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“हुसैनाबाद ट्रस्ट की ज़मीनों पर निर्माण को लेकर विवाद ,कोर्ट में हुसैनाबाद ट्रस्ट ने बोला झूठ, रूमी गेट में होगी 18 मई को विशाल बैठक
ज़की भारतीय ✍🏼
लखनऊ,15 मई। मोहम्मद अली शाह द्वारा स्थापित हुसैनाबाद ट्रस्ट और उससे जुड़ी संपत्तियों को लेकर एक बार फिर विवाद गहराता जा रहा है। रूमी गेट और हुसैनाबाद क्षेत्र में पार्किंग, कॉरिडोर, “लज़ीज़ गली” तथा अन्य निर्माण कार्यों की योजनाओं के बीच शिया उलेमा, अधिवक्ताओं और सामाजिक संगठनों ने सवाल उठाया है कि क्या वर्तमान प्रशासन वाकिफ़ यानी ट्रस्ट स्थापित करने वाले नवाब की मूल मंशा के अनुरूप कार्य कर रहा है या नहीं। ऐतिहासिक अभिलेखों और शोध पत्रों के अनुसार हुसैनाबाद एंड एलाइड ट्रस्ट की बुनियाद नवाब मोहम्मद अली शाह ने वर्ष 1838-39 में रखी थी। उस समय उन्होंने लगभग 12 लाख रुपये ईस्ट इंडिया कंपनी के खजाने में जमा कर एक स्थायी ट्रस्ट व्यवस्था बनाई थी, जिससे मिलने वाले ब्याज और आमदनी का उपयोग धार्मिक, सामाजिक और जनकल्याण के कार्यों में किया जाना तय किया गया था। इतिहासकारों और वक्फ मामलों के जानकारों के अनुसार मोहम्मद अली शाह की मंशा केवल इमारतें खड़ी करना नहीं थी, बल्कि शिया समाज की धार्मिक और सामाजिक जरूरतों को स्थायी सहारा देना था। उनके द्वारा बनाए गए इमामबाड़ों, अजाखानों और धार्मिक स्थलों की देखरेख, मुहर्रम की अज़ादारी, जरूरतमंद शिया मोमिनों की सहायता, गरीबों को राहत, लड़कियों की शादी, जियारत और धार्मिक शिक्षा जैसे कार्यों को प्राथमिक उद्देश्य माना गया था। यही कारण था कि उन्होंने ट्रस्ट की आय को एक नियमित धार्मिक-सामाजिक व्यवस्था से जोड़ा था। जानकार बताते हैं कि अवध के शासकों में यह परंपरा रही कि जो धार्मिक और ऐतिहासिक इमारतें बनाई जाएं, उनके रखरखाव और धार्मिक उपयोग के लिए स्थायी आर्थिक प्रबंध भी छोड़ा जाए। मोहम्मद अली शाह ने भी इसी नीति के तहत हुसैनाबाद ट्रस्ट की व्यवस्था की थी। बाद में अंग्रेजी शासन और स्वतंत्रता के बाद प्रशासनिक नियंत्रण बदलते रहे, लेकिन वक्फ की मूल प्रकृति धार्मिक न्यास की ही बनी रही।

अब शिया समुदाय की तंजीमों और शिया धर्मगुरु मौलाना सय्यद कल्बे जव्वाद नक़वी ने डीएम द्वारा करवाए जा रहे कार्यों का विरोध शुरू कर दिया है। गत दिनों मौलाना ने क्षेत्र का निरीक्षण भी किया था, जबकि एक शिया तंजीम ने इन निर्माण कार्यों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। रॉयल फैमिली ऑफ अवध के कुछ अफ़राद ने भी इसका विरोध करते हुए इसे गैर-कानूनी बताया है। मौलाना कल्बे जव्वाद ने एक वीडियो क्लिप जारी करते हुए 18 मई 2026 को शाम 7:30 बजे रूमी गेट पर एक बैठक बुलाई है, जिसमें उन्होंने कौम के तमाम उलमा-ए-किराम और अंजुमनों से शिरकत करने की अपील की है। इस मामले में खानदान-ए-नवाबीन-ए-अवध के सरताज आलम और प्रिंस मिर्ज़ा क़ायम रज़ा ने भी डीएम द्वारा कराए जा रहे निर्माण कार्यों की सख्त मुखालिफत की है। मिर्ज़ा क़ायम रज़ा ने बताया कि उन्होंने इस तरह की अनियमितताओं के खिलाफ पहले से ही न्यायालय में वाद दाखिल कर रखा है। उनका कहना है कि फूल मंडी, जो हुसैनाबाद ट्रस्ट की संपत्ति पर स्थित थी, उसकी भूमि सरकार ने चौड़ीकरण के नाम पर अपने कब्जे में ले ली। उन्होंने कहा कि चौड़ीकरण के नाम पर यदि हुसैनाबाद ट्रस्ट की जमीन ली गई है, तो वहां बनने वाली दुकानों का अधिकार खानदान-ए-अवध और मुस्तहक़ शियों को मिलना चाहिए।

उन्होंने बताया कि आज उसी वाद पर न्यायालय में सुनवाई थी। क़ायम रज़ा के अनुसार, अदालत में हुसैनाबाद ट्रस्ट की ओर से दाखिल जवाब में कहा गया है कि सरकार की तरफ से अभी तक निर्माण कार्यों के संबंध में कोई आदेश जारी नहीं किया गया है। मामले की अगली सुनवाई 8 जुलाई को होगी।
अब बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब अदालत में हुसैनाबाद ट्रस्ट यह कह रहा है कि सरकार की तरफ से कोई आदेश जारी नहीं हुआ, तो फिर मौके पर निर्माण कार्य किस आधार पर चल रहे हैं? लोगों का आरोप है कि वर्तमान समय में ट्रस्ट की संपत्तियों के साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा है मानो वह सामान्य सरकारी भूमि हो, जबकि वक्फ नियमों के अनुसार यह संपत्ति वाकिफ़ की शर्तों और मंशा से बंधी होती है। उनका कहना है कि जिलाधिकारी केवल प्रशासकीय “केयरटेकर” या निगरानीकर्ता की भूमिका में होते हैं, मालिक नहीं। इसलिए किसी भी निर्माण, व्यावसायिक उपयोग, पार्किंग या स्थायी ढांचे का निर्णय वक्फ की मूल शर्तों के अनुरूप होना चाहिए।
समुदाय के कई लोगों का कहना है कि यदि मोहम्मद अली शाह की वसीयत और वक्फ अनुबंध की मूल भावना को नज़रअंदाज़ कर प्रशासनिक परियोजनाएं चलाई जाएंगी, तो यह वाकिफ़ की मंशा के खिलाफ माना जाएगा। शिया उलेमा और अधिवक्ताओं से मांग की जा रही है कि वे अदालत में रिट दाखिल कर यह स्पष्ट करवाएं कि हुसैनाबाद ट्रस्ट की संपत्तियों का उपयोग केवल उन्हीं उद्देश्यों के लिए हो सकता है, जिनके लिए यह वक्फ स्थापित किया गया था। विरोध करने वालों का कहना है कि हुसैनाबाद की जमीनें केवल ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि शिया समाज की धार्मिक अमानत हैं। इसलिए किसी भी विकास योजना से पहले वक्फ दस्तावेज, ट्रस्ट डीड और मोहम्मद अली शाह की मूल मंशा को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
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