ज़की भारतीय ✍🏼
लखनऊ के ऐतिहासिक धार्मिक स्थल दरगाह हज़रत अब्बास अस के पुराने फर्श के ऊपर करोड़ों रुपए में नया फर्श बनाया जाना क्या वाकिफ की मंशा के अनुसार हुआ है या वर्तमान दरगाह कमेटी और जिम्मेदार प्रशासक मीसम रिजवी की मनमानी के तहत हुआ है । मीसम रिजवी इस मामले को लेकर दिए अपने बयान में कहते हुए नजर आ रहे हैं कि उन्होंने अच्छी दुकाने बनवाई ,फर्श बनाया जो पुराना फर्श था वह ख़राब था , जानवर आया करते थे ,झोपड़पट्टी बनी हुई थी और उन्होंने नया फर्श बनाके तोप पर तीर मार दिया।
बताते चलें कि आज भी कुत्तों का दरगाह परिसर में लगे हुए अलम के पास बैठना, टहलना ,घूमना, भोकना निरंतर जारी है। यही नहीं करोड़ों रुपए दरगाह के फर्श में बर्बाद करके मीसम रिजवी अपनी वाहवाही लूट रहे हैं । उन्होंने अपने दिए एक इंटरव्यू में यह कहा की लगभग ₹3 लाख रुपए महीने से हमने यह निर्माण कार्य कराया उन्होंने कहा कि 2 करोड रुपए का फर्श जिसने कहा है वह गलत कहा है, तो यहां बताते चलें के सूत्रों के हवाले से लिखी गई खबर में कम और ज्यादा हो सकता है, लोगों का जो कहना था वह यह था कि लगभग 2 करोड रुपए फर्श के काम में खर्च कर दरगाह की बड़ी रकम को बर्बाद किया गया है। लेकिन मीसम रिजवी ने ₹3 लाख महीने से फर्श और अन्य निर्माण कार्य को स्वीकार किया है। तो अब अगर उनके बयान को ही सही माना जाए तो उन्होंने ₹3 लाख महीने से दरगाह का यह फर्श बनाया है, तो अब सवाल उठता है कि मीसम रिजवी 4 वर्ष से लगभग दरगाह के मुतवल्ली/ प्रशासक नियुक्त हैं और 4 वर्षों में 48 महीने होते हैं। 48 महीने को 3 लाख से अगर गुणा किया जाए तो 1,44,00000 (एक करोड़ चवालीस लाख रुपए) बनते हैं। इसे लगभग 2 करोड़ रुपए कहना क्या गलत था ?
सवाल ये है ,मीसम बताएं किस ठेकेदार ने काम किया? क्या नाम था,टेंडर क्यों नहीं किया गया? फर्श पर 1 करोड़ रुपए भी क्यों बर्बाद किए गए।
दुकानों को बोर्ड ने रुकवाया तो कहा जा रहा है कि अब परमीशन मिलेगी तो दुकानें बनेगी वरना नहीं बनेगी।जब परमिशन की औपचारिकता नहीं की तो परमिशन बोर्ड क्यों देगा?
सवाल ये है कि क्या प्रशासक को इतना भी नहीं पता कि दुकान बनवाने के लिए स्वीकृत मानचित्र किसी आर्किटेक्चर द्वारा लगवाया जाता है और प्रति दुकान निर्माण लागत का 10 प्रतिशत बोर्ड में शुल्क जमा होता है,तब बोर्ड की मीटिंग में प्रस्ताव पास होता है फिर बोर्ड आदेश देता है फिर निर्माण करवाया जाता है। हालांकि अब नए कानून के मुताबिक लखनऊ विकास प्राधिकरण से भी परमिशन लेना आवश्यक है। क्योंकि दरगाह हज़रत अब्बास अस ऐतिहासिक धार्मिक संरक्षित स्मारक है इसलिए पुरातत्व विभाग से भी परमिशन लेना आवश्यक था। परमीशन न लेकर मीसम रिज़वी ने वक्फ बोर्ड हज़ारों रुपए की हानि पहुंचाई है।
ये बातें तो जाहिल से जाहिल मुतवल्ली या प्रशासक भी जानता है फिर मीसम रिज़वी ने ये चूक क्यों की जबकि सुना है के वो ख़ुद के नाम से पहले एडवोकेट लिखते है? दरगाह हज़रत अब्बास अस की कमेटी अगर दरगाह हज़रत अब्बास अस के सामने हजरत इमाम हुसैन अस के रोज़े की तामीर करवाकर उसे बैनुल हरमैन की शबीह बनवाना चाहती है तो ये कमेटी पर निर्भर करता है। लेकिन वाकिफ की मंशा को दरगाह कमेटी को एक नजर खुद पढ़ना भी चाहिए और अंजुमन हाए मातमी दस्तों के सामने रखना भी चाहिए ताकि वाकिफ की मंशा के अनुसार कार्य किया जाए,जो शरई और क़ानूनी दायरे में उचित हो। मीसम रिज़वी ने एक इंटरव्यू में कहा है कि अगर वक्फ बोर्ड कहेगा तो कार्य हेतु टेंडर भी करवाएगे।
