ज़की भारतीय ✍🏼

लखनऊ, 2 मई । लखनऊ के ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल दरगाह हज़रत अब्बास (अ.स.) की भूमि पर अवैध निर्माण की घटना ने एक बार फिर वक्फ बोर्ड, प्रशासन और स्थानीय पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने इस मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए शिकायतकर्ता दानिश रजा (फाजिलनगर, थाना सआदतगंज, लखनऊ) की शिकायत पर तुरंत संज्ञान लिया और मुतवल्ली मीसम रिजवी को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। बोर्ड ने जिलाधिकारी (DM) लखनऊ और पुलिस कमिश्नर/एसएसपी लखनऊ को स्पष्ट पत्र भेजकर अवैध निर्माण तुरंत रोकने, दोषियों की जांच करने और सख्त कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे।शिकायत में आरोप लगाया गया था कि दरगाह परिसर में पहले से मौजूद कुछ दुकानों / घरों को तोड़कर उनकी जगह अवैध रूप से नई दुकानों का निर्माण किया जा रहा है। इन दुकानों के निर्माण के लिए शिया वक्फ बोर्ड से कोई पूर्व अनुमति नहीं ली गई। इसके अलावा प्रार्थना पत्र में वित्तीय अनियमितताओं का भी गंभीर आरोप लगाया गया — बैलेंस शीट पर सदर मौलाना कल्बे जव्वाद साहब और उप-सचिव सैयद इफ्तिखार हुसैन (मीसम) के हस्ताक्षर नहीं होने का मामला भी उठाया गया।बोर्ड ने मुतवल्ली मीसम रिजवी को स्पष्ट चेतावनी दी कि सदर और उप-सचिव की लिखित अनुमति के बिना कोई भी निर्माण पूरी तरह अवैध है और इसे तुरंत रोका जाए। साथ ही प्रशासन को मोक़े पर जाकर निर्माण कार्य रोकने और दोषियों पर कार्रवाई करने का कड़ा निर्देश दिया गया।लेकिन आदेश जारी होते ही उल्टा खेल शुरू हो गया। शिया वक्फ बोर्ड के इस सख्त पत्र के कुछ ही घंटों बाद दरगाह हज़रत अब्बास के बाहर अवैध दुकानों का निर्माण रातोरात युद्ध स्तर पर तेज हो गया। गिट्टी, बालू, भवन सामग्री, लेबर और मिस्त्रियों की भारी भीड़ जुटा ली गई। देर रात तक निर्माण कार्य जोर-शोर से चल रहा है। जो काम पहले धीरे-धीरे चल रहा था, वक्फ बोर्ड के आदेश के तुरंत बाद अचानक तेज हो गया।स्थानीय लोगों और सूत्रों का आरोप है कि यह निर्माण दरगाह के कुछ प्रभावशाली मोहल्लेवालों की सरपरस्ती में हो रहा है। इलाकाई पुलिस की मिलीभगत के बिना रात के अंधेरे में इस स्तर का निर्माण कार्य संभव नहीं था। कई लोगों ने रात में पुलिस को शिकायत की, लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। इससे साफ जाहिर होता है कि स्थानीय पुलिस या तो आंखें मूंदे बैठी है या फिर इसमें प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से शामिल है।

कानूनी उल्लंघन की पूरी श्रृंखला
यह निर्माण न सिर्फ शिया वक्फ बोर्ड के नियमों का उल्लंघन है, बल्कि कई अन्य विभागों के नियमों को भी ठेंगा दिखा रहा है:आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) या संरक्षित क्षेत्र होने के कारण भी कोई निर्माण बिना अनुमति के नहीं हो सकता। लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) से कमर्शियल दुकानों के निर्माण के लिए नक्शा पास कराना, फीस जमा करना और आर्किटेक्ट द्वारा डिजाइन स्वीकृत कराना अनिवार्य है। इनमें से कोई भी प्रक्रिया नहीं अपनाई गई। शिया वक्फ बोर्ड की किसी भी संपत्ति पर कोई भी निर्माण या कमर्शियल गतिविधि बिना बोर्ड की लिखित अनुमति के पूरी तरह अवैध मानी जाती है।
शिकायतकर्ता दानीश रजा ने बोर्ड को लिखित शिकायत में इन सभी बिंदुओं पर गंभीरता से ध्यान देने की मांग की थी। बोर्ड ने भी अपनी रिपोर्ट में इन तथ्यों को स्वीकार करते हुए सख्त निर्देश जारी किए।
पूरा प्रकरण सवालों के घेरे में
इस निर्माण मामले में जहां शिया वक्फ बोर्ड के आदेश की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं वहीं लखनऊ विकास प्राधिकरण और पुरातत्व विभाग के नियमों के विरुद्ध निर्माण कार्य जारी है। यह काम किसके इशारे पर और किसकी सरपरस्ती में चल रहा है ,ये अपने आप में एक प्रश्न है,जिसका उत्तर किसी के पास नहीं है। ऐसा लगता है कि बोर्ड का पत्र लीक होने के बाद ही निर्माण कार्य में इसलिए तेजी आई है ताकि जांच से पूर्व ही निर्माण पूर्ण कर लिया जाए और दुकानें बनकर तैयार हो जाएं। जिलाधिकारी और एसएसपी को दिए गए स्पष्ट निर्देशों पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई? कल जब जांच टीम पहुंचेगी, तब तक दुकानें पूरी तरह बनकर तैयार हो जाएंगी तो फिर क्या होगा? कब्जा कर लिया जाएगा और बाद में “फैक्ट अकॉम्प्लिश्ड” (हो चुका काम) का हवाला देकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की जाएगी?
स्थानीय लोगों में आक्रोश है। उनका कहना है कि एक बार दुकानें बनकर तैयार हो गईं तो उन्हें संबंधित लोगों को सौंप दिया जाएगा और लंबी कमाई की मोटी रकम वसूल कर ली जाएगी। दरगाह की पवित्र भूमि को इस तरह व्यावसायिक हितों के लिए इस्तेमाल करना न सिर्फ कानूनी अपराध है, बल्कि धार्मिक भावनाओं के साथ भी खिलवाड़ है। इस पूरे मामले में शिया वक्फ बोर्ड, जिलाधिकारी लखनऊ और पुलिस प्रशासन से अब सख्त कार्रवाई की मांग की जा रही है। अवैध निर्माण को तुरंत रोका जाए, दोषी मुतवल्ली और अन्य जिम्मेदार लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाए। निर्माण पूरा होने के बाद भी इसे अवैध मानते हुए डिमोलिश (ध्वस्त) किया जाए, क्योंकि यह बिना किसी अनुमति और नियमों का उल्लंघन करते हुए बनाया जा रहा है।वक्फ बोर्ड की साख और दरगाह हज़रत अब्बास की पवित्रता दोनों दांव पर हैं। अगर इस मामले में भी ढिलाई बरती गई तो यह सिर्फ एक निर्माण का मामला नहीं, बल्कि वक्फ संपत्तियों पर कब्जे की पूरी माफिया व्यवस्था को बढ़ावा देने वाला उदाहरण बन जाएगा।प्रशासन अब कितनी देर तक चुप्पी साधे रहेगा? क्या जिलाधिकारी और एसएसपी बोर्ड के पत्र पर तुरंत एक्शन लेंगे या फिर कल “जांच” का नाम लेकर समय बिताया जाएगा?



