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बरेली में आई लव मोहम्मद विवाद में हिंसा पर योगी का कड़ा या विवादित बयान ?

ज़की भारतीय

लखनऊ, 27 सितंबर । उत्तर प्रदेश में “आई लव मोहम्मद” बैनर को लेकर शुरू हुआ विवाद अब सांप्रदायिक तनाव का रूप ले चुका है। यह विवाद 4 सितंबर 2025 को कानपुर के रावतपुर इलाके में बारावफात जुलूस के दौरान “आई लव मोहम्मद” बैनर लगाए जाने से शुरू हुआ। कुछ हिंदू संगठनों ने इसे “नई परंपरा” करार देकर आपत्ति जताई, जिसके बाद पुलिस ने अनधिकृत स्थान पर टेंट लगाने और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश के लिए भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A (सांप्रदायिक नफरत को बढ़ावा देना), 295A (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना), और 505 (सार्वजनिक शरारत) के तहत 9 नामजद और 15 अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। यह विवाद कानपुर से शुरू होकर बरेली, मऊ, उन्नाव, संभल, और सहारनपुर जैसे शहरों तक फैल गया।

बरेली में हिंसा और पुलिस कार्रवाई

26 सितंबर को बरेली में जुमे की नमाज के बाद इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल (IMC) के प्रमुख मौलाना तौकीर रजा के आह्वान पर सैकड़ों लोग इस्लामिया मैदान की ओर बढ़े। प्रदर्शनकारियों ने “आई लव मोहम्मद” के बैनर लहराए और नारेबाजी की। पुलिस ने बैरिकेड लगाकर भीड़ को रोकने की कोशिश की, लेकिन प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड तोड़े और पथराव शुरू कर दिया। इसके जवाब में पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया। इस घटना में 10 एफआईआर दर्ज की गईं और 32 लोगों को गिरफ्तार किया गया। बरेली के एसएसपी अनुराग आर्य ने कहा, “प्रदर्शनकारियों ने बिना अनुमति रैली निकालने की कोशिश की, और पथराव के बाद कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बल प्रयोग करना पड़ा।”
बरेली के आलम नगर इलाके में एक अन्य घटना में, बच्चों की क्रिकेट बॉल “आई लव मोहम्मद” बैनर पर लगने से हिंदू-मुस्लिम पक्षों के बीच कहासुनी हुई। पुलिस ने दोनों पक्षों को समझाकर मामला शांत किया, लेकिन यह घटना विवाद की संवेदनशीलता को दर्शाती है। मऊ, बाराबंकी, और सहारनपुर में भी जुलूस और बैनर तोड़ने की घटनाओं के बाद तनाव बढ़ा, जिसके लिए पुलिस ने हल्का बल प्रयोग किया।

योगी आदित्यनाथ का पूरा बयान

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 26 सितंबर को लखनऊ में “विकसित उत्तर प्रदेश विजन @2047” कार्यक्रम के दौरान इस विवाद पर कड़ा रुख अपनाया। उनका पूरा बयान, जैसा कि वीडियो और समाचार स्रोतों में दर्ज है, निम्नलिखित है:
“शुक्रवार को बरेली में एक मौलाना भूल गया कि प्रदेश के अंदर किसकी सरकार है। उसे लगा होगा कि वह जब चाहे सिस्टम को रोक सकता है, नाकाबंदी कर सकता है, कर्फ्यू लगा सकता है। लेकिन हमने साफ कर दिया कि ना नाकाबंदी होगी, ना कर्फ्यू लगेगा। दंगाइयों को इस तरह से सबक सिखाया गया है कि अब वे दंगे करने से पहले सौ बार सोचेंगे। जो लोग जाति और परिवार के नाम पर लोगों को भड़काते हैं, उनके लिए ही हमने बुलडोजर बनाया है। जब बेईमान और भ्रष्ट लोग सत्ता में आते हैं, तो वे सत्ता का शोषण और दुरुपयोग करते हैं। हमने बुलडोजर उन्हीं लोगों के लिए बनाया है जो कानून-व्यवस्था को चुनौती देते हैं। दशहरा बुराई और आतंक के दहन का पर्व है। कार्रवाई के लिए किसी और समय की प्रतीक्षा न करें, कार्रवाई का यही समय है, सही समय है।”
इस बयान की विपक्षी दलों ने कड़ी निंदा की। समाजवादी पार्टी (सपा) की नेत्री सुमैया राणा ने इसे “अन्यायपूर्ण और पक्षपातपूर्ण” बताया और कहा, “पुलिस को चुनौती देना गलत नहीं, जब वह निहत्थे लोगों पर लाठीचार्ज करती है। हम अपनी आवाज नहीं दबने देंगे।” कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कहा, “आई लव मोहम्मद हर मुसलमान के दिल में है। यह भावना व्यक्त करना अपराध नहीं, लेकिन हिंसक प्रदर्शन ठीक नहीं।” AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, “आई लव मोहम्मद कहना कोई अपराध नहीं है।” सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने बिना बरेली का नाम लिए कहा, “सरकारें लाठीचार्ज से नहीं, सौहार्द से चलती हैं।”