बताते चले,हर बात वक्फ नहीं कहता बल्कि खुद भी किसी वक्फ एक्सपर्ट या वक्फ के अधिवक्ताओं या वक्फ के जानकारों से भी जानकारी प्राप्त कर लेना चाहिए।
ग़ौरतलब है,एक करोड़ रुपये के कार्य के लिए बड़े समाचार पत्रों में निविदा (टेंडर) निकालकर कार्य करवाना बोर्ड के नियमों और पारदर्शिता के अनुसार अपेक्षित है।
मुख्य कारण और नियम
वक्फ बोर्ड एक सार्वजनिक/स्वायत्त संस्था है जो वक्फ एक्ट, 1995 (और उसके संशोधनों) के तहत कार्य करती है। यह उत्तर प्रदेश सरकार के अधीन आती है, इसलिए जनरल फाइनेंशियल रूल्स (जी आर एफ), यूपी प्रोक्योरमेंट गाइडलाइंस और बोर्ड के अपने वित्तीय/प्रोक्योरमेंट नियम लागू होते हैं।
बड़े मूल्य के कार्यों (जैसे 1 करोड़) के लिए एडवर्टाइज टेंडर इंक्वायरी (खुली निविदा) अनिवार्य है। इसमें बड़े समाचार पत्रों (राष्ट्रीय/क्षेत्रीय) में प्रकाशन, ई-टेंडर पोर्टल (जैसे यूपी ई-टेंडर) पर अपलोड और पारदर्शी बिडिंग प्रक्रिया शामिल होती है। छोटे कार्यों के लिए लिमिटेड टेंडर या कोटेशन्स पर्याप्त हो सकते हैं, लेकिन 1 करोड़ जैसी राशि पर खुली निविदा मानक है।

वक्फ एक्ट और संबंधित प्रावधान
बोर्ड को वक्फ संपत्तियों (दरगाह, इमामबाड़ा आदि) के रखरखाव, निर्माण या विकास के लिए व्यय करना होता है। सेक्शन 32 आदि के तहत बोर्ड की जिम्मेदारी है कि फंड का उपयोग उचित, पारदर्शी और लाभकारी तरीके से हो।
यूपी वक्फ रूल्स 2024 (सुन्नी/शिया दोनों के लिए) भी प्रशासनिक पारदर्शिता पर जोर देते हैं।
इसलिए दरगाह कमेटी ने पहले के कार्यों में टेंडर न करके वक्फ एक्ट की खिलाफ वर्ज़ी की है और अब अपनी गलती शिया वक्फ बोर्ड के कंधों पर रखकर कहा जा रहा है कि अगर वक्फ बोर्ड कहेगा तो समाचार पत्रों में टेंडर सूचना निकलवाएंगे और टेंडर करवा कर काम किया जाएगा। आज भी लोगों का आरोप है कि पहले टेंडर क्यों नहीं निकाले और मीसम रिज़वी ने क्यों अपने बहनोई को काम दिए ? क्या दरगाह अपने आप करोड़ों का काम खुद नहीं करवा सकती थी ?हालांकि एक फेसबुकिए पत्रकार को दिए गए एक इंटरव्यू में मीसम ने कहा कि सारा काम दरगाह द्वारा करवाया जा रहा है। लेकिन विगत 2 वर्ष पूर्व कई समाचार पत्रों में दरगाह हज़रत अब्बास अस के प्रशासक मीसम रिज़वी के विरुद्ध प्रकाशित खबरों पर अगर नज़र डाली जाए तो उसमें आरोप लगे थे कि मीसम रिज़वी ने अपने बहनोई रज़ा अब्बास को बिना टेंडर के काम देकर सीधा लाभ पहुंचाया है। हालांकि इसके अलावा भी कुछ और संगीन आरोप लगे थे जिसका हवाला देना जरूरी नहीं है।
लोगों का कहना है ,दरगाह हज़रत अब्बास अस या किसी भी बड़े वक्फ का कार्य पारदर्शिता के साथ होना चाहिए। मीसम द्वारा दिए गए उसी इंटरव्यू में कहा गया था कि जो चाहे शिया सेन्ट्रल वक़्फ़ बोर्ड जाकर एक प्रार्थना पत्र देकर मेरे वक्फ की बैलेंस शीट निकलवाकर देख सकता है।अगली खबर में बैलेंस शीट की क्या हैसियत है ,इसपर विस्तार से चर्चा की जाएगी।
जारी……




