HomeArticleयूनिटी कॉलेज का कारनामा, फेल होने पर काटा निर्धन छात्रा का नाम

यूनिटी कॉलेज का कारनामा, फेल होने पर काटा निर्धन छात्रा का नाम

जकी भारतीय

लखनऊ, 18 मई। भारत में शिक्षा को ज्ञान की चाबी माना जाता है, जो देश की तरक्की का आधार है। लेकिन आज शिक्षा के क्षेत्र में कुछ निजी स्कूलों और कॉलेजों की नीतियां सवालों के घेरे में हैं। ऐसा ही एक मामला लखनऊ के हुसैनाबाद क्षेत्र में स्थित यूनिटी कॉलेज का सामने आया है, जहां यूनिटी कॉलेज सेकंड शिफ्ट में फेल होने वाले छात्रों का दोबारा दाखिला नहीं लिया जाता। इसका एक ज्वलंत उदाहरण है ख़ुशी फातिमा, जो कक्षा 3 की छात्रा थी। उसके रिजल्ट कार्ड के अनुसार, वह अपनी कक्षा में फेल हो गई थी और स्कूल ने उसका नाम काटकर उसे बाहर कर दिया।
सवाल यह है कि क्या यह नीति न्यायसंगत है? क्या कमजोर बच्चों को मजबूत करने की जिम्मेदारी स्कूलों की नहीं है? ख़ुशी फातिमा का रिजल्ट कार्ड इस बात का प्रमाण है कि कैसे स्कूल की नीतियां बच्चों के भविष्य को प्रभावित कर रही हैं। रिजल्ट कार्ड के अनुसार, ख़ुशी ने कई विषयों में कम अंक प्राप्त किए और कुल मिलाकर वह फेल हो गई। रिजल्ट में यह भी उल्लेख है कि “छात्र जो मेडिकल आधार पर प्रोमोट किए गए हैं, उन्हें रैंक नहीं दी जाएगी।” इसके बावजूद, खुशी को स्कूल से निकाल दिया गया, जो स्कूल की शत-प्रतिशत रिजल्ट नीति का हिस्सा है।

यूनिटी कॉलेज की स्थापना अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त धर्मगुरु डॉ. कल्बे सादिक साहब ने की थी, जिनका उद्देश्य था कि हर बच्चा, चाहे वह किसी भी धर्म या समुदाय से हो, शिक्षा प्राप्त करे। लेकिन आज यह कॉलेज अपनी शत-प्रतिशत रिजल्ट की नीति के लिए चर्चा में है। कॉलेज प्रशासन उन बच्चों का दाखिला रद्द कर देता है, जो परीक्षा में असफल हो जाते हैं। यह नीति न केवल बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है, बल्कि माता-पिता की मेहनत और आकांक्षाओं पर भी सवाल उठाती है।

कमजोर बच्चों का क्या?

हर बच्चा एक जैसा नहीं होता। कोई बच्चा बीमारी, पारिवारिक तनाव, या अन्य कारणों से पढ़ाई में पीछे रह सकता है। कुछ बच्चे एक-दो साल में पढ़ाई में रुचि खो देते हैं या फेल हो जाते हैं। लेकिन इतिहास गवाह है कि कई ऐसे लोग, जो स्कूल में फेल हुए, बाद में मेहनत और सही मार्गदर्शन से उच्च पदों पर पहुंचे। हाई कोर्ट के जज, आईएएस, पीसीएस जैसे पदों पर आज कई ऐसे लोग हैं, जो स्कूल में एक या दो बार असफल हुए थे। फिर स्कूलों को यह अधिकार किसने दिया कि वे फेल होने वाले बच्चों को दाखिला देने से मना कर दें, सिर्फ इसलिए कि उन्हें अपना रिजल्ट शत-प्रतिशत चाहिए?

शिक्षकों की जिम्मेदारी

शिक्षा की गुणवत्ता केवल बच्चों पर निर्भर नहीं होती। शिक्षकों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। अगर बच्चा किसी विषय या फॉर्मूले को नहीं समझ पाता, तो इसमें शिक्षक की शिक्षण शैली और दृष्टिकोण की भी कमी हो सकती है। विशेषज्ञ शिक्षकों को नियुक्त किया जाता है ताकि वे बच्चों को आसान और प्रभावी तरीके से पढ़ाएं। लेकिन जब शिक्षक ही बच्चों की कमजोरियों को समझने और उन्हें सुधारने में विफल रहते हैं, तो इसका ठीकरा बच्चों पर फोड़ना कहां तक उचित है?

शिक्षा या धंधा?

आज कई निजी स्कूल और कॉलेज शिक्षा को धंधा बना चुके हैं। शत-प्रतिशत रिजल्ट उनकी मार्केटिंग का हिस्सा बन गया है। अभिभावक यह सोचकर अपने बच्चों का दाखिला इन स्कूलों में कराते हैं कि यहां से उनके बच्चे उच्च अंकों के साथ पास होंगे और भविष्य में काबिल बनेंगे। लेकिन इस होड़ में कमजोर बच्चों को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। सवाल यह है कि अगर कमजोर बच्चे को मजबूत करने की जिम्मेदारी स्कूल नहीं लेगा, तो कौन लेगा? क्या इन बच्चों को अशिक्षित छोड़ देना ही समाधान है?

