HomeArticleगांधी और नेहरू के विरुद्ध षडयंत्र का सिलसिला जारी

गांधी और नेहरू के विरुद्ध षडयंत्र का सिलसिला जारी

ज़की भारतीय

आज जब मैंने गूगल पर एक जानकारी सर्च करने के लिए उसे खोला, तो नीचे एक खबर मेरे सामने आई, जिसका मैंने स्क्रीनशॉट ले लिया। इस तरह की खबरें जानबूझकर फैलाई जा रही हैं, जो देश के इतिहास को तोड़-मरोड़कर नया इतिहास लिखने की कोशिश कर रही हैं। इनका उद्देश्य कांग्रेस, गांधी, और नेहरू के खिलाफ नफरत फैलाकर सांप्रदायिकता को बढ़ावा देना और देश पर कब्जा करना प्रतीत होता है।

यह स्पष्ट करना जरूरी है कि कट्टरपंथी संगठनों की कांग्रेस, गांधी, और नेहरू से नफरत का मूल कारण यह है कि इन नेताओं ने मुसलमानों और दलितों को कमजोर समझकर उन्हें सशक्त बनाने का प्रयास किया। वे जानते थे कि देश के बंटवारे के बाद मुसलमान कमजोर हो गए थे, और दलितों के लिए कानूनी संरक्षण अत्यंत आवश्यक था। यही नीति कुछ कट्टरपंथी ब्राह्मणों को रास नहीं आई। आजादी के बाद से लेकर अब तक, ये संगठन गांधी, नेहरू, और कांग्रेस के इस सराहनीय कार्य के लिए उन्हें बदनाम करने और बदला लेने की कोशिश में लगे हुए हैं।

ये खबरें उन बच्चों को भी गुमराह कर रही हैं, जिनका मस्तिष्क अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुआ है। ऐसी बातें उनके दिमाग में जहर घोल रही हैं, ताकि आने वाले समय में वे गांधी को देशद्रोही और नाथूराम गोडसे जैसे हत्यारों को देशभक्त मानने लगें। कुछ लोग तो यहाँ तक कोशिश कर रहे हैं कि भविष्य में गोडसे जैसे अंग्रेजों के दलाल की मूर्तियाँ स्थापित की जाएँ और उनकी तस्वीरें भारतीय मुद्रा पर छापी जाएँ। हालांकि, ये विचारधाराएँ कागजी हैं, जो जागरूकता की तेज आंधियों में ध्वस्त हो जाएँगी।

सबसे पहले, मैं इस स्क्रीनशॉट को अपने लेख में शामिल कर रहा हूँ, ताकि आप इसे पढ़ सकें और गूगल पर जाकर स्वयं देख सकें। इसके बाद, मैं इसकी सत्यता आपके सामने रखूँगा। आप तय करें कि आखिर गांधी, नेहरू, और कांग्रेस के खिलाफ ये नफरत क्यों फैलाई जा रही है और इसके पीछे क्या कारण हैं।

आज के दौर में सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहें और विकृत इतिहास हमें अक्सर भ्रमित कर देते हैं। एक ऐसा ही स्क्रीनशॉट वायरल हो रहा है, जिसमें जवाहरलाल नेहरू पर देश के विभाजन का दोष मढ़ा गया है। इसमें दावा किया गया है कि नेहरू ने  नेताजी  सुभाष चंद्र बोस के साथ विश्वासघात किया, मुस्लिम लीग को बढ़ावा दिया, और विभाजन के कारण देश कमजोर हो गया। लेकिन इतिहास के पन्नों को पलटने पर सच्चाई बिल्कुल उलट निकलती है। नेहरू विभाजन के पक्षधर नहीं थे; वे एक अखंड भारत के स्वप्नद्रष्टा थे। यह लेख उन फर्जी दावों की पड़ताल करेगा, ऐतिहासिक तथ्यों को सामने लाएगा, और दिखाएगा कि कैसे कट्टरता ने आजादी की लड़ाई को कमजोर किया। साथ ही, यह एकता की अपील करेगा—क्योंकि भारत की ताकत उसकी विविधता में है, न कि नफरत में। 

