ज़की भारतीय
लखनऊ, 30 सितंबर । उत्तर प्रदेश के बरेली में विगत दिनों ‘आई लव मोहम्मद’ पोस्टर विवाद को लेकर हुए प्रदर्शन और हिंसा ने सांप्रदायिक तनाव को जन्म दिया है। इस घटना में पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों पर किए गए लाठीचार्ज और इसके बाद व्यापारियों द्वारा पुलिस पर की गई पुष्प वर्षा ने कई सवाल खड़े किए हैं। इस घटना की निंदा करते हुए यह सवाल उठता है कि क्या पुलिस का बर्बरतापूर्ण लाठीचार्ज उचित था और क्या व्यापारियों की पुष्प वर्षा सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ने का प्रयास नहीं है?
घटना का विवरण
शुक्रवार, 26 सितंबर 2025 को जुमे की नमाज के बाद बरेली में ‘आई लव मोहम्मद’ पोस्टर विवाद को लेकर इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल (आईएमसी) के प्रमुख मौलाना तौकीर रजा के आह्वान पर सैकड़ों लोग सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शनकारी इस्लामिया मैदान की ओर बढ़ रहे थे ताकि एक ज्ञापन सौंप सकें। पुलिस ने इस प्रदर्शन के लिए अनुमति नहीं दी थी और बैरिकेडिंग लगाकर भीड़ को रोकने की कोशिश की। पुलिस के अनुसार, कुछ उपद्रवियों ने पथराव और तोड़फोड़ शुरू कर दी, जिसके जवाब में पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा।
हालांकि, अभी तक कोई ऐसा फुटेज सामने नहीं आया है जिसमें प्रदर्शनकारियों द्वारा पुलिस पर फायरिंग की पुष्टि हो। इसके विपरीत, सोशल मीडिया और समाचार चैनलों पर वायरल वीडियो में पुलिस को लाठियों से प्रदर्शनकारियों पर प्रहार करते देखा गया। कुछ प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पुलिस ने बर्बरतापूर्ण तरीके से लाठीचार्ज किया, जिसमें कई लोग घायल हुए।
पुलिस की कार्रवाई: उचित या अतिशयोक्ति?
पुलिस का कहना है कि प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड तोड़ने की कोशिश की और पथराव किया, जिसके कारण लाठीचार्ज करना पड़ा। डीआईजी अजय कुमार साहनी ने इसे “सुनियोजित साजिश” करार दिया और कहा कि 170 से अधिक कैमरों के फुटेज के आधार पर उपद्रवियों की पहचान की जा रही है। एसएसपी अनुराग आर्य ने बताया कि 15-16 लोगों को हिरासत में लिया गया और उनके मोबाइल जब्त किए गए। मौलाना तौकीर रजा समेत 39 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से कुछ को 14 दिन की हिरासत में भेजा गया है।
हालांकि, यह सवाल उठता है कि क्या पुलिस का लाठीचार्ज इतना आक्रामक होना चाहिए था? प्रदर्शनकारी एक धार्मिक अभियान के समर्थन में शांतिपूर्वक ज्ञापन सौंपने की कोशिश कर रहे थे। पुलिस ने पहले उन्हें रोकने की कोशिश की, जो उचित हो सकता है, लेकिन बर्बरतापूर्ण लाठीचार्ज ने स्थिति को और तनावपूर्ण बना दिया। सपा मुखिया अखिलेश यादव ने बिना बरेली का नाम लिए ट्वीट किया, “सरकारें लाठीचार्ज से नहीं, सौहार्द-सद्भाव से चलती हैं।”
व्यापारियों की पुष्प वर्षा: सौहार्द या भेदभाव?
घटना के बाद बरेली के व्यापारियों द्वारा पुलिस अधिकारियों पर पुष्प वर्षा और फूलों का हार पहनाने की घटना ने विवाद को और हवा दी। सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में व्यापारी डीआईजी अजय साहनी और एसएसपी अनुराग आर्य पर फूल बरसाते और गले में हार डालते नजर आए। व्यापारियों का कहना है कि पुलिस ने शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए सराहनीय कार्य किया। लेकिन यह सवाल उठता है कि क्या यह पुष्प वर्षा सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ने का प्रयास नहीं है?
बरेली में दुकानों में लूटपाट या तोड़फोड़ की कोई पुष्ट घटना सामने नहीं आई है, जिसे दंगाइयों द्वारा अंजाम दिया गया हो। पुलिस ने स्थिति को जल्दी नियंत्रित कर लिया, लेकिन व्यापारियों की यह हरकत मुस्लिम समुदाय के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैये को दर्शाती है। यह पूछा जाना चाहिए कि जब अयोध्या में 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद हिंसा हुई थी, तब क्या हिंदू समुदाय या संगठनों ने पुलिस पर ऐसी ही पुष्प वर्षा की थी? उस समय सपा सरकार के तहत पुलिस ने गोलियां चलाई थीं, लेकिन मुस्लिम समुदाय ने पुलिस की प्रशंसा में कोई बयान या हरकत नहीं की।
सांप्रदायिक तनाव और ‘पोस्टर वॉर’
‘आई लव मोहम्मद’ विवाद की शुरुआत कानपुर में बारावफात जुलूस के दौरान हुई, जब कुछ लोगों ने इस तरह के पोस्टर लगाए। हिंदू संगठनों ने इसे “नई परंपरा” बताकर सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने का आरोप लगाया। इसके जवाब में हिंदू संगठनों ने ‘आई लव महादेव’ पोस्टर लगाकर एक तरह का “पोस्टर वॉर” शुरू कर दिया। यह विवाद बरेली, उन्नाव, बागपत, और अन्य शहरों तक फैल गया।
बरेली के आजम नगर में भी एक घटना सामने आई, जहां बच्चों की क्रिकेट बॉल ‘आई लव मोहम्मद’ पोस्टर पर लगने से हिंदू-मुस्लिम पक्षों के बीच कहासुनी हो गई। इस तरह की छोटी-छोटी घटनाएं सांप्रदायिक तनाव को और भड़का रही हैं।
बरेली की घटना ने एक बार फिर सांप्रदायिक सौहार्द पर सवाल उठाए हैं। पुलिस की कार्रवाई को कुछ लोग शांति व्यवस्था बनाए रखने का प्रयास मानते हैं, तो कुछ इसे बर्बरतापूर्ण दमन। व्यापारियों की पुष्प वर्षा ने इस मामले को और जटिल बना दिया है। क्या यह पुष्प वर्षा सामाजिक एकता को बढ़ावा देती है या भेदभाव को उजागर करती है? क्या पुलिस का लाठीचार्ज अनुपात में था? और सबसे बड़ा सवाल, क्या इस तरह की घटनाएं भारत के सामाजिक ताने-बाने को कमजोर नहीं कर रही हैं?
