वफ़ादार साथियों के साथ कर्बला की तपती रेत पर ऐसी कुर्बानी पेश की, जिसकी मिसाल इतिहास में बहुत कम देखने को मिलती है।
अक्सर लोग पूछते हैं कि आखिर कर्बला की जंग क्यों हुई? क्या यह सत्ता के लिए लड़ाई थी? क्या यह किसी राज्य, सिंहासन या शासन को हासिल करने का संघर्ष था?
कर्बला का इतिहास बताता है कि यह न तो ज़मीन के लिए जंग थी, न ताज और तख़्त के लिए, न धन-दौलत के लिए और न ही किसी व्यक्तिगत दुश्मनी के कारण। कर्बला की जंग दरअसल दो विचारधाराओं का संघर्ष थी—एक ओर हुसैनियत थी और दूसरी ओर यज़ीदियत।
एक ओर इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके बहत्तर (72) वफ़ादार साथी थे, जबकि दूसरी ओर एक विशाल सेना थी, जिसे विभिन्न रिवायतों में अलग-अलग संख्या में बयान किया गया है। लेकिन संख्या चाहे जो भी रही हो, यह निर्विवाद है कि एक तरफ़ मुट्ठीभर सत्य के परस्तार थे और दूसरी तरफ़ सत्ता की ताक़त थी। यही कारण है कि कर्बला को केवल युद्ध नहीं, बल्कि हक़ और बातिल के अंतिम टकराव के रूप में देखा जाता है।
यज़ीद स्वयं को मुसलमान कहता था, कलमा पढ़ता था और इस्लामी शासन का दावा करता था, लेकिन इमाम हुसैन (अ.स.) के सामने प्रश्न केवल किसी व्यक्ति का नहीं था, बल्कि उस व्यवस्था का था जो इस्लाम की वास्तविक शिक्षाओं को बदलकर सत्ता के हित में ढालना चाहती थी। यदि इमाम हुसैन (अ.स.) यज़ीद की बैअत कर लेते, तो आने वाली पीढ़ियाँ यह समझतीं कि इस्लाम में अत्याचार, जबरदस्ती और राजनीतिक स्वार्थ भी स्वीकार्य हैं। इसलिए इमाम हुसैन (अ.स.) ने समझौते के बजाय शहादत को चुना।
कुरआन स्पष्ट रूप से कहता है—”दीन के मामले में कोई ज़बरदस्ती नहीं है।” लेकिन इतिहास गवाह है कि हर दौर में कुछ ऐसे लोग पैदा हुए जिन्होंने धर्म को सत्ता का औज़ार बनाया। कर्बला इसी सोच के विरुद्ध एक ऐलान था। इमाम हुसैन (अ.स.) यह बताना चाहते थे कि इस्लाम तलवार के भय से नहीं, बल्कि इंसाफ़, रहमत, सत्य और मानवता से जीवित रहता है।
मदीना से निकलकर जब इमाम हुसैन (अ.स.) का काफ़िला कर्बला पहुँचा, तो उन्हें चारों ओर से घेर लिया गया। फ़ुरात नदी के किनारे होने के बावजूद उनके काफ़िले को पानी से दूर कर दिया गया। सात मुहर्रम से पानी बंद कर दिया गया। तपती हुई रेत, झुलसाने वाली गर्मी और तीन दिनों की प्यास ने बच्चों और महिलाओं की तकलीफ़ को और बढ़ा दिया। मासूम बच्चे प्यास से बिलख रहे थे, लेकिन इमाम हुसैन (अ.स.) ने अत्याचार के सामने झुकना स्वीकार नहीं किया।
हज़रत अब्बास (अ.स.), जिन्हें वफ़ादारी और बहादुरी की मिसाल माना जाता है, बार-बार इजाज़त माँगते रहे कि वे बच्चों के लिए पानी लेकर आएँ। वे फ़ुरात तक पहुँचे, लेकिन वापसी में शहीद कर दिए गए। उनकी शहादत आज भी वफ़ा और बलिदान का सबसे बड़ा प्रतीक मानी जाती है।
10 मुहर्रम की सुबह से शहादतों का सिलसिला शुरू हुआ। एक-एक कर साथी, रिश्तेदार और परिवार के सदस्य मैदान-ए-कर्बला में शहीद होते गए। जवान बेटे अली अकबर (अ.स.), मासूम अली असग़र (अ.स.), भतीजे, भाई और साथी—सभी ने अपने खून से यह साबित कर दिया कि सत्य की रक्षा केवल शब्दों से नहीं, बल्कि कुर्बानी से होती है।
आख़िरकार वह समय भी आया जब इमाम हुसैन (अ.स.) अकेले रह गए। उन्होंने अंतिम क्षण तक इंसाफ़, मानवता और अल्लाह की बंदगी का संदेश दिया। फिर उन्हें भी शहीद कर दिया गया। लेकिन कर्बला की सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि उस दिन तलवारें जीत गईं, पर विचार हार नहीं पाए। जिस हुसैन को मैदान में शहीद कर दिया गया, वही हुसैन चौदह सौ वर्षों बाद भी करोड़ों दिलों में ज़िंदा है।
