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निजी इमामबाड़े की मरम्मत को लेकर फैली अफवाह, पुलिस जांच में तोड़फोड़ के आरोप निराधार; माहौल बिगाड़ने की कोशिश पर कार्रवाई की तैयारी
ज़की भारतीय ✍🏼
लखनऊ,17 जून। पुराने लखनऊ के सआदतगंज थाना क्षेत्र में एक निजी इमामबाड़े की मरम्मत को लेकर सोशल मीडिया पर प्रसारित की गई भ्रामक सूचना के बाद पुलिस प्रशासन को तत्काल हस्तक्षेप करना पड़ा। पुलिस जांच में प्रथम दृष्टया यह तथ्य सामने आया कि जिस स्थान को लेकर इमामबाड़े में तोड़फोड़ और मोहर्रम के माहौल को प्रभावित करने के आरोप लगाए जा रहे थे, वहां वास्तव में मकान मालिक अपने निजी इमामबाड़े की पुरानी छत की मरम्मत और स्लैब डलवाने का कार्य करा रहे थे ताकि बरसात के दौरान पानी का रिसाव रोका जा सके। प्राप्त जानकारी के अनुसार अब्बास नामक व्यक्ति का कहना है कि संबंधित संपत्ति उनके परिवार की पैतृक संपत्ति है, जो वर्ष 1929 में उनके नाना द्वारा उनकी माता को प्राप्त हुई थी। बाद में परिवार के सदस्यों के बीच संपत्ति का बंटवारा हुआ। अब्बास के अनुसार उन्होंने अपने हिस्से का भाग विधिवत खरीदकर कब्जे में लिया और कई वर्ष पहले पुरानी जर्जर छत हटाकर नई दीवारें खड़ी की थीं, ताकि भविष्य में स्लैब डाली जा सके। अब्बास का आरोप है कि पड़ोस में रहने वाली एक महिला से उनका संपत्ति संबंधी विवाद न्यायालय में लंबित है,जिसमें उसके मकान पर इस बात का दावा किया गया है कि वो जिस भवन में रहती है वो भवन भी अब्बास की पैत्रिक संपत्ति है। उनका कहना है कि इसी विवाद के चलते उनके निर्माण कार्य को लेकर आपत्तियां उठाई गईं और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर ऐसी सूचना प्रसारित कराई गई, जिसमें यह दर्शाने का प्रयास किया गया कि मोहर्रम के दौरान किसी सार्वजनिक इमामबाड़े को क्षति पहुंचाई जा रही है। उक्त संदेश में पुलिस अधिकारियों, यूपी-112 तथा अन्य सरकारी अधिकारियों को टैग कर मामले को सांप्रदायिक और धार्मिक स्वरूप देने का प्रयास किया गया। सूचना मिलते ही सआदतगंज पुलिस सक्रिय हुई और तत्काल मौके पर पहुंचकर जांच की। क्षेत्रीय पुलिस अधिकारियों एवं इंस्पेक्टर द्वारा किए गए निरीक्षण में यह तथ्य सामने आया कि निर्माण कार्य निजी संपत्ति पर किया जा रहा था तथा वहां किसी सार्वजनिक धार्मिक स्थल में तोड़फोड़ जैसी स्थिति नहीं पाई गई। स्थानीय स्तर पर की गई जांच में भी किसी प्रकार की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने या मोहर्रम संबंधी गतिविधियों में बाधा डालने का कोई प्रमाण नहीं मिला। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि मोहर्रम जैसे संवेदनशील अवसर पर बिना सत्यापन के सोशल मीडिया पर इस प्रकार की सूचनाएं प्रसारित करना न केवल कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती उत्पन्न कर सकता है, बल्कि सांप्रदायिक सौहार्द को भी प्रभावित कर सकता है। स्थानीय नागरिकों ने मांग की है कि मामले की निष्पक्ष जांच कर यह पता लगाया जाए कि भ्रामक सूचना किसने प्रसारित की और उसके पीछे क्या उद्देश्य था। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर पुलिस या प्रशासन को झूठी सूचना देता है अथवा सोशल मीडिया के माध्यम से ऐसा संदेश प्रसारित करता है जिससे शांति व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका उत्पन्न हो, तो उसके विरुद्ध विभिन्न धाराओं में कार्रवाई संभव है। परिस्थितियों और जांच में प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 217 (लोक सेवक को गलत सूचना देना), धारा 353(2) (अफवाह या भ्रामक सूचना के माध्यम से वैमनस्य या अशांति फैलाने का प्रयास), धारा 196 (विभिन्न समुदायों के बीच वैमनस्य बढ़ाने से संबंधित प्रावधान, यदि तत्व पाए जाएं), तथा अन्य प्रासंगिक धाराएं लागू हो सकती हैं। इसके अतिरिक्त यदि सोशल मीडिया पोस्ट से सार्वजनिक शांति भंग होने की संभावना उत्पन्न हुई हो तो सूचना प्रौद्योगिकी कानून एवं साइबर अपराध संबंधी प्रावधानों के तहत भी जांच की जा सकती है स्थानीय नागरिकों का यह भी कहना है कि पुराने लखनऊ में कई बार निजी संपत्ति संबंधी विवादों को धार्मिक या विरासत संरक्षण के मुद्दों का रूप देकर प्रशासनिक कार्रवाई प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है। हालांकि प्रत्येक मामले में तथ्यों की स्वतंत्र जांच आवश्यक होती है और किसी भी पक्ष को दोषी मानने से पहले विधिक प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। इस प्रकरण में भी पुलिस द्वारा त्वरित कार्रवाई और मौके पर जाकर वास्तविक स्थिति का निरीक्षण किए जाने से संभावित भ्रम की स्थिति समाप्त हुई। क्षेत्र के लोगों ने पुलिस की तत्परता की सराहना करते हुए मांग की है कि सोशल मीडिया पर अपुष्ट और भ्रामक सूचनाएं प्रसारित करने वाले व्यक्तियों तथा संबंधित हैंडल की भूमिका की भी जांच की जाए, ताकि भविष्य में कोई व्यक्ति मोहर्रम या अन्य धार्मिक अवसरों पर अफवाह फैलाकर सामाजिक सौहार्द को प्रभावित न कर सके। पुलिस का कहना है कि यदि जांच में झूठी सूचना प्रसारित करने या प्रशासन को गुमराह करने के पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं तो संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध विधिक कार्रवाई की जाएगी। वहीं क्षेत्रीय नागरिकों का मानना है कि ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई से अफवाह फैलाने वालों पर अंकुश लगेगा और धार्मिक अवसरों पर शांति एवं सौहार्द का वातावरण बनाए रखने में मदद मिलेगी।
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