HomePOLITICSलखनऊ में सपा सांसद रामजीलाल सुमन पर हमले के विरोध में प्रदर्शन

लखनऊ में सपा सांसद रामजीलाल सुमन पर हमले के विरोध में प्रदर्शन

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लखनऊ, 28 अप्रैल  समाजवादी पार्टी (सपा) के राज्यसभा सांसद रामजीलाल सुमन पर करणी सेना द्वारा किए गए हमलों के विरोध में लखनऊ में सपा कार्यकर्ताओं ने जोरदार प्रदर्शन किया। अटल चौक पर लगे पोस्टरों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सवाल पूछा गया कि क्यों पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) को कमतर किया जा रहा है। सपा नेता पूजा शुक्ला ने करणी सेना को योगी का “स्वजातीय संगठन” करार देकर विवाद को और हवा दी। दूसरी ओर, करणी सेना ने सुमन के राणा सांगा पर दिए बयान को राजपूत समुदाय का अपमान बताते हुए अपने प्रदर्शनों को जायज ठहराया, लेकिन उनकी हिंसक कार्रवाइयों पर सवाल उठ रहे हैं।मामला क्या है?21 मार्च 2025 को रामजीलाल सुमन ने राज्यसभा में राणा सांगा को “गद्दार” कहते हुए दावा किया कि उनके बुलावे पर बाबर भारत आया। इस बयान से नाराज करणी सेना ने सुमन के खिलाफ आक्रामक प्रदर्शन शुरू किए। आगरा में 26 मार्च को सुमन के आवास पर पथराव और तोड़फोड़ हुई, जिसमें पुलिसकर्मी घायल हुए और गाड़ियां क्षतिग्रस्त हुईं। 12 अप्रैल को आगरा में करणी सेना के “रक्त स्वाभिमान सम्मेलन” में तलवारें लहराई गईं। वहीं, 27 अप्रैल को अलीगढ़ में सुमन के काफिले पर टायर और पत्थर फेंके गए, जिससे कई गाड़ियां टकराईं।लखनऊ में सपा ने इन हमलों को पीडीए, खासकर दलित समुदाय, के खिलाफ साजिश करार दिया। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने योगी सरकार पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने में विफलता का आरोप लगाया। प्रदर्शन में सपा की सहयोगी अपना दल (कमेरावादी) की नेता पल्लवी पटेल भी शामिल हुईं। पूजा शुक्ला ने दावा किया कि करणी सेना को योगी सरकार का संरक्षण प्राप्त है, क्योंकि वह राजपूत समुदाय से जुड़ा संगठन है और योगी स्वयं राजपूत हैं।

करणी सेना का पक्ष और हिंसा पर सवाल

करणी सेना ने सुमन के बयान को ऐतिहासिक तथ्यों के साथ छेड़छाड़ और राजपूत समुदाय का अपमान बताया। संगठन ने सुमन की राज्यसभा सदस्यता रद्द करने, उनके खिलाफ राष्ट्रद्रोह का मुकदमा, और उनके आवास पर बुलडोजर चलाने की मांग की। करणी सेना का कहना है कि उनके प्रदर्शन राणा सांगा की विरासत और राजपूत सम्मान की रक्षा के लिए जायज हैं। उन्होंने आगरा में सिविल कोर्ट में सुमन और अखिलेश के खिलाफ वाद भी दायर किया।हालांकि, करणी सेना की हिंसक कार्रवाइयों ने उनके प्रदर्शनों की वैधता पर सवाल खड़े किए हैं। आगरा और अलीगढ़ में तोड़फोड़, पथराव, और धमकियां (जैसे सुमन की हत्या की धमकी) कानून को हाथ में लेने का स्पष्ट उदाहरण हैं। भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 147 (दंगा), 148 (हथियारों के साथ दंगा), 427 (संपत्ति को नुकसान), और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत ये कृत्य दंडनीय हैं। सपा और कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर करणी सेना को सुमन के बयान से आपत्ति है, तो उन्हें धारा 156(3) CrPC के तहत कोर्ट में FIR की मांग करनी चाहिए या शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना चाहिए, न कि हिंसा का सहारा लेना चाहिए।

सामाजिक और राजनीतिक तनाव

सपा ने इन हमलों को बीजेपी और आरएसएस की साजिश करार दिया, जिसका मकसद दलित और पिछड़े समुदायों को डराना है। कुछ एक्स पोस्ट्स में दावा किया गया कि करणी सेना की कार्रवाइयां दलितों के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा दे रही हैं, जैसे आगरा में दलित बारात पर हमला। दूसरी ओर, करणी सेना ने सपा और अखिलेश पर सामाजिक तनाव भड़काने का आरोप लगाया।

रामजीलाल सुमन का बयान और करणी सेना की प्रतिक्रिया अब जातिगत और राजनीतिक टकराव का रूप ले चुकी है। सपा इसे पीडीए बनाम बीजेपी और करणी सेना की लड़ाई के रूप में पेश कर रही है, जबकि करणी सेना इसे राजपूत सम्मान का मुद्दा बता रही है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन संवैधानिक अधिकार है, लेकिन हिंसा और कानून को हाथ में लेना गैरकानूनी है। सभी पक्षों को संयम बरतते हुए कानूनी रास्ता अपनाना चाहिए, ताकि सामाजिक सौहार्द बना रहे। योगी सरकार पर भी सवाल उठ रहे हैं कि अगर “जीरो टॉलरेंस” की नीति है, तो ऐसी हिंसा पर अंकुश क्यों नहीं लगाया जा रहा? यह विवाद उत्तर प्रदेश में सामाजिक तनाव को और बढ़ा सकता है।

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