ज़की भारतीय
भारत की राजनीति में बिहार हमेशा एक महत्वपूर्ण राज्य रहा है, जहां जाति, धर्म और विकास के मुद्दे चुनावी समीकरणों को तय करते हैं। 6 अक्टूबर 2025 को चुनाव आयोग द्वारा घोषित बिहार विधानसभा चुनाव की तिथियां – 6 और 11 नवंबर को दो चरणों में मतदान तथा 14 नवंबर को परिणाम की ख़बर ने राज्य की राजनीति को नई करवट दे दी है। यह चुनाव न केवल सत्ताधारी एनडीए (भाजपा-जदयू गठबंधन) और विपक्षी महागठबंधन (आरजेडी-कांग्रेस-वामपंथी) के बीच टकराव का मैदान बनेगा, बल्कि वोटर लिस्ट में कथित घोटाले, ईवीएम पर सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों तथा सामाजिक ध्रुवीकरण के मुद्दों पर भी केंद्रित होगा।
विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत वोटर लिस्ट में 65 लाख से अधिक नाम कटने का विवाद, जिसमें 80 लाख तक की संख्या होने का दावा विपक्ष कर रहा है, ने चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। साथ ही, ईवीएम की विश्वसनीयता पर सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिकाएं, जहां साबित हो चुका है कि ‘ईवीएम से जीता व्यक्ति हार गया और हारा व्यक्ति जीत गया’, ने संदेह की परतें और गाढ़ी कर दी हैं। राजनीतिक दल ईवीएम को ‘सेट’ बताते हुए चुनाव प्रभावित होने की आशंका जता रहे हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से चुनाव आयोग को वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने के लिए दस्तावेजों में छूट देने का निर्देश मिला है, जिससे धांधली पर कुछ अंकुश लगा है।
इस पृष्ठभूमि में, भाजपा की गिरती लोकप्रियता, सोशल मीडिया पर समर्थकों द्वारा मुसलमानों के खिलाफ जहर उगलना, मुख्यमंत्रियों और नेताओं के उत्तेजक बयान तथा दलितों पर बढ़ते अत्याचार – जैसे हालिया मोब लिंचिंग और सुप्रीम कोर्ट में दलित जज पर हमला – ने राजनीतिक परिदृश्य को जटिल बना दिया है। यह लेख इन मुद्दों का इकट्ठा लेखा-जोखा प्रस्तुत करता है, वेदों के श्लोकों के अनुवाद के माध्यम से जाति व्यवस्था की प्रतीकात्मक व्याख्या करता है तथा बिहार की राजनीति की संभावित दिशा का विश्लेषण करता है। यह सब बताता है कि चुनाव न केवल सत्ता की लड़ाई, बल्कि सामाजिक न्याय और समानता की जंग भी होगी।
बिहार चुनाव की घोषणा: एक नई शुरुआत या पुरानी चुनौतियां?
