HomeCITYलखनऊ में आठ मोहर्रम के अवसर पर इमामबाड़ों, दरगाहों और अज़ाख़ानों में...
लखनऊ में आठ मोहर्रम के अवसर पर इमामबाड़ों, दरगाहों और अज़ाख़ानों में आयोजित हुईं मजलिसे,गूंजी या अब्बास या सकीना की सदाएं
लखनऊ, 24 जून। आठ मोहर्रम के अवसर पर राजधानी लखनऊ के विभिन्न इमामबाड़ों, दरगाहों, मस्जिदों और अज़ाख़ानों में मजलिसों, मर्सियाख़्वानी, नौहाख़्वानी और मातम का सिलसिला सुबह से देर शाम तक जारी रहा। शहर भर में अज़ादारों ने शोहदाए कर्बला को ख़िराजे अकीदत पेश किया।
विक्टोरिया स्ट्रीट स्थित शिया पीजी कॉलेज में सुबह की पहली मजलिस का आयोजन हुआ। इसके बाद इमामबाड़ा गुफ़रान मआब में मौलाना सैयद कल्बे जवाद नक़वी ने मजलिस को ख़िताब किया। वहीं इमामबाड़ा आगा बाक़िर में मौलाना सैयद मीसम ज़ैदी ने मजलिस को संबोधित किया, जबकि इमामबाड़ा नाज़िम साहब में मर्सियाख़्वानी का सिलसिला जारी रहा। आठवीं मोहर्रम की विशेष मर्सियाख़्वानी में मर्सियाख़्वान ने अपने मक़सूस अंदाज़ में कर्बला के दर्दनाक मंजर पेश कर अज़ादारों को अश्कबार कर दिया।
इमामबाड़ा आगा बाक़िर की मजलिस में मौलाना सैयद मीसम ज़ैदी ने हज़रत अली (अ.स.) की फ़ज़ीलत बयान करते हुए हज़रत अब्बास (अ.स.) की शुजाअत, वफ़ादारी और शहादत पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने एक रिवायत बयान करते हुए कहा कि बचपन में एक बार इमाम हुसैन (अ.स.) ने पानी तलब किया। हज़रत अली (अ.स.) ने देखा कि छोटे अब्बास (अ.स.) अपने सर पर पानी रखे इमाम हुसैन (अ.स.) की ख़िदमत में हाज़िर हो रहे हैं और पानी उनके कुर्ते पर छलक रहा है। यह मंजर देखकर मौला अली (अ.स.) की आंखों में आंसू आ गए। लोगों ने पूछा कि यह तो ख़ुशी का मंजर है, फिर आप क्यों रो रहे हैं? इस पर हज़रत अली (अ.स.) ने फ़रमाया कि आज मैं अब्बास के कुर्ते पर पानी के छींटे देख रहा हूं, लेकिन एक दिन यही अब्बास कर्बला में हुसैन (अ.स.) के बच्चों के लिए पानी लेने जाएगा और उसके कुर्ते पर पानी नहीं बल्कि ख़ून के धब्बे होंगे।
मौलाना ने कहा कि कर्बला में जब शहज़ादी सकीना (स.अ.) की प्यास की सदाएं बुलंद हुईं तो हज़रत अब्बास (अ.स.) बार-बार इमाम हुसैन (अ.स.) से मैदान में जाने की इजाज़त मांगते रहे। इमाम हुसैन (अ.स.) उन्हें सब्र की ताकीद करते हुए फ़रमाते थे कि आप लश्कर के अलमदार और फ़ौज के सरदार हैं। आखिरकार जब बच्चों की प्यास असहनीय हो गई तो इमाम हुसैन (अ.स.) ने पानी लाने की इजाज़त दी।
मौलाना ने बयान किया कि हज़रत अब्बास (अ.स.) मश्क लेकर फ़ुरात की ओर रवाना हुए। रवाना होने से पहले शहज़ादी ज़ैनब (स.अ.) ने पर्दा उठाकर अपने भाई को आख़िरी बार देखा। हज़रत अब्बास (अ.स.) ने दरिया से मश्क भरी और ख़ेमों की ओर लौटने लगे, लेकिन यज़ीदी फ़ौज ने चारों तरफ़ से घेर लिया। दुश्मनों के तीरों ने मश्क को छलनी कर दिया और पानी बहने लगा। एक तीर सीने में आकर लगा, जबकि दूसरे तीरों ने जिस्म को ज़ख़्मी कर दिया। आंख पर तीर लगने के बाद जब हज़रत अब्बास (अ.स.) उसे निकालने की कोशिश कर रहे थे, तभी दुश्मन ने सर पर वार किया, जिससे वह ज़मीन पर आ गिरे। मौलाना ने कहा कि उस वक़्त इमाम हुसैन (अ.स.) ने अपने भाई के पास पहुंचकर दर्द भरे अल्फ़ाज़ में फ़रमाया, “अब्बास, तुम्हारी शहादत से मेरी कमर टूट गई।”
इस दर्दनाक मसायब के बयान पर इमामबाड़ा आगा बाक़िर में मौजूद अज़ादारों की आंखें अश्कबार हो गईं और “या अब्बास”, “या सकीना” की सदाओं के बीच माहौल ग़मगीन हो उठा। मजलिस के बाद ताबूत बरामद हुआ, जिसकी अज़ादारों ने ज़ियारत की। इसके बाद नौहाख़्वानी और मातम का सिलसिला शुरू हुआ। अज़ादारों ने सीना ज़नी कर शोहदाए कर्बला को ख़िराजे अकीदत पेश किया और इस अज़्म का इज़हार किया कि अगर हम कर्बला में मौजूद होते तो अपनी जानें इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके वफ़ादार साथियों पर निछावर कर देते।
आठ मोहर्रम के अवसर पर लखनऊ के विभिन्न इमामबाड़ों, दरगाहों और अज़ाख़ानों में आयोजित मजलिसों में बड़ी संख्या में अज़ादारों ने शिरकत की तथा हज़रत अब्बास (अ.स.) की वफ़ा, बहादुरी और कुर्बानी को याद करते हुए उन्हें पुरसा पेश किया।
Post Views: 138