ज़की भारतीय ✍🏼
भारतीय लोकतंत्र की मजबूती उसके विविधता भरे मतदाता वर्ग में निहित है। लेकिन हर चुनावी मौसम में एक पुराना सवाल दोहराया जाता है—क्या अल्पसंख्यक और दलित वोटों का ध्रुवीकरण उनकी अपनी शक्ति को कमजोर कर रहा है? हालिया पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के दौरान सामने आए एक प्रकरण ने इस बहस को फिर से ताजा कर दिया है। असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) और पूर्व तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) विधायक हुमायू कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी (एजेयूपी) के बीच गठबंधन का गठन और फिर उसका टूटना राजनीतिक हलचल का केंद्र बन गया। यह घटना केवल एक स्थानीय गठबंधन की कहानी नहीं, बल्कि वोट विभाजन, गठबंधनों की विश्वसनीयता और समुदायों की राजनीतिक रणनीति पर गहरी चर्चा का आधार है। मार्च के अंत में एआईएमआईएम ने हुमायू कबीर की पार्टी के साथ गठबंधन की घोषणा की थी। कबीर, जो कभी कांग्रेस में थे, फिर टीएमसी के मंत्री बने, 2018 में भाजपा में शामिल हुए, 2019 लोकसभा चुनाव भाजपा टिकट पर लड़े और बाद में टीएमसी में लौटे, दिसंबर 2025 में मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में बाबरी मस्जिद शैली की मस्जिद बनाने की घोषणा के बाद टीएमसी से निष्कासित हो गए थे। उन्होंने चंदा अभियान शुरू किया और एआईएमआईएम के साथ मिलकर ‘मुस्लिमों की आवाज’ को मजबूत करने का दावा किया। ओवैसी ने इस गठबंधन को बंगाल में मुसलमानों के लिए नई राजनीतिक पहचान का प्रतीक बताया था। लेकिन अप्रैल 2026 में टीएमसी द्वारा जारी एक कथित स्टिंग वीडियो ने सब बदल दिया। वीडियो में कबीर पर आरोप लगा कि वे भाजपा से हजार करोड़ रुपये की डील कर ममता बनर्जी को हराने के लिए मुस्लिम वोटों को बांटने की योजना बना रहे थे। इसमें ‘मुस्लिमों को बेवकूफ बनाना आसान है’ जैसे वाक्य और बाबरी मस्जिद संदर्भ भी शामिल थे। एआईएमआईएम ने तुरंत प्रतिक्रिया दी। पार्टी ने कहा, “हम किसी भी ऐसे बयान से जुड़ नहीं सकते, जिसमें मुसलमानों की सत्यनिष्ठा पर सवाल उठे।” ओवैसी ने गठबंधन तोड़ते हुए घोषणा की थी के एआईएमआईएम अब बंगाल में अकेले चुनाव लड़ेगी। कबीर ने वीडियो को फर्जी और एआई जनित बताया तथा मानहानि का मुकदमा दायर करने की बात कही।यह घटना दर्शाती है कि चुनावी गठबंधन कितने नाजुक होते हैं। टीएमसी ने इसे भाजपा की साजिश करार दिया, जबकि विपक्षी दलों ने चेतावनी दी कि ऐसे प्रयास तृणमूल के मुस्लिम वोट बैंक को बांटकर भाजपा को फायदा पहुंचा सकते हैं। दूसरी ओर, एआईएमआईएम ने खुद को दोनों प्रमुख दलों—टीएमसी और भाजपा—से अलग रखकर मुसलमानों की स्वतंत्र आवाज के रूप में पेश किया। यह प्रकरण केवल व्यक्तिगत विश्वासघात का नहीं, बल्कि समुदाय की राजनीतिक भेद्यता का भी उदाहरण है।
वोट विभाजन की रणनीति: इतिहास से सबक