चुनाव आयोग की घोषणा के बाद बिहार की सियासत में हलचल मच गई है। 243 सीटों पर होने वाले इस चुनाव में एनडीए 131 सीटों पर कायम है, लेकिन विपक्ष का दावा है कि वोटर लिस्ट की धांधली से लाखों मतदाता वंचित हो जाएंगे। एसआईआर अभियान, जो जून 2025 में शुरू हुआ, ने 6.5 मिलियन नाम काट दिए, जिनमें मृतक, स्थानांतरित और दोहरी एंट्री शामिल हैं। विपक्षी नेता राहुल गांधी ने इसे ‘वोट चोरी’ करार दिया, जबकि भाजपा इसे ‘साफ-सुथरी लिस्ट’ बनाने का प्रयास बताती है।
सुप्रीम कोर्ट ने 14 अगस्त 2025 को चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि कटे नामों की सूची वेबसाइट पर अपलोड की जाए, जिसमें कारण भी बताए जाएं। इससे 22 लाख मृतकों के नामों का खुलासा हुआ, लेकिन विपक्ष का आरोप है कि प्रवासी मजदूरों और गरीबों को निशाना बनाया गया। यह घोटाला चुनाव को प्रभावित कर सकता है, खासकर मुस्लिम-यादव (एमवाई) समीकरण पर असर डालेगा। यदि ईवीएम का इस्तेमाल फिर से हुआ, तो विपक्ष का दावा है कि ‘सेट’ मशीनों से परिणाम पूर्वनिर्धारित हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिकाओं में ईवीएम-वीवीपीएटी सत्यापन की मांग है, जहां 2024 के फैसले में 5% सत्यापन की अनुमति दी गई, लेकिन 100% सत्यापन की मांग खारिज हो गई।
ईवीएम विवाद: विश्वास का संकट
ईवीएम पर विवाद कोई नया नहीं है। विपक्ष का कहना है कि ‘पीबीएम’ मामले में सुप्रीम कोर्ट में साबित हो चुका है कि ईवीएम से जीतने वाले हार जाते हैं। 2024 के फैसले में कोर्ट ने ईवीएम की विश्वसनीयता पर भरोसा जताया, लेकिन द्वितीय या तृतीय स्थान वाले उम्मीदवारों को 5% माइक्रो-कंट्रोलर सत्यापन की अनुमति दी। बिहार में, जहां प्रवासी वोटरों की संख्या 75 लाख है, ईवीएम की पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। राजनीतिक दल ईवीएम को ‘सेट’ बताते हैं, और यदि फिर से इस्तेमाल हुआ, तो चुनाव प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि, वोटर लिस्ट पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से कुछ राहत मिली है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं।
भाजपा की रणनीति: हिंदुत्व और ध्रुवीकरण
भाजपा की गिरती ग्राफ सोशल मीडिया पर साफ दिख रही है। समर्थक मुसलमानों के खिलाफ उत्तेजक पोस्ट कर रहे हैं, जैसे असम भाजपा का एआई वीडियो जहां मुसलमानों को ‘कब्जा’ करने वाला दिखाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने 7 अक्टूबर 2025 को इस पर नोटिस जारी किया। मुख्यमंत्रियों के बयान, जैसे ’80:20′ फॉर्मूला, मुस्लिम विरोधी भावनाओं को भड़का रहे हैं। यह कमजोरी का संकेत है – भाजपा हिंदुत्व जगाकर हिंदू वोटों को एकजुट करना चाहती है। लेकिन यह रणनीति उल्टी पड़ सकती है, क्योंकि दलित और पिछड़े वर्ग नाराज हैं।
दलित अत्याचार, एक चेतावनी
हालिया घटनाएं भाजपा की छवि को धूमिल कर रही हैं। रायबरेली में दलित युवक हरिओम की मोब लिंचिंग, जहां उसे ‘ड्रोन चोर’ समझकर पीटा गया, ने पूरे देश को झकझोर दिया। कांग्रेस ने इसे ‘संविधान के खिलाफ अपराध’ बताया। इसी तरह, 6 अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट में दलित CJI बीआर गवई पर वकील राकेश किशोर का जूता फेंकना – मंदिर मूर्ति पर टिप्पणी को लेकर – ने जातिवादी हमले का रूप ले लिया। बार काउंसिल ने किशोर को सस्पेंड कर दिया, लेकिन यह घटना हिंदुत्व के नाम पर हिंसा को बढ़ावा देने का उदाहरण है। हमलावर ने कहा, ‘मूर्ति से पूछ लो’, जो हिंदुत्व को हथियार बनाने का प्रतीक है।
