ज़की भारतीय
आज का ये लेख सोशल मिडिया पर वायरल हो रहे एक पोस्टर को आधार मानते हुए लिखा जा रहा है,पोस्टर को जनता की आवाज़ मानकर उनके मन की बात उनतक पहुंचने का एक नाकाम प्रयास है ,लेकिन पोस्टर में लिखी तमाम बातें सत्यता पर आधारित हैं ,इसलिए पोस्टर की सत्यता को आपतक पहुंचना भी एक पत्रकार का कर्तव्य है । भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को सत्ता में आए 11 साल पूरे हो चुके हैं। 2014 में जब नरेंद्र मोदी ने पहली बार देश की बागडोर संभाली थी, तब उन्होंने बड़े-बड़े वादों के साथ जनता का दिल जीता था। “अच्छे दिन”, “सबका साथ, सबका विकास” जैसे नारे हर घर तक पहुंचे थे। लेकिन आज, 26 मई 2025 को, लखनऊ की सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक, जनता एक वायरल पोस्टर के जरिए सवाल पूछ रही है – “मोदी जी के वादे कहां गए?” यह पोस्टर, जिसमें “मोदी के 11 साल – जुमले बेसिक्स” शीर्षक से उनके अधूरे वादों की लंबी सूची है, तेजी से वायरल हो रहा है।

सोशल मीडिया पर वायरल इस पोस्टर में 2014 से 2022 तक के कई वादों को “दुगा” (दूर की बात) बताकर मजाक उड़ाया गया है। पोस्टर में लिखा है:100 दिनों में विदेश से काला धन लाना – नहीं आया। हर खाते में 15 लाख रुपये डालना – आज तक किसी के खाते में नहीं पहुंचा। हर साल 2 करोड़ नौकरियां देना – उल्टा बेरोजगारी बढ़ गई। पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम करना – कीमतें आसमान छू रही हैं।2022 तक किसानों की आय दोगुनी करना – किसान आज भी कर्ज में डूबे हैं।2022 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था – भारत अभी उस लक्ष्य से कोसों दूर है।गंगा को साफ करना – गंगा आज भी प्रदूषित है।हर गांव में इंटरनेट पहुंचाना – ग्रामीण इलाकों में नेटवर्क की हालत खराब है।2022 तक सबके लिए पक्का घर – लाखों लोग आज भी बेघर हैं।प्लास्टिक पार्ट प्रतिबंध लागू करना – सिंगल-यूज प्लास्टिक आज भी बाजार में बिक रहा है।2022 तक भारत को 24 घंटे बिजली वाला देश बनाना – कई गांवों में बिजली कटौती आम बात है।पोस्टर के आखिर में सवाल पूछा गया है – “सबसे अच्छे दिन लागेंगे, और क्या?” यह पोस्टर न सिर्फ सरकार की आलोचना कर रहा है, बल्कि जनता के गुस्से को भी दर्शा रहा है।
अधूरे वादों की लंबी फेहरिस्त
2014 में नरेंद्र मोदी ने चुनावी रैलियों में कई बड़े वादे किए थे। “100 दिनों में विदेश से काला धन लाऊंगा और हर खाते में 15 लाख रुपये डालूंगा” – यह वादा उस समय हर किसी की जुबान पर था। लेकिन 11 साल बाद भी न तो काला धन आया, न ही किसी के खाते में 15 लाख रुपये पहुंचे। 2016 में नोटबंदी का फैसला लिया गया, जिसे सरकार ने काले धन को खत्म करने का हथियार बताया था। लेकिन नोटबंदी के बाद भी काला धन सिस्टम में वापस आ गया, जैसा कि कई रिपोर्ट्स में सामने आया। नोटबंदी से आम जनता को लंबी कतारों में लगना पड़ा, छोटे व्यापार ठप हो गए, और अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगा।हर साल 2 करोड़ नौकरियां देने का वादा भी खोखला साबित हुआ। आज भारत में बेरोजगारी दर अपने चरम पर है। टेलीकॉम, आईटी, और बैंकिंग जैसे सेक्टरों में नौकरियों की छंटनी हो रही है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2017-18 में बेरोजगारी 1.78 करोड़ तक पहुंच गई थी, और यह आंकड़ा अब और बढ़ चुका है। सरकारी नौकरियों की भर्ती प्रक्रिया में देरी और प्राइवेट सेक्टर में अस्थिरता ने युवाओं को हताश कर दिया है।किसानों की आय दोगुनी करने का वादा भी पूरा नहीं हुआ। 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का दावा सरकार ने किया था, लेकिन आज भी किसान कर्ज में डूबे हैं और आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं। गंगा को साफ करने का वादा भी जुमला बनकर रह गया। स्वच्छ गंगा मिशन के तहत अरबों रुपये खर्च किए गए, लेकिन गंगा आज भी प्रदूषित है।