स्क्रीनशॉट का विश्लेषण: फर्जी दावों की पड़ताल

वायरल स्क्रीनशॉट में नेहरू को “देश के दलाल” कहकर बदनाम किया गया है, दावा किया गया है कि उन्होंने नेताजी के साथ धोखा किया और विभाजन को बढ़ावा दिया। लेकिन तथ्य बिल्कुल विपरीत हैं। नेहरू ने 1940 के दशक में कांग्रेस के साथ मिलकर अखंड भारत की वकालत की। ब्रिटिश विक्ट्री लॉर्ड माउंटबेटन के अनुसार, नेहरू ने विभाजन का विरोध किया, लेकिन साम्प्रदायिक हिंसा की चरम स्थिति (1946 में कलकत्ता और नोआखाली दंगे, जहां हजारों की मौत हुई) ने इसे अपरिहार्य बना दिया।05774b नेहरू ने “ट्रिस्ट विद डेस्टिनी” भाषण में कहा था, “आजादी का लंबा संघर्ष समाप्त हो रहा है, लेकिन यह एक नई शुरुआत है।” वे मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन के खिलाफ थे, क्योंकि लीग ने “डायरेक्ट एक्शन डे” (16 अगस्त 1946) पर हिंसा भड़काई, जिसमें 7,000 से अधिक लोग मारे गए।

यह दावा कि नेहरू ने नेताजी को धोखा दिया, भी आधारहीन है। नेहरू और बोस के बीच मतभेद थे—बोस फॉरवर्ड ब्लॉक के नेता थे, जबकि नेहरू कांग्रेस के सेकुलर दृष्टिकोण के समर्थक। लेकिन बोस ने 1941 में कांग्रेस छोड़ी, और नेहरू ने कभी उनका विरोध नहीं किया। वास्तव में, नेहरू ने बोस की आजादी की भावना का सम्मान किया। यह फर्जी प्रचार इतिहास को तोड़-मरोड़कर वर्तमान राजनीति को हवा देने का प्रयास है।

विभाजन का वास्तविक इतिहास: नेहरू का विरोध और कट्टरता की भूमिका

भारत का विभाजन 1947 का दर्दनाक अध्याय था, लेकिन इसका दोष नेहरू पर डालना ऐतिहासिक विकृति है। नेहरू ने हमेशा एकजुट भारत की कल्पना की। 1946 में अंतरिम सरकार में नेहरू प्रधानमंत्री बने, लेकिन मुस्लिम लीग की मांग—मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के लिए अलग राज्य—ने बातचीत विफल कर दी। जिन्ना ने दो-राष्ट्र सिद्धांत (टू-नेशन थ्योरी) पर जोर दिया, जो 1940 के लाहौर प्रस्ताव में स्पष्ट था।
नेहरू ने इसका विरोध किया, कहा कि भारत धर्म के आधार पर नहीं बंटेगा। लेकिन ब्रिटिश हड़बड़ी (माउंटबेटन प्लान, जून 1947) और हिंसा ने विभाजन थोप दिया।

सवाल है क्या आरएसएस ने मुस्लिम लीग के साथ साजिश की?

इतिहास कहता है हां। आरएसएस ने 1940 के दशक में ब्रिटिश के साथ सहयोग किया, क्विट इंडिया मूवमेंट (1942) का विरोध किया। हिंदू महासभा और आरएसएस ने भी दो-राष्ट्र सिद्धांत को अप्रत्यक्ष समर्थन दिया—सावरकर का हिंदू राष्ट्रवाद मुस्लिम अलगाववाद का जवाब था, जिसने ध्रुवीकरण बढ़ाया। सिंध, बंगाल और NWFP में आरएसएस-लीग गठबंधन सरकारें चलीं। विभाजन के बाद आरएसएस ने मुसलमानों पर हमले किए, जिसके कारण 1948 में गांधी की हत्या के बाद इसे प्रतिबंधित किया गया। नेहरू ने सेकुलर भारत बचाया, जब गांधी की हत्या के बाद सांप्रदायिक उन्माद चरम पर था। विभाजन से 1.5 करोड़ लोग विस्थापित हुए, 10 लाख मारे गए। लेकिन यह नेहरू की कमजोरी नहीं, ब्रिटिश साम्राज्यवाद और कट्टरवाद की उपज थी। नेहरू ने कहा, “विभाजन दुखद है, लेकिन इससे हम मजबूत बनेंगे।”

