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“जब तक दूसरे का था भ्रष्टाचारी था, हमारे साथ आया तो राष्ट्रवादी हो गया” — क्या यही है भाजपा की राजनीति?
ज़की भारतीय ✍🏼
भारतीय राजनीति में एक पुरानी कहावत है — “दुश्मन का आदमी गुनहगार, अपना आदमी संस्कारी।” आज के दौर में विपक्ष और सत्ता के बीच चल रही राजनीतिक लड़ाई को देखकर यह कहावत कई लोगों को सच होती दिखाई देती है। जब तक कोई नेता दूसरे दल में रहता है तब तक उस पर भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, घोटाले और जांच एजेंसियों की कार्रवाई की बातें जोर-शोर से उठाई जाती हैं, लेकिन वही नेता जैसे ही सत्ताधारी दल में शामिल होता है, उसके खिलाफ उठ रही आवाजें अचानक धीमी पड़ जाती हैं और वही व्यक्ति “जनसेवक”, “राष्ट्रवादी” और “ईमानदार” कहलाने लगता है।

इसी संदर्भ में पश्चिम बंगाल की राजनीति का उदाहरण बार-बार सामने आता है। सुविंदु अधिकारी जब तृणमूल कांग्रेस में थे तब उन पर “कट मनी” और कथित भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर भारतीय जनता पार्टी लगातार हमलावर रहती थी। चुनावी सभाओं में स्वयं नरेंद्र मोदी ने मंच से वीडियो और भाषणों के माध्यम से भ्रष्टाचार के मुद्दे उठाए थे। बाद में वही सुवेंदु अधिकारी भाजपा में शामिल हुए और पश्चिम बंगाल में भाजपा के सबसे बड़े चेहरों में गिने जाने लगे। आज विभिन्न राजनीतिक चर्चाओं और मीडिया रिपोर्टों में उन्हें भविष्य के मुख्यमंत्री चेहरे या मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में भी प्रस्तुत किया जाता रहा। यही वह बिंदु है जिस पर विपक्ष भाजपा पर “दोहरा चरित्र” अपनाने का आरोप लगाता है।
इसी प्रकार हिमांता बिस्वा शर्मा का उदाहरण भी दिया जाता है। कांग्रेस में रहते समय उन पर कई राजनीतिक आरोप लगे, लेकिन भाजपा में आने के बाद वे पार्टी के प्रमुख रणनीतिक नेताओं में शामिल हो गए और आज असम के मुख्यमंत्री हैं। विपक्ष का आरोप है कि जिन नेताओं पर कभी गंभीर सवाल उठाए जाते थे, वही सत्ता पक्ष में शामिल होते ही “पाक-साफ” घोषित कर दिए जाते हैं।
यूट्यूबर और राजनीतिक विश्लेषक ध्रुव राठी ने भी अपने वीडियो में इसी प्रकार की राजनीति पर सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार भारतीय राजनीति में एक ऐसी “वॉशिंग मशीन राजनीति” विकसित हो चुकी है जिसमें विपक्षी दल का नेता जांच एजेंसियों की रडार पर रहता है, लेकिन सत्ता पक्ष में शामिल होने के बाद उसके खिलाफ कार्रवाई की गति बदल जाती है या राजनीतिक चर्चा कमजोर पड़ जाती है। हालांकि यह ध्यान रखना आवश्यक है कि किसी भी वीडियो या विश्लेषण को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता; कानूनी रूप से दोष सिद्ध करना अदालत का कार्य है।
फिर भी जनता के बीच यह सवाल लगातार उठता है कि यदि कोई व्यक्ति कल तक भ्रष्टाचार का प्रतीक बताया जा रहा था, तो आज वही व्यक्ति सत्ता पक्ष में शामिल होकर अचानक ईमानदारी का प्रतीक कैसे बन गया? आलोचक व्यंग्य में यह तक कहने लगे हैं कि “अगर यही राजनीति का मापदंड रहा तो कल कोई बड़ा अपराधी भी सत्ता पक्ष में शामिल होकर राष्ट्रवादी घोषित कर दिया जाएगा।” हालांकि इस प्रकार की तुलना राजनीतिक आक्रोश और व्यंग्य के रूप में देखी जाती है, न कि कानूनी तथ्य के रूप में।
विपक्ष यह भी आरोप लगाता है कि केंद्रीय एजेंसियां जैसे इन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट और सेंटर फॉर इन्वेस्टिगेशन का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया जाता है। भाजपा इन आरोपों को सिरे से खारिज करती रही है और कहती है कि एजेंसियां कानून के अनुसार कार्य करती हैं तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को राजनीतिक रंग देना गलत है।
राजनीतिक विवाद केवल नेताओं तक सीमित नहीं हैं। चुनावी प्रक्रिया को लेकर भी विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है। कई विपक्षी दलों ने इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया की कार्यप्रणाली, ईवीएम की पारदर्शिता, स्ट्रॉन्ग रूम की निगरानी और मतदान प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि चुनाव संपन्न होने के बाद भी कई तकनीकी और प्रक्रियागत शंकाओं का पूरी तरह समाधान नहीं हुआ। हालांकि चुनाव आयोग और सरकार बार-बार यह कह चुके हैं कि भारतीय चुनाव प्रणाली सुरक्षित और विश्वसनीय है तथा ईवीएम से छेड़छाड़ के आरोप प्रमाणित नहीं हुए हैं।
इन सब परिस्थितियों ने भारतीय राजनीति में एक बड़ा नैतिक प्रश्न खड़ा कर दिया है — क्या भ्रष्टाचार का पैमाना व्यक्ति के कर्म से तय होगा या उसके राजनीतिक दल से? क्या किसी नेता की छवि उसके खिलाफ मौजूद आरोपों से बनेगी या उसके सत्ता पक्ष में शामिल हो जाने से बदल जाएगी?
आज देश की राजनीति में यही सबसे बड़ा विमर्श बनता जा रहा है कि “भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई” कहीं राजनीतिक सुविधा के अनुसार बदलने वाला नारा तो नहीं बनती जा रही। जनता के बीच उठते ये सवाल लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता, राजनीतिक नैतिकता और सत्ता की पारदर्शिता पर गंभीर बहस को जन्म दे रहे हैं।
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