दलित, जो भाजपा के करीब आ रहे थे, अब दूर हो सकते हैं। कट्टरता के दम पर सरकार तभी बनेगी जब दलित वोट भाजपा के साथ रहें। जानकारों के अनुसार, भाजपा फिर से दलित नेताओं को ब्लैकमेलिंग से जोड़ेगी – फाइलों से कमियां उछालकर। विपक्ष के कई नेता, जिनकी कमियां भाजपा के पास हैं, चुप हैं क्योंकि ब्लैकमेल का डर है।
कांग्रेस ने डाली थी दलित उत्थान की बुनियाद
कांग्रेस ने दलित उत्थान की नींव रखी। 1932 के पूना पैक्ट से आरक्षण की शुरुआत हुई, जहां गांधी और अंबेडकर ने दलितों के लिए सीटें सुरक्षित कीं। स्वतंत्र भारत में संविधान ने अस्पृश्यता समाप्त की और आरक्षण प्रदान किया। कांग्रेस के समय फ्लश सिस्टम और आरक्षण से दलितों ने अपमानजनक कार्यों से मुक्ति पाई। आज भी, भाजपा आरक्षण का विरोध करती है – चाहे मुस्लिम ओबीसी आरक्षण हो या दलित कोटा। गांधी की हत्या भी इसी गलतफहमी से हुई कि उन्होंने मुसलमानों और दलितों की रक्षा की।
कांग्रेस ने ई-कॉमर्स से सड़कों, गलियों की बुनियाद डाली, जिन पर आज विकास हो रहा है। दलितों को पता है कि उनकी प्रगति कांग्रेस से जुड़ी है। हालांकि, 1990 में कांग्रेस ने दलित हितों की अनदेखी की, लेकिन अब राहुल गांधी जाति जनगणना पर जोर देकर वापसी कर रहे हैं।
वेदों में जाति: प्रतीकात्मक व्याख्या
वेदों में जाति व्यवस्था जन्म-आधारित नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक है। ऋग्वेद के पुरुष सूक्त (10.90) में कहा गया: “ब्राह्मणो सस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः | ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत् ||”
(ब्राह्मण मुख से, क्षत्रिय भुजाओं से, वैश्य जांघों से, शूद्र पैरों से उत्पन्न हुए)। यह सृष्टि का प्रतीक है, गुण और कर्म पर आधारित। वेदों के चारों भागों में कहीं जन्म से जाति का बंधन नहीं; कोई भी ज्ञान से द्विज बन सकता है।
अनुवाद: “ईश्वर ने हर बंदे को समान बनाया। वर्ण व्यवस्था गुण-कर्म पर है, न कि जन्म पर। ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि कार्य-आधारित हैं।” यह सांकेतिक है – मुख ज्ञान का, भुजाएं रक्षा का, जांघें व्यापार का, पैर सेवा का प्रतीक। हिंदू कट्टरपंथी इसे जन्म-आधारित बनाकर गलत व्याख्या करते हैं, जो वेदों के विरुद्ध है। ईश्वर समानता सिखाता है; विभेद गलत है।
ब्लैकमेलिंग का खेल: राजनीति का काला अध्याय
लोगों का कहना है,भाजपा विपक्ष को फाइलों से ब्लैकमेल करती है। 2014 से 25 विपक्षी नेता जांच के दबाव में भाजपा में शामिल हुए, 23 को राहत मिली। नारदा स्टिंग, लुई बर्गर जैसे मामलों में एजेंसियां (सीबीआई, ईडी) का दुरुपयोग हुआ। बिहार में भी, विपक्षी नेता चुप हैं क्योंकि उनकी कमियां भाजपा के पास हैं। यह लोकतंत्र के लिए खतरा है।
समानता की ओर बिहार चुनाव, सामाजिक न्याय का आईना बनेगा
वोटर लिस्ट और ईवीएम पर पारदर्शिता जरूरी है। भाजपा का हिंदुत्व ध्रुवीकरण उल्टा पड़ेगा यदि दलित-मुस्लिम एकजुट हुए। कांग्रेस की ऐतिहासिक भूमिका और वेदों की प्रतीकात्मक व्याख्या बताती है कि समानता ही हिंदुत्व है। यदि दलित वोट ध्रुवीकृत हुए, तो महागठबंधन मजबूत होगा। अन्यथा, भाजपा फिर सत्ता में आएगी, लेकिन सामाजिक विभेद बढ़ेगा। बिहार को समावेशी विकास चाहिए, न कि घृणा की राजनीति।



