ज़की भारतीय
लखनऊ, 9 अक्टूबर । बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने आज यहां कांशीराम स्मारक स्थल पर आयोजित विशाल रैली को संबोधित करते हुए पार्टी के ‘मिशन 2027’ का आगाज किया। कांशीराम के 19वें परिनिर्वाण दिवस के अवसर पर आयोजित इस मेगा इवेंट में प्रदेश भर से करीब पांच लाख समर्थकों के उमड़ने का दावा किया गया। नीले झंडों की लहरों से पटे कांशीराम स्मारक स्थल पर मायावती ने करीब तीन घंटे मंच पर रहकर कार्यकर्ताओं को संबोधित किया। उनके पोते आकाश आनंद और अन्य वरिष्ठ नेता भी मंच पर मौजूद रहे।
हालांकि, रैली में दिए गए बयानों ने राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर मायावती पर भाजपा समर्थित पार्टी होने का आरोप लगा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि दलित वोटों के ध्रुवीकरण की भाजपा की पुरानी रणनीति फिर से साकार हो रही है।
रैली की शुरुआत सुबह नौ बजे मायावती के कांशीराम की प्रतिमा पर माल्यार्पण से हुई। मंच पर छह खास कुर्सियां बिछाई गईं, जिनमें मायावती, आकाश आनंद, बसपा प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल, सतीश चंद्रा मिश्रा समेत अन्य नेता विराजमान हुए। ‘आई लव बसपा’ के पोस्टरों और बाबा साहेब अंबेडकर व कांशीराम के चित्रों से सजा मंच एक अलग ही जोश से भरा नजर आया। सुरक्षा के लिहाज से दो हजार पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था, जिससे कोई अप्रिय घटना न हो। बसपा कार्यकर्ताओं ने दावा किया कि यह रैली 2021 के बाद सबसे बड़ी है, जिसमें पूर्वांचल, बुंदेलखंड और पश्चिमी यूपी से बड़ी संख्या में दलित समुदाय के लोग शामिल हुए।
मायावती ने अपने संबोधन में सबसे पहले भाजपा सरकार को धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा, “कांशीराम स्मारक स्थल की हालत पहले खराब हो गई थी, जिसके कारण पिछले कुछ सालों से यहां श्रद्धांजलि कार्यक्रम नहीं हो पा रहा था। वर्तमान भाजपा सरकार ने इसकी मरम्मत कराई, इसके लिए उनका आभार।” यह बयान आते ही विपक्षी दलों में हंगामा मच गया। समाजवादी पार्टी (सपा) के नेता अखिलेश यादव ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “अगर जुल्म करने वालों की ही आभारी हैं तो क्या कहें? यह सांठ-गांठ नहीं तो क्या है?”
मायावती ने सपा और कांग्रेस पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा, “सपा सत्ता में रहते PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) को भूल गई, अब विपक्ष में याद आ रही है। अखिलेश जी, अगर कांशीराम साहब के प्रति इतना सम्मान था तो कासगंज जिले का नाम क्यों बदल दिया?” कांग्रेस को भी जातिवादी राजनीति का दोषी ठहराते हुए मायावती ने कहा कि ये दल हमेशा वोट लेने के लिए बहुजन समाज का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन सत्ता में आरक्षण का पूरा लाभ नहीं देते।
रैली में मायावती ने 2027 के विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “बसपा किसी गठबंधन में नहीं पड़ेगी। हम अकेले पूर्ण बहुमत की सरकार बनाएंगे। गठबंधन में हमेशा वोट भागीदारों को चला जाता है, लेकिन बसपा को फायदा नहीं होता।” आकाश आनंद ने भी मंच से कहा, “बसपा बाबा साहेब और कांशीराम के पदचिह्नों पर चल रही है। आरक्षण का सही लाभ तभी मिलेगा जब बसपा सत्ता में आएगी।” मायावती ने आकाश को “मेरे मार्गदर्शन में मेहनत कर रहे” बताते हुए उनकी भूमिका को मजबूत किया। रैली में आरक्षण को लेकर भी जोर दिया गया। मायावती ने कहा, “प्रमोशन में आरक्षण लागू करना जरूरी है। सपा-कांग्रेस ने मुसलमानों और पिछड़ों का विकास अधूरा छोड़ा। कानून-व्यवस्था बदहाल है।”
