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हुसैनाबाद ट्रस्ट की भूमि पर मंदिर निर्माण या आने वाले समय में होगी यहीं से कारसेवा की तय्यारी?
ज़की भारतीय ✍🏼
लखनऊ,13 जून। राजधानी लखनऊ के ऐतिहासिक हुसैनाबाद क्षेत्र में स्थित आजादारी रोड पर हुसैनाबाद एंड एलाइड ट्रस्ट की भूमि पर हुए मंदिर निर्माण को लेकर शिया समुदाय में नाराजगी बढ़ती जा रही है। विभिन्न धार्मिक, सामाजिक और अंजुमनी संगठनों ने आरोप लगाया है कि ट्रस्ट की संपत्ति पर धीरे-धीरे स्थायी धार्मिक ढांचा खड़ा कर दिया गया है और संबंधित अधिकारी इस पूरे मामले में चुप्पी साधे हुए हैं।समुदाय के प्रतिनिधियों का कहना है कि यह विवाद किसी धर्म विशेष के विरोध का नहीं बल्कि भूमि के स्वामित्व और कानून के शासन का है। उनका कहना है कि मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च सभी का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन किसी भी धार्मिक स्थल का निर्माण वैधानिक और अधिकृत भूमि पर ही होना चाहिए। यदि किसी अन्य संस्था, ट्रस्ट या व्यक्ति की भूमि पर बिना स्पष्ट अनुमति के धार्मिक ढांचा खड़ा किया जाता है तो वह भविष्य में विवाद का कारण बन सकता है। शिया संगठनों का दावा है कि जिस भूमि पर निर्माण हुआ है वह हुसैनाबाद ट्रस्ट की संपत्ति है। यह ट्रस्ट अवध के नवाब मोहम्मद अली शाह द्वारा स्थापित किया गया था और उसकी संपत्तियां शिया समुदाय की धार्मिक गतिविधियों, विशेष रूप से अज़ादारी और उससे जुड़े कार्यों के लिए समर्पित की गई थीं। समुदाय के लोगों का कहना है कि आजादारी रोड का नाम ही इस ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के कारण पड़ा था और बाद में सरकारी सड़क का स्वरूप विकसित हुआ।

स्थानीय लोगों के अनुसार रूमी गेट चौकी के सामने स्थित स्थान पर पहले एक पीपल का पेड़ था। आरोप है कि कुछ समय पहले वहां धार्मिक प्रतिमाएं स्थापित की गईं, उसके बाद अस्थायी पूजा स्थल बनाया गया और धीरे-धीरे उसका विस्तार किया जाता रहा। बीते महीनों में वहां टाइल्स, प्रवेश द्वार तथा अन्य संरचनाएं बनाई गईं और हाल के दिनों में टीन शेड भी स्थापित कर दिए गए। स्थानीय लोगों का दावा है कि अब वहां एक स्पष्ट मंदिर का स्वरूप दिखाई दे रहा है। साथ ही यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि आसपास व्यावसायिक उपयोग के लिए दुकानें भी विकसित की गई हैं।धर्मगुरुओं का कहना है कि यदि किसी निजी व्यक्ति की भूमि पर बिना अनुमति मंदिर बनाया जाए तो उसे गलत माना जाएगा, फिर किसी ट्रस्ट की संपत्ति पर ऐसा निर्माण कैसे स्वीकार किया जा सकता है। उनका तर्क है कि धार्मिक आस्था का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन भूमि स्वामित्व और कानूनी अधिकारों का सम्मान भी उतना ही आवश्यक है। इस पूरे मामले में कई उलेमा और सामाजिक संगठनों ने प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि जिस प्रकार प्रदेश में समय-समय पर सरकारी भूमि, सड़क, पार्क, नालों और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर बने अवैध निर्माणों के खिलाफ कार्रवाई की जाती रही है, उसी प्रकार ट्रस्ट की भूमि पर हुए निर्माण की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उत्तर प्रदेश में पिछले वर्षों के दौरान अतिक्रमण विरोधी अभियानों के तहत अनेक अवैध निर्माणों को हटाया गया है। इनमें विभिन्न प्रकार के ढांचे, मजारें, मदरसे, दुकानों के अतिक्रमण और