नोटबंदी और जीएसटी: जनता पर पड़े भारी
2016 की नोटबंदी को सरकार ने काले धन और भ्रष्टाचार को खत्म करने का बड़ा कदम बताया था। लेकिन यह कदम पूरी तरह असफल रहा। नोटबंदी के बाद 99% पुराने नोट सिस्टम में वापस आ गए, जिससे काले धन पर कोई खास असर नहीं पड़ा। उल्टा, आम जनता को परेशानी हुई। छोटे व्यापारियों का कारोबार ठप हो गया, और कई लोगों की नौकरियां चली गईं।2017 में लागू किया गया जीएसटी (गुड्स एंड सर्विस टैक्स) भी छोटे व्यापारियों के लिए मुसीबत बन गया। इसे “एक राष्ट्र, एक टैक्स” के रूप में पेश किया गया, लेकिन जटिल नियमों और बार-बार बदलते टैक्स स्लैब ने व्यापारियों को परेशान कर दिया। अर्थव्यवस्था में सुस्ती आई, और छोटे उद्योगों को भारी नुकसान हुआ।प्राइवेट सेक्टर में अपने लोगों को फायदा पहुंचाने का आरोपमोदी सरकार पर यह भी आरोप लग रहा है कि उन्होंने अपने करीबी उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाया है। इसमें सबसे ज्यादा चर्चा अडानी समूह की हो रही है। अडानी समूह को कई बड़े सरकारी प्रोजेक्ट्स दिए गए, और उनकी संपत्ति में कई गुना इजाफा हुआ। वहीं, आम जनता को महंगाई और बेरोजगारी का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा, अंबानी समूह को भी कई क्षेत्रों में रियायतें देने के आरोप लगे हैं। विपक्ष का कहना है कि सरकार ने बड़े उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाया, लेकिन गरीबों के लिए कुछ खास नहीं किया।कानून-व्यवस्था की बदहाल स्थितिमोदी सरकार के कार्यकाल में कानून-व्यवस्था की स्थिति भी चिंताजनक रही है। गौरक्षा के नाम पर हिंसा, नक्सलवाद, और बलात्कार जैसी घटनाएं आए दिन हो रही हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, 2017 में देशभर में 28,51,563 छोटे-बड़े अपराध दर्ज किए गए। उत्तर प्रदेश में हत्या और अपहरण के मामले सबसे ज्यादा हैं, जबकि महाराष्ट्र लूट के मामलों में पहले नंबर पर है।
जनता का गुस्सा: धार्मिक मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश?
सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं कि सरकार हिंदू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद जैसे धार्मिक मुद्दों को उछालकर जनता का ध्यान मूल समस्याओं से भटकाने की कोशिश कर रही है। लेकिन भारत एक सेक्युलर देश है, और जनता अब इन मुद्दों में ज्यादा दिन तक उलझने वाली नहीं है। लोग अब रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, और महंगाई जैसे मुद्दों पर बात करना चाहते हैं।
कांग्रेस का डाउनफॉल और राहुल गांधी की कोशिशें
कांग्रेस पार्टी, जो कभी देश की सबसे बड़ी पार्टी थी, आज अपनी साख बचाने की जद्दोजहद में है। इंदिरा गांधी के समय में कांग्रेस की नीतियां जनता के हित में थीं, लेकिन पीवी नरसिम्हा राव के बाद पार्टी की नीतियों में दोहरापन आ गया। इससे जनता का भरोसा टूटा, और कांग्रेस का डाउनफॉल शुरू हुआ। आज राहुल गांधी कांग्रेस को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। वे एक मेहनती और अच्छे नेता हैं, लेकिन मौजूदा समय में कांग्रेस बीजेपी को टक्कर देने की स्थिति में नहीं है।
जनता का सवाल: क्या अब बदलाव की बारी है?
11 साल बाद भी मोदी सरकार के अधूरे वादों ने जनता को निराश किया है। लोग अब सवाल कर रहे हैं कि क्या यह सरकार वाकई जनता के हित में काम कर रही है? सोशल मीडिया पर वायरल यह पोस्टर इस बात का सबूत है कि जनता अब हिसाब मांग रही है। आने वाले समय में यह देखना होगा कि क्या जनता धार्मिक मुद्दों से ऊपर उठकर अपने असल मुद्दों पर ध्यान देगी, और क्या विपक्ष इस मौके का फायदा उठाकर सत्ता में वापसी कर पाएगा।




