ज़की भारतीय ✍🏼
मार्च 2020 में लॉकडाउन का साया था, COVID-19 का कहर अपनी सीमा से बाहर होता जा रहा था लेकिन इसी बीच भारतीय रेलवे ने एक झटके में दो ऐसी सुविधाएँ छीन लीं जो दशकों से पत्रकारों और वरिष्ठ नागरिकों (60 वर्ष से ऊपर) का सहारा बनी हुई थीं। जिला/राज्य स्तर के मान्यता प्राप्त पत्रकारों को ट्रेन में 50-52 प्रतिशत की छूट, पत्नी और 18 वर्ष तक के बच्चों को साल में दो बार फ्री या छूट के साथ यात्रा, और 60 साल से ऊपर के वृद्धजनों को 40-50 प्रतिशत की छूट – सब कुछ एक सर्कुलर में खत्म कर दिया गया। तब कहा गया था, “ये अस्थायी उपाय है, हालात सामान्य होते ही बहाल कर देंगे।” लेकिन छह साल बीत गए। अप्रैल 2026 है। COVID चला गया, अर्थव्यवस्था पटरी पर आ गई, लेकिन ये छूटें अभी तक नहीं लौटीं। लोकसभा में सांसदों ने 16 मार्च 2026 को भी जोरदार मांग की – “सीनियर सिटीजन और पत्रकारों की छूट बहाल की जाए।” कांग्रेस, तृणमूल, जेडीयू के सांसद बोले, लेकिन रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव से सिर्फ चुप्पी मिली। कोई टाइमलाइन नहीं, कोई आश्वासन नहीं। बजट 2026 में भी इस पर कोई जिक्र नहीं।

क्या यह महज लापरवाही है या BJP सरकार की पत्रकार-विरोधी मंशा का सबूत?
यह अन्याय सिर्फ एक सर्कुलर का नहीं, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हमला है। मान्यता प्राप्त पत्रकार, जो सुबह से शाम तक धूप-बारिश में खबरों का पीछा करते हैं, ग्रामीण इलाकों में आवाज बनते हैं, उनकी पत्नी और बच्चे भी अब ट्रेन में पूरे किराए पर सफर करने को मजबूर हैं। पहले 52 प्रतिशत की छूट मिलती थी, कूपन बुक से हजारों किलोमीटर फ्री यात्रा होती थी। अब? जीरो।
जिला सूचना कार्यालय से सर्टिफिकेट लेकर भी अब कोई फायदा नहीं। प्रेस कार्ड हाथ में है, लेकिन रेलवे की आँखों में वह बेकार कागज भर है।
और यही नहीं। 60 वर्ष से ऊपर के वृद्धजन, जिन्हें जीवनभर की सेवा के बाद थोड़ी राहत मिलती थी, उनका भी आरक्षण और टिकट छूट खत्म कर दी गई। RTI के अनुसार, सिर्फ सीनियर सिटीजन छूट बंद करने से रेलवे को पाँच वर्षों में 8,913 करोड़ रुपये अतिरिक्त कमाई हुई। यानी बुजुर्गों की जेब से पैसा निकालकर रेलवे की तिजोरी भरी गई। BJP सरकार “सबका साथ, सबका विकास” का नारा देती है, लेकिन वृद्धों और पत्रकारों को विकास के नाम पर विकास-विरोधी बना दिया। मृत पत्रकारों के परिवारों के लिए भी कोई स्पष्ट नीति नहीं। उनके नाम पर जो सुविधाएँ थीं, वे भी लंबित पड़ी हैं। क्या मरने के बाद भी पत्रकारों को सजा दी जा रही है?
सबसे बड़ा भेदभाव यह है कि लोकतंत्र के चार स्तंभों में से एक – विधायिका – के प्रतिनिधि यानी सांसद और विधायक अपनी सारी सुविधाएँ आज भी चैन से भोग रहे हैं। उनकी सैलरी बढ़कर 1.24 लाख रुपये मासिक हो गई है, फ्री हवाई यात्रा (34 टिकट सालाना), अनलिमिटेड फर्स्ट क्लास ट्रेन यात्रा (खुद के लिए और साथी के लिए), फ्री हाउसिंग, ऑफिस अलाउंस, मेडिकल, बिजली-पानी फ्री – सब कुछ बरकरार। जनता के प्रतिनिधि होने का दावा करते हैं, लेकिन इनकी अच्छी-खासी कमाई है। वेतन न मिले तो भूखे नहीं मरेंगे। फ्री डीजल-पेट्रोल न डलवाएँ, प्लेन-ट्रेन फ्री न जाएँ तो भी उनका गुजारा चल जाएगा। लेकिन हकीकत क्या है? ज्यादातर यात्राएँ व्यक्तिगत ऐश-ओ-आराम के लिए होती हैं – परिवार घुमाने, छुट्टियाँ मनाने, निजी कामों के लिए। जनता की सेवा के नाम पर टैक्सपेयर का पैसा। फिर पत्रकारों (चौथा स्तंभ) और वृद्धों के साथ यह भेदभाव क्यों? एक ही लोकतंत्र के दो स्तंभ – एक की सुविधाएँ बढ़ाई जा रही हैं, दूसरे की छीनी जा रही हैं। BJP सरकार की यह दोहरी नीति स्पष्ट करती है कि सत्ता के करीबी तो सब कुछ पा लें, लेकिन चौथा स्तंभ जो सत्ता की आँख है, उसे कमजोर कर दिया जाए।
लोकसभा में मुद्दा उठा, लेकिन सांसद खुद अपनी सुविधाओं पर चुप हैं। वे पत्रकारों और बुजुर्गों के लिए माँग करते हैं, लेकिन खुद की फ्री ट्रेन-फ्लाइट पर कोई सवाल नहीं उठाते। क्या यह दिखावा नहीं? सरकारी खजाने को बचाने की प्राथमिकता ज्यादा रही। क्या पत्रकार और वृद्ध अब “गैर-जरूरी” श्रेणी में आ गए हैं?