हिंदी मीडियम बनाम ICSE/CBSE का बोझ

आजकल अभिभावकों ने अपने दिमाग पर ICSE और CBSE बोर्ड को हावी कर लिया है, और स्कूल-कॉलेज की मनमानी फीस ने उनकी मदद की है। अभिभावकों को चाहिए कि वे अपने सर से ICSE और CBSE बोर्ड का भूत उतार दें। पहले के अधिकतर लोग हिंदी मीडियम स्कूलों और कॉलेजों में पढ़े हैं। उनकी अंग्रेजी बोलने की क्षमता भी अच्छी रही और उन्होंने इंग्लिश में पीएचडी तक की। उनमें से कई जज, IAS, PCS, डॉक्टर, इंजीनियर, टीचर, लेक्चरर, और असिस्टेंट प्रोफेसर बने। हिंदी मीडियम पढ़ाई किसी भी तरह से कमजोर नहीं थी। बच्चों को बस अपने आप मेहनत करनी पड़ती थी।
आज बच्चों को उससे ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। कॉलेज तो अब औपचारिकता के लिए जाते हैं, खासकर ICSE और CBSE बोर्ड के स्कूलों में। वहां के टीचर बस औपचारिक रूप से पढ़ा देते हैं, और हर बच्चे को घर पर अलग से पढ़ना पड़ता है। पढ़ाई का यह बोझ बच्चों पर बढ़ता जा रहा है। शत-प्रतिशत रिजल्ट के चक्कर में बच्चों के दिमाग में यह ख्वाब बैठा दिया गया है कि अगर 98% तक नंबर नहीं आए, तो वे कमजोर हैं। हर बच्चा अब 95%, 96%, 98% नंबर लाने की होड़ में लगा है। लेकिन आज 98% मार्क्स लाना भी कोई बड़ी बात नहीं रह गया, क्योंकि जब स्कूल कमजोर बच्चों को निकाल देता है और सिर्फ पढ़े-लिखे बच्चों को ही परीक्षा में बैठने देता है, तो रिजल्ट तो शत-प्रतिशत आएगा ही।
बेहतर होगा कि लोग हिंदी मीडियम की ओर रुझान करें और इंग्लिश मीडियम को अलविदा कहें, ताकि फीस का बढ़ता बोझ उनके कंधों को कमजोर न करे।कानूनी और सामाजिक सवालभारत में शिक्षा का अधिकार (राइट टू एजुकेशन) हर बच्चे का मौलिक अधिकार है। लेकिन क्या निजी स्कूलों की ऐसी नीतियां इस अधिकार का उल्लंघन नहीं करतीं? अगर कोई बच्चा फेल हो जाता है, तो उसे दोबारा मौका देना और उसकी कमजोरियों को दूर करना स्कूल की जिम्मेदारी होनी चाहिए। इसके बजाय, बच्चों को बाहर निकालकर स्कूल अपनी जिम्मेदारी से भाग रहे हैं। यह न केवल बच्चों के भविष्य के लिए खतरनाक है, बल्कि देश की प्रगति के लिए भी नुकसानदायक है।

समाधान की जरूरत

स्कूल प्रशासन को ऐसी नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए। कमजोर बच्चों के लिए विशेष कक्षाएं, अतिरिक्त मार्गदर्शन, और मनोवैज्ञानिक सहायता जैसे कदम उठाए जाने चाहिए। सरकार को भी इस दिशा में सख्त कानून बनाने की जरूरत है, ताकि निजी स्कूलों की मनमानी पर लगाम लगे। शिक्षा का उद्देश्य केवल रिजल्ट नहीं, बल्कि हर बच्चे के सर्वांगीण विकास होना चाहिए।
शिक्षा वह हथियार है, जो देश को तरक्की के शिखर पर ले जा सकता है। लेकिन अगर कमजोर बच्चों को शिक्षा के अवसर से वंचित किया जाएगा, तो यह न केवल उनके भविष्य के साथ अन्याय होगा, बल्कि देश के विकास को भी बाधा पहुंचेगी। यूनिटी कॉलेज जैसे संस्थानों को अपने संस्थापक के सपने को याद करना चाहिए और हर बच्चे को शिक्षा का अवसर देना चाहिए।
इसके साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में धंधेबाजी को रोकना होगा, ताकि हर बच्चा, चाहे वह कमजोर हो या मजबूत, अपने सपनों को साकार कर सके।आपकी राय मेरा मानना है कि स्कूलों को कमजोर बच्चों के लिए विशेष कदम उठाने चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य हर बच्चे को अवसर देना है, न कि उन्हें बाहर निकालना। स्कूलों को विशेष कक्षाएं, व्यक्तिगत मार्गदर्शन, और मनोवैज्ञानिक सहायता प्रदान करनी चाहिए ताकि कमजोर बच्चे भी अपनी क्षमता को पहचान सकें और आगे बढ़ सकें। साथ ही, अभिभावकों को भी बोर्ड और मीडियम के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलना चाहिए, ताकि बच्चों पर अनावश्यक दबाव न पड़े।
आप इस मुद्दे पर क्या सोचते हैं? क्या कमजोर बच्चों के लिए स्कूलों को विशेष कदम उठाने चाहिए?

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