ज़की भारतीय ✍🏼
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 केवल सत्ता परिवर्तन का चुनाव नहीं रहा, बल्कि यह चुनाव भारतीय लोकतंत्र, चुनावी प्रक्रिया और मतदाता अधिकारों पर एक बड़े राष्ट्रीय विमर्श का कारण बन गया। चुनाव परिणाम आने के बाद भी सबसे अधिक चर्चा जिस मुद्दे पर हो रही है, वह है SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के दौरान लाखों मतदाताओं के नाम वोटर सूची से हटाए जाने का विवाद। इसी विवाद के बीच पूर्व कलकत्ता हाईकोर्ट मुख्य न्यायाधीश टी एस शिवगणनम का SIR अपीलीय ट्रिब्यूनल से इस्तीफ़ा देना राजनीतिक और न्यायिक गलियारों में नई बहस को जन्म दे रहा है।

आधिकारिक रिपोर्टों और मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के दौरान 90 लाख से अधिक नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे। इनमें से लगभग 27 लाख लोगों ने अपने नाम बहाल कराने के लिए अपील की थी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद इन मामलों की सुनवाई के लिए 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल बनाए गए थे, जिनमें जस्टिस शिवगणनम भी शामिल थे। यहीं से सवाल खड़े होने शुरू हुए। जब लाखों लोगों के मताधिकार का प्रश्न न्यायिक प्रक्रिया में लंबित था, तब चुनाव इतnii जल्द क्यों कराए गए? यदि सर्वोच्च न्यायालय स्वयं इस विषय को गंभीर मान रहा था और अलग से अपीलीय व्यवस्था बनाई गई थी, तो क्या पहले विवादों का समाधान होना चाहिए था और उसके बाद मतदान होना चाहिए था? यह सवाल अब केवल विपक्षी दलों तक सीमित नहीं है, बल्कि सामान्य नागरिकों और संवैधानिक प्रक्रियाओं पर नज़र रखने वाले लोगों के बीच भी उठ रहा है। जस्टिस शिवगणनम ने अपने इस्तीफ़े में “व्यक्तिगत कारण” बताए हैं। लेकिन भारतीय राजनीति और न्यायपालिका के इतिहास में केवल इतना लिख देना हमेशा पूरी कहानी नहीं माना जाता। किसी भी संवेदनशील और ऐतिहासिक मामले में जब एक वरिष्ठ न्यायाधीश अचानक पद छोड़ देता है, तो स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में अनेक प्रश्न उठते हैं। विशेषकर तब, जब वही न्यायाधीश उन लाखों लोगों की अपील सुन रहा हो जिनके वोट का अधिकार प्रभावित हुआ हो। यह कहना उचित नहीं होगा कि इस्तीफ़े के पीछे कोई एक निश्चित कारण था, क्योंकि बिना प्रमाण किसी निष्कर्ष पर पहुँचना न्यायसंगत नहीं है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि ऐसे समय में इस्तीफ़ा राजनीतिक और सामाजिक चर्चाओं को तेज़ कर देता है। कुछ लोग इसे न्यायिक स्वतंत्रता का संकेत मान रहे हैं, तो कुछ इसे व्यवस्था पर बढ़ते दबाव का प्रतीक बता रहे हैं। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि जस्टिस शिवगणनम ने अपने कार्यकाल में लगभग 1777 अपीलों पर सुनवाई की और किसी भी अपील को खारिज नहीं किया। उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान गति से मामलों के निस्तारण में लगभग चार वर्ष लग सकते हैं। यह बयान अपने आप में बहुत कुछ कहता है। यदि लाखों लोगों के अधिकार से जुड़ा मामला वर्षों तक लंबित रहने वाला था, तो क्या चुनाव आयोग और प्रशासन को पहले इस प्रक्रिया को पूर्ण नहीं करना चाहिए था?

