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इमामे रिजा अस की शहादत पर शायर ए अहलेबैत नय्यर मजीदी के मकान में हुई मजलिस वा मसालमा
लखनऊ, 11 मई। मशहूर शायर ए अहलेबैत नय्यर मजीदी साहब के मकान में कल शब ए शहादत इमाम रिजा अस जहां एक मजलिस का एहतेमाम हुआ वही इमाम रिजा अस की याद में मसालमा संपन्न हुआ।
मजलिस को मौलाना अली मुतक़्की ज़ैदी साहब ने खिताब किया।मजलिस से क़ब्ल शायर ए अहलेबैत नासिर जरवली,हसन फ़राज़, शकील उतरौलवी, फरीद मुस्तफा, ताहिर कानपुरी,खुर्शीद हैदर उन्नावी, तनवीर नागरौलवी, कुमैल इलाहाबादी, शूमूम आरफी, खुशबूद मुस्तफा , फरमान लखनवी,असद करबलाई और नबील लखनवी ने बारगाह ए इमाम ए रिजा अस में मन्ज़ूम नज़रानए अक़ीदत पेश किया। मसालमे की निजामत कौसर रिज़वी ने की। मौलाना अली मुतक़्की ज़ैदी साहब ने मजलिस को खिताब करते हुए हज़रत इमाम अली ए रिज़ा अस की शहादत, उनके जीवन और फजीलत पर रोशनी डाली गई। उन्होंने कहा,इमाम अली रिज़ा (अ.स.) आठवें मासूम इमाम हैं। उनकी इमामत का दौर अब्बासी खलीफा मामून के समय था। इमाम को खुरासान (मशहद) बुलाकर शहीद किया गया, लेकिन उनकी याद आज भी करोड़ों अकीदतमंदों के दिलों में ज़िंदा है। उन्होंने कहा कि इमाम अली ए रिज़ा (अ.स.) ने कई धार्मिक और दार्शनिक बहसों में भाग लिया और सच्चाई को साबित किया। उन्होंने सख्त परिस्थितियों में भी धैर्य और नैतिकता का परिचय दिया। गरीबों की मदद, मेहमान नवाजी और लोगों के साथ अच्छा व्यवहार उनकी खासियत थी। उनकी तकरीरें लोगों को अल्लाह की तरफ, अहल-ए-बैत की मोहब्बत और इंसाफ की तरफ ले जाती थीं। मजलिस में इमाम रज़ा (अ.स.) के जीवन की घटनाओं, उनकी शहादत की दास्तान और शिया संप्रदाय की आस्था को विस्तार से बयान किया गया। मौलाना ने अकीदतमंदों को इमाम की सीरत पर अमल करने की ताकीद की। मजलिस में मातम, नोहा-ख़्वानी और दुआओं के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
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