मुगल शासकों और अवध के नवाबों का सौहार्द

यह विवाद ऐतिहासिक संदर्भों को भी सामने लाता है, खासकर मुगल शासकों और अवध के नवाबों द्वारा हिंदू-मुस्लिम सौहार्द को बढ़ावा देने के प्रयासों को। मुगल शासकों ने भारत में 1526 से 1857 तक लगभग 331 वर्ष शासन किया, जिसमें बाबर से लेकर बहादुर शाह जफर तक कई शासक शामिल थे। उनके शासनकाल में हिंदुओं के साथ व्यवहार शासक-दर-शासक और समय-समय पर भिन्न रहा। कुछ मुगल शासकों, जैसे अकबर, ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई, जिसमें जजिया कर हटाना, हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देना, और हिंदू राजपूतों के साथ वैवाहिक गठजोड़ शामिल थे। अकबर ने फतेहपुर सीकरी में इबादतखाना बनवाया, जहां विभिन्न धर्मों के विद्वानों के बीच संवाद होता था।
हालांकि, औरंगजेब जैसे शासकों पर हिंदुओं के प्रति कठोर नीतियों के आरोप लगे, जैसे मंदिरों का विध्वंस और जजिया कर की पुनर्स्थापना। फिर भी, इतिहासकारों का कहना है कि औरंगजेब की छवि को गलत तरीके से हिंदू-विरोधी के रूप में प्रस्तुत किया गया। उनके प्रशासन में 60% से अधिक उच्च पदों पर हिंदू अधिकारी थे, जिनमें राजा जय सिंह, जसवंत सिंह, और जयसिंह मिर्जा जैसे प्रमुख नाम शामिल थे। उनकी सेना में भी बड़ी संख्या में हिंदू सैनिक थे। इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के की किताब Aurangzeb: The Man and the Myth के अनुसार, औरंगजेब ने वृंदावन के मथुरा मंदिर, अमरनाथ मंदिर, और कई अन्य मंदिरों को संरक्षण दिया। उनके शासनकाल में भारत में लाखों मंदिर बचे रहे, जो यह दर्शाता है कि उनकी नीतियां शासन को बनाए रखने और राजनीतिक विरोधियों को नियंत्रित करने पर केंद्रित थीं, न कि धार्मिक उन्मूलन पर। मुगल शासकों ने हिंदुओं को निशाना कभी नहीं बनाया।
आज जैसे भाजपा पर मुस्लिम विरोधी पार्टी का आरोप लग रहा है तो इसमें कुछ सत्यता भी नज़र आ रही है। मुसलमानों को टारगेट किया जा रहा है जबकि कई हिंदू संगठनों द्वारा की जा रही गुंडई की पैरवी की जा रही है। कई मजारों को तोड़ा गया,मस्जिदों पर भगवा झंडो को लगाया गया,कावड़ियों ने जमकर कई शहरों में तोड़ फोड़ की अभद्रता की लेकिन कार्रवाई शून्य रही। इन्हीं कारणों से योगी आदित्यनाथ को मुस्लिम विरोधी की संज्ञा दी जा रही है।
पूर्व के भारतीय मुस्लिम शासकों की नीतियां ज्यादातर शासन को बनाए रखने और आर्थिक लाभ पर केंद्रित थीं, न कि धार्मिक उन्मूलन पर।
अवध के नवाबों, जैसे आसफ-उद-दौला, ने भी हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा दिया। उनकी मां ने लखनऊ में बड़े मंगल के अवसर पर मंदिरों के निर्माण में योगदान दिया, जो हिंदू-मुस्लिम सौहार्द का प्रतीक है। यह ऐतिहासिक उदाहरण दर्शाता है कि मुस्लिम शासकों ने भारत की सांस्कृतिक विविधता को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। फिर भी, आज कुछ कट्टरपंथी समूह औरंगजेब और अन्य मुस्लिम शासकों की गलत छवि बनाकर सांप्रदायिक तनाव भड़काने की कोशिश कर रहे हैं। जिसमें सोशल मीडिया प्रथम स्थान पर है।

कानूनी और संवैधानिक पहलू

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा के अधीन है। बरेली में प्रदर्शन के दौरान बैरिकेड तोड़ने और पथराव की घटनाओं के बाद पुलिस ने बल प्रयोग किया। पुलिस का दावा है कि यह कार्रवाई जरूरी थी, लेकिन कई लोग इसे धार्मिक अभिव्यक्ति को दबाने की कोशिश मानते हैं। कानूनी तौर पर, “आई लव मोहम्मद” जैसे बैनर अपराध नहीं हैं, जब तक कि वे हिंसा या नफरत को उकसाने का इरादा न रखते हों। फिर भी, पुलिस ने IPC की धारा 153A, 295A, और 505 के तहत कार्रवाई की।