राजनीतिक दल लगातार आरोप लगा रहे हैं कि SIR प्रक्रिया पारदर्शी नहीं थी। विपक्षी दलों का आरोप है कि बड़ी संख्या में गरीब, अल्पसंख्यक और ग्रामीण मतदाताओं के नाम हटाए गए। वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया चुनावी शुद्धता और फर्जी मतदान रोकने के लिए आवश्यक थी। लेकिन लोकतंत्र में केवल निष्पक्ष होना पर्याप्त नहीं होता, निष्पक्ष दिखाई देना भी उतना ही आवश्यक होता है। जब लाखों लोग स्वयं को मताधिकार से वंचित महसूस करें, तब अविश्वास बढ़ना स्वाभाविक है। इस पूरे विवाद में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका भी चर्चा के केंद्र में है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपील व्यवस्था तो बनाई, लेकिन चुनाव प्रक्रिया को रोकने जैसा कठोर कदम नहीं उठाया। आलोचकों का कहना है कि यदि करोड़ों लोगों के वोट के अधिकार पर विवाद था, तो अदालत को और अधिक सक्रिय हस्तक्षेप करना चाहिए था। वहीं दूसरी ओर संवैधानिक विशेषज्ञों का तर्क है कि न्यायपालिका चुनाव आयोग के संवैधानिक अधिकारों में सीमित दायरे में ही हस्तक्षेप कर सकती है।
बंगाल चुनाव के दौरान और उसके बाद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सोशल मीडिया और अखबारों में लगातार स्ट्रॉन्ग रूम, CCTV फुटेज और मतदान प्रक्रिया पर सवाल उठते रहे हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के नेताओं ने भी कई मुद्दों पर आपत्ति दर्ज कराई है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक नहीं हुई है, लेकिन लोकतंत्र में संदेह भी उतना ही खतरनाक होता है जितना कोई वास्तविक अनियमितता। क्योंकि लोकतंत्र केवल परिणामों से नहीं, जनता के विश्वास से चलता है। यह भी उल्लेखनीय है कि जस्टिस शिवगणनम ने कुछ मामलों में मतदाताओं को राहत दी थी। एक मामले में उन्होंने आधार कार्ड सहित अन्य दस्तावेजों को स्वीकार करते हुए मतदाता सूची में नाम बहाल करने का आदेश दिया था। इससे यह धारणा बनी कि ट्रिब्यूनल स्तर पर कई ऐसे मामले थे जहाँ लोगों के नाम तकनीकी या प्रक्रियात्मक कारणों से हटे हो सकते थे। आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या भारत की चुनावी व्यवस्था उस स्तर तक पहुँच चुकी है जहाँ आम नागरिक बिना किसी संदेह के अपने मताधिकार को सुरक्षित महसूस करे? यदि नहीं, तो यह केवल बंगाल का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र के लिए चेतावनी है। जस्टिस शिवगणनम का इस्तीफ़ा केवल एक प्रशासनिक घटना नहीं रह गया है। यह उस अविश्वास का प्रतीक बनता जा रहा है जो धीरे-धीरे संस्थाओं के चारों ओर खड़ा हो रहा है। संभव है कि उनका इस्तीफ़ा वास्तव में निजी कारणों से हो, जैसा उन्होंने कहा है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि समय और परिस्थिति किसी भी घटना को सामान्य नहीं रहने देते। लोकतंत्र में मतदाता केवल एक संख्या नहीं होता। उसका वोट उसकी पहचान, उसकी भागीदारी और उसकी संवैधानिक शक्ति होता है। इसलिए यदि लाखों लोग यह महसूस करें कि उनकी आवाज़ कमजोर की गई है, तो यह चिंता केवल राजनीतिक नहीं बल्कि राष्ट्रीय हो जाती है। बंगाल का यह विवाद आने वाले वर्षों में चुनाव सुधार, न्यायिक हस्तक्षेप और चुनाव आयोग की भूमिका पर नई बहस को जन्म दे सकता है। और शायद यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश भी है।