अन्य निर्माण शामिल रहे हैं। प्रशासन का आधिकारिक रुख हमेशा यही रहा है कि सार्वजनिक अथवा विवादित भूमि पर किसी भी प्रकार का अतिक्रमण स्वीकार्य नहीं है। इसी आधार पर शिया संगठनों का कहना है कि कानून का पैमाना सभी के लिए समान होना चाहिए। लखनऊ समेत प्रदेश के कई शहरों में समय-समय पर सरकारी भूमि, पार्कों, चौराहों और सड़क किनारे बने धार्मिक ढांचों को लेकर विवाद उठते रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि एक बार किसी स्थान पर स्थायी धार्मिक संरचना खड़ी हो जाने के बाद प्रशासनिक कार्रवाई अत्यंत कठिन हो जाती है, इसलिए प्रारंभिक स्तर पर ही भूमि स्वामित्व और अनुमति की स्थिति स्पष्ट कर ली जानी चाहिए। हुसैनाबाद ट्रस्ट की संपत्तियों को लेकर पहले भी विवाद सामने आते रहे हैं। हाल ही में ट्रस्ट की भूमि पर लखनऊ विकास प्राधिकरण द्वारा किए जा रहे निर्माण कार्यों को लेकर भी शिया समुदाय ने विरोध दर्ज कराया था, जिसके बाद संबंधित कार्यों को रोकने की बात सामने आई थी। अब मंदिर निर्माण का मुद्दा भी उसी क्रम में एक बड़े विवाद का रूप लेता दिखाई दे रहा है। कई धर्मगुरुओं ने संकेत दिया है कि यदि मामले का समाधान नहीं हुआ तो प्रदेश स्तर पर उलेमा, अंजुमनों और सामाजिक संगठनों की संयुक्त बैठक बुलाई जाएगी। उनका कहना है कि ट्रस्ट की भूमि पर किसी भी प्रकार के नए निर्माण को रोका जाना चाहिए तथा संबंधित अधिकारियों से पूछा जाना चाहिए कि निर्माण किसकी अनुमति से हुआ। धर्मगुरुओं का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी धार्मिक समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है। उनका कहना है कि हिंदू समाज की आस्था का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन किसी भी धर्म की आस्था के नाम पर दूसरे की भूमि पर कब्जा या निर्माण स्वीकार नहीं किया जा सकता। उनका तर्क है कि भगवान राम सहित सभी धार्मिक परंपराएं न्याय, सत्य और अधिकारों के सम्मान की शिक्षा देती हैं। समुदाय के लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि हुसैनाबाद ट्रस्ट की संपत्तियों का व्यापक सर्वे कराया जाए, भूमि अभिलेख सार्वजनिक किए जाएं और जहां भी अतिक्रमण अथवा अनधिकृत निर्माण पाए जाएं वहां कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए। उनका कहना है कि यदि समय रहते इस विषय पर ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य में अनावश्यक विवाद और सामाजिक तनाव की स्थिति पैदा हो सकती है। उनका कहना है,आज जो अस्थायी मंदिर बना है आने वाले समय में एक बड़े विवाद की जड़ भी बन सकता है।क्योंकि मोहर्रम में कई जुलूस इसी मार्ग से होकर जाते हैं और एक दिन वो आयेगा जब हिंदू श्रद्धालु यहां कोई बड़ा कार्यक्रम रखेंगे और उसी दिन किसी मोहर्रम के जुलूस को निकलना हुआ तो टकराव की स्थिति पैदा होगी।उनका कहना है कल इसी मंदिर को केंद्रित करके कल बड़ी संख्या में टीले वाली मस्जिद को भी गिरवाने का प्रयास कुछ कट्टरपंथी कर सकते हैं। जैसा की टीले वाली मस्जिद को अभी से लक्ष्मण टीला बताया जा रहा है। फिलहाल यह मामला शहर में चर्चा का विषय बना हुआ है। शिया संगठनों का कहना है कि वे इस मुद्दे को शांतिपूर्ण, कानूनी और लोकतांत्रिक तरीके से उठाते रहेंगे ताकि हुसैनाबाद ट्रस्ट की ऐतिहासिक और धार्मिक संपत्तियों का संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।
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