नेहरू युग का विकास: इंफ्रास्ट्रक्चर की नींव

नेहरू पर दोषारोपण करने वाले भूल जाते हैं कि उन्होंने आधुनिक भारत की नींव रखी। नेहरू काल (1947-1964) में पंचवर्षीय योजनाओं ने इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर दिया। दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956-61) में सड़कों, सिंचाई और ऊर्जा पर भारी निवेश हुआ। नागपुर रोड प्लान (1943) को लागू कर सड़क घनत्व 16 किमी/100 वर्ग किमी तक बढ़ाया। कच्ची जमीनों पर डामरी सड़कें बिछाई गईं—आजादी के समय मात्र 4 लाख किमी सड़कें थीं, नेहरू ने इन्हें दोगुना किया।

कांग्रेस सरकारों ने औद्योगिकरण के साथ कृषि और स्वास्थ्य पर ध्यान दिया। भाखड़ा नांगल बांध, आईआईटी और स्टील प्लांट्स ने भारत को आत्मनिर्भर बनाया। नेहरू ने कहा, “हमारे पास स्टील की रीढ़ होनी चाहिए।” यह विकास आज भी प्रासंगिक है—बीजेपी की गति नेहरू की नींव पर ही खड़ी है।

कट्टरता का जहर: बंटवारे का असली दोषी

विभाजन कट्टर हिंदू और कट्टर मुस्लिम संगठनों की देन था। आरएसएस का हिंदू राष्ट्रवाद और लीग का इस्लामी अलगाववाद ने ध्रुवीकरण किया। यदि बंटवारा न हुआ होता, तो पाकिस्तान के 25 करोड़ मुसलमान भारत में होते—लेकिन तब आतंकवाद और बम विस्फोट (जो आज पाकिस्तान झेल रहा) भारत में फैल जाते। नेहरू ने सेकुलरिज्म से इसे रोका। आज बीजेपी-आरएसएस को मुस्लिम आबादी से “दर्द” होता है, लेकिन सच्चाई यह है कि विविधता भारत की ताकत है। दलित-मुस्लिम गठजोड़ से सरकारें बनती हैं, जैसा 2004-2014 में UPA ने दिखाया।

कट्टरपंथी संगठनों को सोचना चाहिए: बंटवारा उनके लिए “लाभकारी” था या नहीं?

नेहरू की आलोचना नफरत फैलाती है, लेकिन उनकी तारीफ होनी चाहिए—उन्होंने मुसलमानों को “कमजोर” नहीं, बल्कि संरक्षित किया। एकता की ओर कदम बढ़ाएं ,नेहरू पर लगाए गए आरोप फर्जी हैं—विभाजन ब्रिटिश साजिश और कट्टरता का परिणाम था। नेहरू ने भारत को सेकुलर, आधुनिक राष्ट्र बनाया। आज, जब नफरत की आग भड़क रही है, हमें उनकी विरासत अपनानी चाहिए। कट्टरता के खिलाफ युद्ध लड़ें, मानसिकता बदलें। दलित, मुस्लिम, हिंदू—सब मिलकर भारत बनाते हैं। यदि हम एकजुट हों, तो कोई शक्ति हमें हरा नहीं सकती। आइए, नेहरू के शब्दों में कहें: “लंबी रात के बाद सुबह आती है।” एकता ही हमारा हथियार है।

जय हिंद!

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