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लखनऊ, 26 अप्रैल । बिजली चोरी रोकने के नाम पर बिजली विभाग द्वारा चलाए जा रहे अभियानों का असल मकसद क्या है? यह सवाल तब उठता है जब हम देखते हैं कि बिजली चोरी को रोकने के लिए लगाए गए तारों से लेकर मीटर तक की प्रक्रिया में भ्रष्टाचार और अवैध कमाई का खेल चल रहा है। बिजली विभाग के कुछ कर्मचारी और अधिकारी, जो बिजली चोरी रोकने की जिम्मेदारी संभालते हैं, उसी का फायदा उठाकर उपभोक्ताओं से रिश्वत वसूल रहे हैं और सरकार को करोड़ों रुपये का चूना लगा रहे हैं। यह खबर मध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड सहित उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPPCL) के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालती है, जहां पारदर्शिता की कमी और भ्रष्टाचार ने उपभोक्ताओं का जीना मुहाल कर दिया है।
उत्तर प्रदेश में बिजली चोरी रोकने के नाम पर बिजली विभाग द्वारा चलाए जा रहे अभियानों का असल मकसद क्या है? यह सवाल तब उठता है जब हम देखते हैं कि बिजली चोरी को रोकने के लिए लगाए गए तारों से लेकर मीटर तक की प्रक्रिया में भ्रष्टाचार और अवैध कमाई का खेल चल रहा है। बिजली विभाग के कुछ कर्मचारी और अधिकारी, जो बिजली चोरी रोकने की जिम्मेदारी संभालते हैं, उसी का फायदा उठाकर उपभोक्ताओं से रिश्वत वसूल रहे हैं और सरकार को करोड़ों रुपये का चूना लगा रहे हैं। यह खबर मध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड सहित उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPPCL) के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालती है, जहां पारदर्शिता की कमी और भ्रष्टाचार ने उपभोक्ताओं का जीना मुहाल कर दिया है।


तारों की अदला-बदली: चोरी रोकने का बहाना या कमाई का जरिया?
उत्तर प्रदेश में बिजली के लिए शुरूआत में तांबे (कॉपर) के तारों का उपयोग किया जाता था। लेकिन चोरों द्वारा इन तारों को काटकर बेचने की घटनाओं ने बिजली आपूर्ति को बार-बार बाधित किया। इसके समाधान के तौर पर बिजली विभाग ने तांबे के तारों को हटाकर हार्ड एल्युमिनियम के तार लगाने शुरू किए। कुछ साल बाद, इन एल्युमिनियम तारों को भी बिजली चोरी रोकने के नाम पर बदल दिया गया। उनकी जगह मोटे, एक-दूसरे में लिपटे हुए तार (जिन्हें एरियल बंच्ड कंडक्टर या ABC केबल कहा जाता है) और फिर हाल ही में एल्युमिनियम कवर्ड केबल (जालीदार कोटिंग वाले तार) लगाए जाने शुरू हुए।सवाल यह है कि क्या ये बदलाव वाकई बिजली चोरी रोकने के लिए थे? या यह विभाग और ठेकेदारों की मिलीभगत से करोड़ों रुपये की कमाई का खेल था? पुराने तार, जो पूरी तरह ठीक थे, को हटाकर कुछ को विभाग के गोदामों में जमा किया गया, जबकि अधिकांश का सौदा बड़े ठेकेदारों के साथ कर लिया गया। इससे जहां ठेकेदारों और विभाग के कुछ अधिकारियों ने मोटी कमाई की, वहीं सरकार को नए तारों की खरीद और इंस्टॉलेशन के लिए करोड़ों रुपये का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ा।
मीटर का खेल उपभोक्ताओं की जेब पर डाका
बिजली विभाग का भ्रष्टाचार सिर्फ तारों तक सीमित नहीं है। मीटर के मामले में भी उपभोक्ताओं के साथ धोखा हो रहा है। सूत्रों के अनुसार, बिजली विभाग के कुछ कर्मचारी उपभोक्ताओं को “सेटिंग” का ऑफर देते हैं। उदाहरण के लिए, अगर किसी का मासिक बिजली बिल 1000 रुपये आता है, तो सालाना 12,000 रुपये का भुगतान करना पड़ता है। लेकिन कर्मचारियों के साथ “सेटिंग” करके उपभोक्ता ऐसा मीटर लगवा सकते हैं, जो हर महीने सिर्फ 500 रुपये का बिल दिखाए, चाहे वे 5000 रुपये की बिजली ही क्यों न जलाएं। इसके बदले कर्मचारी सालाना एक निश्चित रकम वसूल करते हैं। इस खेल में उपभोक्ता को तात्कालिक फायदा दिखता है, लेकिन सरकार को राजस्व का भारी नुकसान होता है।
निजी कर्मचारियों का आतंक: अवैध वसूली का नया चेहरा
बिजली चोरी की जांच के नाम पर मध्यांचल विद्युत वितरण निगम और अन्य डिस्कॉम्स में कुछ निजी कर्मचारी भी सक्रिय हैं। ये कर्मचारी उपभोक्ताओं के घरों में पहुंचकर मीटर, कनेक्शन और लोड की जांच के बहाने डराते हैं। “आपका कनेक्शन गलत है”, “इतना लोड कैसे चला रहे हैं?” जैसे डायलॉग मारकर ये लोग मनमानी रकम वसूल करते हैं। उपभोक्ताओं को यह तक नहीं पता कि ये कर्मचारी सरकारी हैं या निजी। ऐसे में मासूम उपभोक्ता डर के मारे रिश्वत दे देते हैं।
बिजली चोरी जांच: रिश्वतखोरी का सुनहरा मौका