कर्बला की त्रासदी शहादत पर समाप्त नहीं हुई। अहलेबैत के ख़ेमों को लूटा गया, महिलाओं और बच्चों को कैदी बनाया गया। मासूम बच्चियों के साथ कठोर व्यवहार किया गया। हज़रत सकीना (स.अ.) की प्यास और कैद की कहानी आज भी हर संवेदनशील इंसान की आँखें नम कर देती है। इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ.स.) को कैद किया गया और अहलेबैत को कूफ़ा तथा शाम के बाज़ारों में घुमाया गया। लेकिन जिन लोगों ने यह समझा था कि कर्बला का संदेश यहीं समाप्त हो जाएगा, वे इतिहास को नहीं समझ पाए थे।
यदि कर्बला में इमाम हुसैन (अ.स.) ने अपने खून से इतिहास लिखा, तो हज़रत ज़ैनब (स.अ.) ने अपने साहस और ख़ुत्बों से उसे दुनिया तक पहुँचाया। उन्होंने अत्याचारियों के दरबार में खड़े होकर सत्य की ऐसी आवाज़ बुलंद की कि विजेता कहलाने वाले लोग इतिहास में शर्म और निंदा के पात्र बन गए।
कर्बला की सबसे बड़ी सीख यह भी है कि किसी शासक, बादशाह या अत्याचारी व्यक्ति के कर्मों को पूरे धर्म का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता। इतिहास में ऐसे अनेक शासक हुए जिन्होंने सत्ता के लिए अत्याचार किए, लोगों पर दबाव डाला और अपने विरोधियों का दमन किया। भारत के इतिहास में भी कुछ ऐसे शासकों के नाम लिए जाते हैं जिनकी नीतियों और कार्यों को लेकर आज तक विवाद होते हैं। उनके कारण अनेक लोगों के मन में मुसलमानों के प्रति गलत धारणाएँ पैदा हुईं। लेकिन कर्बला हमें सिखाती है कि किसी अत्याचारी शासक के कर्मों का बोझ पूरे इस्लाम पर नहीं डाला जा सकता।
जिस प्रकार यज़ीद स्वयं को मुसलमान कहता था लेकिन उसका आचरण इंसाफ़ और मानवता के विरुद्ध था, उसी प्रकार इतिहास के किसी भी दौर में जो व्यक्ति ज़ुल्म, अन्याय और जबरदस्ती का रास्ता अपनाता है, वह हुसैनी सोच का प्रतिनिधि नहीं हो सकता। चाहे वह किसी भी मज़हब, जाति, नस्ल या शासन से संबंध रखता हो। कर्बला का पैग़ाम व्यक्ति को उसके कर्मों से पहचानना सिखाता है, केवल उसके नाम या पहचान से नहीं।
आज जब दुनिया में आतंकवाद, कट्टरता, धार्मिक नफ़रत और सत्ता के दुरुपयोग की घटनाएँ सामने आती हैं, तब कर्बला का संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। इमाम हुसैन (अ.स.) ने यह सिद्ध कर दिया कि धर्म का उपयोग इंसानियत को बचाने के लिए होना चाहिए, न कि उसे कुचलने के लिए। सत्य के लिए खड़े होने वाला चाहे अकेला क्यों न हो, इतिहास अंततः उसी के पक्ष में गवाही देता है।
यही कारण है कि चौदह सौ वर्षों के बाद भी हुसैनियत सम्मान, सत्य, न्याय, करुणा और मानवता का प्रतीक बनी हुई है, जबकि यज़ीदियत अत्याचार, घमंड और सत्ता के दुरुपयोग की पहचान बन चुकी है। कर्बला का मैदान आज भी पूरी इंसानियत को यह संदेश देता है कि संख्या नहीं, सिद्धांत महत्वपूर्ण होते हैं; ताक़त नहीं, सत्य महत्वपूर्ण होता है; और जीवन की लंबाई नहीं, बल्कि उसके उद्देश्य का महत्व होता है।
रोज़-ए-आशूरा हमें याद दिलाता है कि सत्य की राह कठिन हो सकती है, लेकिन उसकी मंज़िल अमर होती है। इमाम हुसैन (अ.स.) ने अपने नाना के दीन की वास्तविक पहचान को बचाने के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया। इसी कारण उनका नाम आज भी इंसाफ़, साहस, बलिदान और मानवता की सबसे ऊँची मिसाल के रूप में लिया जाता है और क़यामत तक लिया जाता रहेगा।
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