भारतीय चुनावों में वोट विभाजन की राजनीति नई नहीं है। कई बार छोटी पार्टियां या स्वतंत्र उम्मीदवार बड़े दलों के वोट बैंक को प्रभावित करते हैं। बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में एआईएमआईएम ने पांच सीटें जीतीं। कुछ विश्लेषकों का मानना था कि इन सीटों पर मुस्लिम वोटों का बंटवारा राजद-कांग्रेस गठबंधन को नुकसान पहुंचा और भाजपा-जद(यू) को फायदा हुआ। इसी तरह उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के कुछ उपचुनावों में भी एआईएमआईएम की मौजूदगी पर बहस हुई।बंगाल में भी 2021 के बाद से मुस्लिम वोट मुख्य रूप से टीएमसी के साथ जुड़े रहे हैं। लेकिन 2026 के चुनाव में एआईएमआईएम का प्रयास मुसलमानों को ‘अपनी पार्टी’ देने का था। ओवैसी ने बार-बार कहा कि टीएमसी और भाजपा ‘एक ही सिक्के के दो पहलू’ हैं। फिर भी गठबंधन टूटने के बाद सवाल उठा कि क्या यह प्रयास वोट बंटवारे का माध्यम बन रहा था। दलित वोटों की बात करें तो बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का उदाहरण सामने है। मायावती की बसपा ने 1990 के दशक में दलित-मुस्लिम-बहुजन गठबंधन से सरकार बनाई, लेकिन बाद में भाजपा के साथ समझौते के आरोप भी लगे। 2007 में बसपा ने अकेले बहुमत हासिल किया, लेकिन बाद के चुनावों में वोट शेयर घटा। चंद्रशेखर आजाद जैसे नए दलित नेता अपनी पार्टियां बना रहे हैं, लेकिन वोट बंटवारा दलित एकता को चुनौती देता है। ये उदाहरण दिखाते हैं कि लोकतंत्र में छोटी पार्टियां जरूरी हैं, लेकिन जब वे बड़े दलों के खिलाफ वोट काटती हैं तो परिणाम अप्रत्याशित होते हैं। आंकड़ों से पता चलता है कि कई सीटों पर मुस्लिम या दलित वोट अगर एकजुट रहें तो परिणाम उलट सकते हैं। लेकिन विभाजन की स्थिति में अल्पसंख्यक उम्मीदवार कम वोटों के साथ भी जीत जाते हैं, जबकि मुख्य विपक्षी दल हार जाते हैं। यह ‘स्पॉइलर’ रणनीति का परिणाम है, जिसे सभी पार्टियां कभी-कभी अपना लेती हैं।
दलित और मुस्लिम समुदायों के लिए रणनीति: एकता की जरूरत
भारत में मुसलमानों की आबादी करीब 14 प्रतिशत और दलित 17% आदिवासी 8–9% पिछड़ा –50% है। Sabhi समुदाय आर्थिक रूप से पिछड़े हैं। बंगाल में मुसलमान टीएमसी के मजबूत आधार रहे, लेकिन विकास, शिक्षा और रोजगार के मुद्दों पर असंतोष बढ़ा है। दलितों में भी बसपा के बाद नए विकल्पों की तलाश है। समुदायों को समझना होगा कि वोट का सौदा उनकी लंबी अवधि की हानि कर सकता है। अगर मुस्लिम वोट टीएमसी से बंटता है तो भाजपा को फायदा हो सकता है, लेकिन अगर वोट बसपा या छोटी पार्टियों में बंटता है तो भाजपा या अन्य दल मजबूत हो जाते हैं। सच्ची एकता तभी संभव है जब समुदाय अपने प्रतिशत को समझें और ऐसे उम्मीदवारों को चुनें जो उनके हितों—शिक्षा, रोजगार, सामाजिक न्याय—की रक्षा करें। राजनीतिक पार्टियां अपने हित साधती हैं। कांग्रेस ने हिंदू-मुस्लिम एकता का नारा दिया, लेकिन वोट बैंक की राजनीति से बच नहीं सकी। भाजपा ने हिंदू एकीकरण पर जोर दिया। क्षेत्रीय दल जैसे टीएमसी या जद(यू) स्थानीय मुद्दों पर खेलते हैं। लेकिन मतदाता को अंतिम फैसला लेना है। 2026 के बंगाल चुनाव जैसे मौकों पर यह स्पष्ट हो जाता है कि भावनाओं से ऊपर तथ्यों पर आधारित चुनाव जरूरी है। बंगाल का यह प्रकरण हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र में हर वोट मायने रखता है। ध्रुवीकरण की राजनीति अल्पसंख्यकों और दलितों को कमजोर करती है, लेकिन जागरूक मतदाता इसे तोड़ भी सकता है। मुसलमान और दलित समुदायों को चाहिए कि वे अपने वोट को किसी एक पार्टी का गुलाम न बनाएं, बल्कि मुद्दों पर आधारित एकता बनाएं। इतिहास गवाह है कि विभाजित वोट हमेशा कमजोर पक्ष को मजबूत बनाते हैं। आने वाले चुनावों में अगर इन समुदायों ने अपने हितों को प्राथमिकता दी तो भारत का लोकतंत्र और मजबूत होगा।



