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होर्मुज स्ट्रेट पर अमेरिकी नौसेना का ब्लॉकेड: ईरान के साथ बातचीत विफल होने के बाद ट्रंप का बड़ा ऐलान ओर दोनों पक्षों का दृष्टिकोण

ज़की भारतीय ✍🏼

12 अप्रैल 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक विस्तृत पोस्ट जारी की, जिसमें उन्होंने घोषणा की कि अमेरिकी नौसेना तुरंत होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) में आने-जाने वाले सभी जहाजों को ब्लॉक करना शुरू कर देगी। यह ऐलान पाकिस्तान के इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान के बीच चली लगभग 20-21 घंटे की शांति वार्ता के विफल होने के तुरंत बाद आया।

 

वार्ता का परिणाम

वार्ता में अधिकांश मुद्दों पर सहमति बनी, लेकिन ईरान का परमाणु कार्यक्रम मुख्य अड़चन रहा। अमेरिका का कहना था कि ईरान परमाणु हथियार न बनाने या उसके लिए जरूरी सामग्री न हासिल करने की स्पष्ट गारंटी देने को तैयार नहीं था। ईरानी पक्ष ने इसे “अत्यधिक मांग” बताया। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर वार्ता विफल करने का आरोप लगा रहे हैं।

ट्रंप ने एक पोस्ट में लिखा कि अमेरिकी नौसेना होर्मुज स्ट्रेट में सभी जहाजों को ब्लॉक करेगी, ईरान को दिए गए गैर-कानूनी टोल वाले जहाजों को रोका जाएगा, ईरान द्वारा बिछाई गई माइनस को साफ किया जाएगा और किसी भी हमले पर “नरक भेज दिया जाएगा”। उन्होंने इसे “वर्ल्ड एक्स्ट्रेशन” करार दिया और कहा कि अन्य देश भी ब्लॉकेड में शामिल हो सकते हैं।

ईरान का दृष्टिकोण और तर्क

ईरान इन घटनाक्रमों को अमेरिका-इजरायल की लंबे समय से चली आ रही आक्रामक नीति का हिस्सा मानता है। होर्मुज स्ट्रेट पर टोल के मुद्दे पर ईरान पूछता है कि जब अन्य देशों के जलमार्गों (जैसे मिस्र द्वारा सुएज नहर में ट्रांजिट फीस) पर शुल्क लिया जाता है, तो होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान को टोल लेने का अधिकार क्यों नहीं? वह इसे अपनी संप्रभुता और सुरक्षा का मुद्दा बताता है।

वार्ता के दौरान इजरायल का हमला

ईरान का आरोप है कि पूर्व में चल रही वार्ता के दौरान इजरायल ने “धोखे से” बड़ा हमला किया और कई महत्वपूर्ण हस्तियों को मार डाला। ईरान इसे बातचीत को कमजोर करने की साजिश मानता है।

परमाणु कार्यक्रम पर दोहरा मापदंड: ईरान तर्क देता है कि अमेरिका और इजरायल खुद परमाणु शक्तियां हैं (इजरायल ने NPT पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं और उसके पास अनुमानित 80-400 परमाणु हथियार हैं, जबकि अमेरिका के पास हजारों हैं)। फिर ईरान (जो NPT का सदस्य है) पर पाबंदी क्यों?

युद्ध, नुकसान और मुआवजा: ईरान कहता है कि युद्ध उसे थोपा गया, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था, नौसेना, वायुसेना और बुनियादी ढांचा तबाह हुआ। फिर मुआवजा क्यों नहीं दिया गया? भविष्य में ऐसे हमलों की कोई गारंटी क्यों नहीं दी जा रही?

ईरान इन तर्कों को इतिहास के आधार पर मजबूत करता है। 1953 में अमेरिकी और ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों ने ईरानी प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देक को सत्ता से हटाने में भूमिका निभाई थी। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद अमेरिका-ईरान संबंध बिगड़े। 1980-88 के ईरान-इराक युद्ध में अमेरिका ने इराक का समर्थन किया, जिस दौरान होर्मुज स्ट्रेट में “टैंकर वॉर” हुई। 2015 का JCPOA (परमाणु समझौता) 2018 में ट्रंप प्रशासन ने एकतरफा रद्द कर दिया। ईरान पर लगातार प्रतिबंध, वैज्ञानिकों की हत्याएं और साइबर हमले (जैसे स्टूक्सनेट ) को ईरान अमेरिका-इजरायल की “गुंडागर्दी” का उदाहरण मानता है। वर्तमान युद्ध में ईरान के बड़े नुकसान को भी वह इसी श्रृंखला का हिस्सा बताता है।

अमेरिका-इजरायल पक्ष और अंतरराष्ट्रीय कानून

अमेरिका और इजरायल का तर्क है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। होर्मुज स्ट्रेट अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य है (अंकलोज के तहत ट्रांसिट पैसेज लागू) और किसी एक देश द्वारा टोल वसूली गैर-कानूनी है। उन्होंने ईरान पर माइनस बिछाने, जहाजों पर हमलों और परमाणु हथियार बनाने की कोशिश का आरोप लगाया है। इजरायल ने हमेशा कहा है कि वह ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने की अनुमति नहीं देगा।

वैश्विक प्रभाव और प्रतिक्रियाएं

तेल की कीमतें बढ़ने की आशंका (दुनिया का 20% तेल इसी रास्ते से गुजरता है)।
भारत, चीन, जापान जैसे आयातक देश प्रभावित होंगे।
कुछ सहयोगी देश पूर्ण ब्लॉकेड में शामिल होने से हिचकिचा रहे हैं।
यह घटनाक्रम एक बड़ा एस्केलेशन है। ईरान इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मान रहा है, जबकि अमेरिका इसे वैश्विक जलमार्गों को मुक्त रखने और परमाणु प्रसार रोकने का कदम बता रहा है। इतिहास दोनों पक्षों के बीच गहरे अविश्वास को दर्शाता है, जिससे बातचीत मुश्किल हो जाती है।
स्थिति तेजी से बदल रही है। माइनस क्लियरिंग, ईरान की प्रतिक्रिया, तेल बाजार और अन्य देशों का रुख इस संकट की दिशा तय करेंगे। दोनों पक्ष आगे वार्ता की संभावना से इनकार नहीं कर रहे, लेकिन विश्वास का अभाव सबसे बड़ी चुनौती है।

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