सहारनपुर और मऊ में भी इसी तरह के प्रदर्शन हुए, जहां मौलाना तौकीर रजा और अन्य नेताओं ने “आई लव मोहम्मद” के समर्थन में रैली का आह्वान किया। मऊ में पुलिस ने हल्का बल प्रयोग किया, और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए। लखनऊ में मुस्लिम महिलाओं ने आम आदमी पार्टी की नेता इरम रिजवी के नेतृत्व में अलमास कॉलोनी से छोटा इमामबाड़ा तक मार्च निकालने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने उन्हें रोक दिया।

सियासी बयानबाजी और जवाबी पोस्टर

लखनऊ में बीजेपी युवा मोर्चा के महासचिव अमित त्रिपाठी ने “आई लव श्री योगी आदित्यनाथ जी” और “आई लव बुलडोजर” के पोस्टर लगवाए, जिसने विवाद को नया आयाम दिया। हिंदू संगठनों ने “आई लव महाकाल” और “आई लव महादेव” के पोस्टर लगाए। यूपी के दर्जा प्राप्त राज्य मंत्री रघुराज सिंह ने विवादास्पद बयान दिया, “हिंदुस्तान हिंदुओं का देश है, यह इनके हिसाब से नहीं चलेगा।” इन बयानों और पोस्टरों ने सांप्रदायिक तनाव को और बढ़ाने का काम किया।

“आई लव मोहम्मद” विवाद ने धार्मिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी, और कानून-व्यवस्था के बीच तनाव को उजागर किया है। योगी आदित्यनाथ का बयान, जिसमें उन्होंने “मौलाना” को निशाना बनाया और बुलडोजर की कार्रवाई की बात कही, ने सियासी तूफान खड़ा कर दिया। ऐतिहासिक रूप से, मुगल शासकों और अवध के नवाबों ने हिंदू-मुस्लिम सौहार्द को बढ़ावा दिया। औरंगजेब को गलत तरीके से हिंदू-विरोधी चित्रित किया गया, जबकि उनके प्रशासन में हिंदुओं की महत्वपूर्ण भूमिका थी। अवध के नवाबों ने भी मंदिर निर्माण में योगदान दिया। आज के कट्टरपंथी समूह इस ऐतिहासिक सौहार्द को नजरअंदाज कर सांप्रदायिक नफरत भड़काने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार और प्रशासन को चाहिए कि वह संवाद, सहिष्णुता, और निष्पक्षता के रास्ते पर चलकर इस तनाव को कम करे। सवाल यह है कि क्या उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक सौहार्द को बनाए रखने के लिए सभी समुदायों के साथ समान व्यवहार होगा, या यह तनाव और गहराएगा?

मुसलमानों को भी यह सोचना चाहिए की कानपुर में मुस्लिम लोगों के खिलाफ आई लव मोहम्मद के संबंध में एफआईआर नहीं हुई है बल्कि नए स्थान पर टेंट लगाए जाने के मामले को लेकर हिंदू संगठन की शिकायत के बाद एफआईआर दर्ज की गई है ना कि आई लव मोहम्मद को लेकर।
लिहाजा इस तरह के प्रोटेस्ट करने को जो भी कह रहे हैं उनकी बातों में ना आएं,क्योंकि जब यह मुद्दा ही नहीं है तो उस मुद्दे को क्यों मुद्दा बनाया जा रहा है । इसमें भारतीय जनता पार्टी की विरोधी पार्टियों भी शामिल हो सकती हैं । हो सकता है उनकी मंशा हो भारतीय जनता पार्टी को और बदनाम किया जाए और बिहार के चुनाव प्रभावित कर दिए जाएं। प्रदर्शनकारियों को सोचना चाहिए कि अगर आप मोहम्मद से प्यार करते हैं तो उसको सड़कों पर उतर कर दिखाना या उसके पोस्टर या बैनर लगाना इसका क्या मतलब होता है। आप मोहम्मद से प्यार करते हैं हर मुसलमान मोहम्मद से प्यार करता है और करता रहेगा लेकिन इसके लिए सड़क पर आना और प्रदर्शन करने से क्या लाभ होगा?
मुसलमानों को चाहिए कि जो प्रदर्शन का शांतिपूर्ण तरीका है उसे अपनाए ना के इकट्ठा होकर बैरिकेडिंग लांघें या सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाये । जब ऐसा कोई करेगा तो पुलिस उस पर कार्रवाई तो करेगी ही।

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