सबसे दर्दनाक है पत्रकार संगठनों का मौन। मान्यता प्राप्त पत्रकारों के अध्यक्ष, पदाधिकारी, कमेटी वाले – सब चुप। चुनाव आते हैं तो बड़े-बड़े मंचों पर दावे: “पत्रकारों की सुरक्षा, सुविधा, भत्ता हमारी प्राथमिकता।” वोट मिल जाते हैं, पद मिल जाते हैं, और फिर? लापरवाही। कोई भत्ता नहीं, कोई निर्धन पत्रकार के लिए योजना नहीं, कोई सुरक्षा व्यवस्था नहीं। बच्चे भी इन सुविधाओं से वंचित। कुछ मान्यता प्राप्त पत्रकारों के बच्चे स्कूल-कॉलेज जाते हैं, लेकिन ट्रेन में छूट नहीं। क्या यह संगठनों का धोखा नहीं? चुनावी वादे खोखले साबित होते हैं। पदाधिकारी पद संभालकर आराम से बैठ जाते हैं। ना सरकार के खिलाफ आवाज, ना सड़क पर प्रदर्शन। सिर्फ प्रेस कॉन्फ्रेंस और चाय-पानी।
यहाँ सवाल उठता है – कब शुरू हुई यह सारी बर्बादी? मार्च 2020 में COVID का बहाना बनाकर। लेकिन अब 2026 में भी स्थगन लगा हुआ है। सरकार कहती है, “आर्थिक स्थिति ठीक नहीं।” झूठ! रेलवे हर साल रिकॉर्ड कमाई कर रहा है। वंदे भारत, बुलेट ट्रेन, हाई स्पीड प्रोजेक्ट पर खर्च हो रहा है, लेकिन पत्रकार और बुजुर्गों की छोटी-छोटी सुविधाएँ नहीं लौटाई जा रही। यह स्पष्ट संदेश है – सरकार की मंशा पत्रकारों के विपरीत है। चौथे स्तंभ को कमजोर करना, उनकी आवाज दबाना, उनकी दैनिक जिंदगी को महँगा बनाना।
अगर यह अन्याय जारी रहा, अगर कोई नया कानून या सर्कुलर नहीं आया, तो अब चुप नहीं रहा जाएगा। हम हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का रुख करेंगे। यह पत्रकारों का अधिकार था, है और रहेगा। COVID अस्थायी था, लेकिन इस स्थायी अन्याय को सहन नहीं किया जाएगा। हम न्याय की गुहार लगाएँगे – रेलवे बोर्ड को निर्देश दें कि जिला मान्यता प्राप्त पत्रकारों की 50 प्रतिशत छूट, पत्नी-बच्चों की सुविधा, सीनियर सिटीजन छूट तुरंत बहाल की जाए। साथ ही मृत पत्रकारों के परिवारों के लिए स्पष्ट नीति बनाई जाए। सुरक्षा, भत्ता, स्वास्थ्य बीमा – ये सब शामिल हों।
पत्रकार समाज का दर्पण है। वह सत्ता की आँख है। लेकिन जब सत्ता ही दर्पण तोड़ दे, तो क्या होगा? BJP सरकार को याद दिलाना चाहते हैं – 2014 से 2026 तक आपने “मीडिया के साथ” का नारा दिया, लेकिन हकीकत में पत्रकारों को ट्रेन से उतार दिया। अब वक्त आ गया है जवाबदेही का। संगठनों के पदाधिकारियों को भी सोचना चाहिए,अगर आप मौन साधे रहे, तो आपके पत्रकार साथियों को उनके अधिकारों से वंचित कर दिया जाएगा।
जिला और राज्य स्तर के पत्रकार, खासकर लखनऊ जैसे शहरों से, रोजाना इस अन्याय को झेल रहे हैं। चारबाग स्टेशन पर जाकर निराश लौटना, जिला सूचना ऑफिस से सर्टिफिकेट लेकर भी व्यर्थ महसूस करना – यह पीड़ा अब सहन की सीमा पार कर चुकी है। हमारी माँग सरल है: पूर्ववत सुविधाएँ बहाल की जाएँ। 52 प्रतिशत छूट, कूपन बुक, पत्नी-बच्चों की यात्रा – सब कुछ। वरिष्ठ नागरिकों की छूट भी। क्योंकि लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब उसके रक्षक – पत्रकार – सम्मानजनक जीवन जी सकें।
यह लेख किसी व्यक्तिगत गुस्से का नहीं, बल्कि पूरे पत्रकार समुदाय की पीड़ा का प्रतिबिंब है। अगर सरकार नहीं सुनेगी, तो कोर्ट सुनेगा। और संगठन अगर नहीं जागे, तो इतिहास उन्हें भी याद रखेगा – “वे चुप रहे जब अधिकार छीने जा रहे थे।” पत्रकारों का हक छीनना आसान है, लेकिन उसे वापस दिलाना एक बड़ी समस्या है जिसे सब मिलकर हल करेंगे।