हालांकि, रैली की सफलता के बावजूद मायावती के बयानों ने राजनीतिक विश्लेषकों को सोचने पर मजबूर कर दिया। एक तरफ जहां दलितों पर हमले बढ़ रहे हैं—उत्तर प्रदेश दलित उत्पीड़न के मामलों में नंबर वन राज्य है—वहीं मायावती ने इन मुद्दों पर चुप्पी साधे रखी। उन्होंने न तो भाजपा सरकार पर दलित सुरक्षा के लिए सवाल उठाया, न ही हाल के अत्याचारों का जिक्र किया। इसके बजाय सीधे प्रधानमंत्री की प्रशंसा में कही गई ‘क्लीन चिट’ वाली बात ने सवाल खड़े कर दिए। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह भाजपा की पुरानी रणनीति का हिस्सा है। भाजपा चाहती है कि दलित वोटों का ध्रुवीकरण हो जाए, ताकि अगर ये वोट उन्हें न मिलें तो कांग्रेस या सपा को न जाएं। बसपा को भाजपा समर्थित रखकर दलित वोटों को विभाजित करना आसान हो जाता है।
एक वरिष्ठ विश्लेषक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “मायावती पहले सरकार में समर्थित रहीं और अब भी भाजपा की कृपा पर टिकी हैं। दलितों का रुझान तेजी से कांग्रेस की ओर हो रहा है, इसलिए भाजपा बसपा के वोट बैंक को बचाने के लिए मायावती को इस्तेमाल कर रही है। रैली भाजपा समर्थित लग रही है।” उन्होंने ‘रावण जैसे लोग’ का जिक्र करते हुए कहा कि बसपा के भीतर ऐसे तत्व सक्रिय हैं जो वोट ध्रुवीकरण को तेज कर रहे हैं। मुसलमान वोटों को सपा और कांग्रेस के बीच बांटने की भाजपा की नीति भी पुरानी है, जो अब फिर से काम कर रही है। एक्स (पूर्व ट्विटर) पर भी प्रतिक्रियाएं बंटीं। एक यूजर ने लिखा, “मायावती ने भाजपा की तारीफ की, सपा पर हमला बोला—जैसे सरकार सपा की हो! यह भीड़ मूर्ख बनाने की कोशिश है।” वहीं बसपा समर्थक बोले, “यह रैली से यदमुल्ले बौखला गए।”
मायावती का राजनीतिक सफर भी इस संदर्भ में चर्चा का विषय बना। कांशीराम की मेहनत से दलितों ने उन्हें चेहरा बनाया। 1995 में पहली बार मुख्यमंत्री बनीं मायावती ने शुरू में शानदार काम किया। बागडोर संभालते ही कानून-व्यवस्था सुधारने का होप से निर्वहन किया। लखनऊ को आयामी खूबसूरत बनाने का श्रेय उन्हें जाता है। गोमती नगर में बनी भव्य इमारतें, पार्क और विकास परियोजनाएं आज भी याद की जाती हैं। लेकिन ताज कॉरिडोर घोटाले और कई आपराधिक मामलों ने उनकी छवि को धूमिल किया। सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुंचा, लेकिन सारे आरोप सिद्ध नहीं हुए। आज तक जेल नहीं गईं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि भाजपा ने उनके खिलाफ कार्रवाई न करके उन्हें ब्लैकमेल किया है। “इसीलिए मायावती भाजपा का समर्थन कर रही हैं। दलितों को ‘शूद्र’ कहकर उत्पीड़न करने वाली भाजपा मायावती को इसलिए बचा रही है, ताकि बसपा का वोट बैंक बंटे,” एक पूर्व बसपा नेता ने कहा।
रैली के बाद मायावती ने चुनिंदा कार्यकर्ताओं से फीडबैक लिया, जो संगठन को मजबूत करने की दिशा में कदम माना जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह रैली बसपा को संजीवनी दे पाएगी? 2022 के चुनाव में महज एक सीट पर सिमट चुकी पार्टी के लिए 2027 त्रिकोणीय मुकाबला बनाना चुनौती है। भाजपा-सपा की ध्रुवीकरण वाली राजनीति में बसपा का वजूद दांव पर है। अगर मायावती दलित मुद्दों पर सख्ती दिखातीं तो शायद संदेश अलग होता। फिलहाल, राजनीतिक गलियारे में बहस तेज है—क्या मायावती भाजपा की ‘ट्रॉली’ हैं या फिर बसपा का पुनरुत्थान हो रहा है?