जब भी उत्तर प्रदेश में बिजली चोरी की जांच के लिए अभियान शुरू होता है, यह बिजली विभाग के कुछ कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए कमाई का सुनहरा अवसर बन जाता है। अभियान के दौरान दोषी उपभोक्ताओं को पकड़ने के बजाय, उनसे मोटी रिश्वत वसूल की जाती है। जो उपभोक्ता रिश्वत देने में सक्षम होते हैं, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती। लेकिन जो गरीब या कमजोर उपभोक्ता रिश्वत नहीं दे पाते, उनके खिलाफ भारी जुर्माना लगाया जाता है।उदाहरण के लिए, अगर किसी अभियान में 50 उपभोक्ताओं को बिजली चोरी करते पकड़ा जाता है, तो कुछ दिनों बाद यह संख्या घटकर 5-10 रह जाती है। इसका कारण स्पष्ट है—अधिकांश उपभोक्ताओं से रिश्वत लेकर उन्हें “क्लीन चिट” दे दी जाती है। यह खेल तब तक चलता रहता है, जब तक जांच अभियान खत्म नहीं हो जाता।
भ्रष्टाचार के मामले: सस्पेंड कर्मचारी और अधिकारी
पिछले कुछ वर्षों में मध्यांचल विद्युत वितरण निगम और UPPCL के कई कर्मचारी और अधिकारी भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के आरोप में सस्पेंड किए गए हैं। कुछ उल्लेखनीय मामले इस प्रकार हैं:
2023 में लखनऊ के एक SDO का मामला
एक सब-डिविजनल ऑफिसर (SDO) को बिजली चोरी की शिकायतों को दबाने और उपभोक्ताओं से रिश्वत लेने के आरोप में निलंबित किया गया। जांच में पाया गया कि उन्होंने कई बड़े उपभोक्ताओं को क्लीन चिट देने के बदले लाखों रुपये वसूले।
2022 में मध्यांचल के जूनियर इंजीनियर
मध्यांचल विद्युत वितरण निगम के एक जूनियर इंजीनियर को मीटर टैंपरिंग और उपभोक्ताओं के साथ सेटिंग करने के आरोप में सस्पेंड किया गया। इस कर्मचारी ने कई उपभोक्ताओं के मीटर को “फिक्स” करके बिल कम करने का खेल चलाया था।
2024 में बांदा और मिर्जापुर के अधिकारी
बिजली चोरी की जांच में लापरवाही और रिश्वतखोरी के आरोप में बांदा और मिर्जापुर के चकबंदी अधिकारियों को निलंबित किया गया।
2018 में कैराना छापेमारी
कैराना में बिजली चोरी रोकने के लिए चलाए गए अभियान में कई कर्मचारियों पर रिश्वत लेकर दोषियों को छोड़ने के आरोप लगे। इस मामले में कुछ कर्मचारियों पर विभागीय कार्रवाई हुई।समाधान के लिए सुझाव: पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी।
समाधान के लिए सुझाव: पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी
बिजली चोरी के नाम पर हो रहे इस भ्रष्टाचार को रोकने क लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं: पारदर्शी जांच प्रक्रिया: बिजली चोरी की जांच को पूरी तरह ऑनलाइन और कैमरे के सामने किया जाना चाहिए। जांच दल के बिजली कार्यालय से निकलने से लेकर छापेमारी और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के अंतिम परिणाम तक की वीडियोग्राफी किसी स्वतंत्र संस्था द्वारा शुरू की जानी चाहिए। इस वीडियोग्राफी को तब तक जारी रखना चाहिए, जब तक जांच का पूरा परिणाम सामने न आ जाए। इस प्रक्रिया को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म जैसे फेसबुक, ट्विटर (X), या किसी अन्य सोशल मीडिया के माध्यम से लाइव प्रसारित किया जा सकता है ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
स्वतंत्र निगरानी
सरकार को स्वतंत्र संस्थाओं या नागरिक समूहों को जांच अभियानों में शामिल करना चाहिए। इन संस्थाओं को कर्मचारियों और अधिकारियों की गतिविधियों पर नजर रखने की जिम्मेदारी दी जा सकती है।
कठोर सजा और निगरानी
रिश्वत लेने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही, जांच अभियानों की निगरानी के लिए स्वतंत्र ऑडिट सिस्टम लागू करना जरूरी है।उपभोक्ता जागरूकता: उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों और बिजली विभाग की प्रक्रियाओं के बारे में जागरूक करने के लिए अभियान चलाए जाने चाहिए। इससे निजी कर्मचारियों की अवैध वसूली पर लगाम लगेगी।निष्कर्षबिजली चोरी रोकने के नाम पर उत्तर प्रदेश में बिजली विभाग और उसके कुछ कर्मचारी-अधिकारी उपभोक्ताओं को लूटने और सरकार को चूना लगाने का खेल खेल रहे हैं। तारों की अदला-बदली, मीटर की सेटिंग, और जांच अभियानों में रिश्वतखोरी जैसे मामले इस भ्रष्टाचार के स्पष्ट प्रमाण हैं। सरकार को चाहिए कि इस सिस्टम में पारदर्शिता लाए और भ्रष्ट कर्मचारियों पर कठोर कार्रवाई करे। जब तक जांच प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी नहीं होगी, तब तक बिजली चोरी के नाम पर यह अवैध कमाई का खेल चलता रहेगा, और इसका सबसे बड़ा नुकसान मासूम उपभोक्ताओं और सरकारी खजाने को होगा।