इस घटना की कड़ी निंदा होनी चाहिए। जिन लोगों ने पुलिस के मना करने के बावजूद बैरिकेड तोड़ने की कोशिश की, उनके खिलाफ कार्रवाई उचित हो सकती है, लेकिन पुलिस को भी अपनी कार्रवाई में संयम बरतना चाहिए था। साथ ही, व्यापारियों को ऐसी हरकतों से बचना चाहिए जो एक समुदाय विशेष पर बर्बरता होने पर प्रसन्नता प्रकट करे।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कांवड़ियों के उत्पात पर ये संदेह किया था
मुझे याद है कि लखनऊ में विगत वर्षों में सीएए, एनआरसी और एनपीआर को लेकर हज़रतगंज के परिवर्तन चौराहे पर प्रदर्शन हुआ था। उस समय मैं स्वयं कवरेज कर रहा था। प्रदर्शनकारी बहुत बड़ी संख्या में नारेबाज़ी कर रहे थे और पुलिस चारों तरफ़ से उन्हें घेरे हुए थी।
लेकिन अचानक बेगम हज़रत महल पार्क के अंदर, पेड़ों के पीछे से बड़े-बड़े पत्थर चलने लगे। यह देखकर मैं स्वयं हैरत में पड़ गया कि आख़िर अंदर से पत्थर कौन चला रहा है? पर भीड़ ने यह सोचने की बजाय पुलिस पर पथराव शुरू कर दिया। इसके बाद वहां दंगा भड़क गया।
इस घटना में मैं प्रत्यक्षदर्शी था। मेरा कैमरा तोड़ा गया, मुझे भी पब्लिक ने मारा, मेरे ऊपर बरसाए गए पत्थरों से मेरा हेलमेट टूट गया। मैं अस्पताल में भर्ती हुआ और कई टांके लगे। मैंने स्वयं एफआईआर भी दर्ज कराई।
मैंने अपनी आँखों से यह सत्य देखा कि दंगा वास्तव में कैसे शुरू हुआ।
जिस तरह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कांवड़ियों के उत्पात और दंगा करने पर कहा था कि कांवड़ियों को बदनाम करने के लिए कुछ लोग उनकी वेशभूषा में शामिल होकर उत्पात कर रहे थे ताकि कांवड़ियों को बदनाम किया जा सके।उन्होंने ये भी कहा था कि वो सीसी कैमरे में कैद हो चुके है,उनकी तस्वीरें चस्पा की जाएंगी और कठोर कार्रवाई की जाएगी। हालांकि एक वर्ष बीत जाने के बाद भी किसी की न तो कोई तस्वीर सामने आई और न ही कोई कार्रवाई हुई। लोगों ने इस संबंध में योगी आदित्यनाथ पर आरोप भी लगाए थे कि कांवड़ियों को बचाने के लिए ये फर्जी बयान दिया गया था।लेकिन ऐसी बात स्वयं योगी जी भी सोचते हैं। मिलती हैं, उसी प्रकार दंगाई भीड़ में घुसकर दंगा भड़का सकते हैं। बरेली की घटना भी इसी प्रकार संगठित तरीके से हुई थी, जहाँ किसी ने जानबूझकर दंगा भड़काया और पुलिस की नज़र वहां तक नहीं पहुँच पाई। हालाँकि यह अलग बात है कि भीड़ को अपने जज़्बातों पर क़ाबू रखना चाहिए था। यदि वे केवल प्रशासन को ज्ञापन (मेमोरेंडम) देने गए थे, तो शांति से वही देकर लौटना चाहिए था। परंतु उत्तेजना में आकर भीड़ ने भी पथराव किया। इसलिए प्रशासन को इस दृष्टिकोण से भी विचार करना चाहिए कि हो सकता है कि दंगा सुनियोजित रूप से भड़काया गया हो।
बरेली हिंसा के बाद बुलडोजर एक्शन: 15 और आरोपी गिरफ्तार, IMC जिलाध्यक्ष शमशाद आलम भी हिरासत में; सपा ने पुलिस पर उत्पीड़न का आरोप लगाया
बरेली में ‘आई लव मुहम्मद’ कैंपेन के खिलाफ प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा के बाद पुलिस ने सख्ती बरती। सुबह 9 बजे के आसपास 15 और आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया, जिसमें इंडियन मुस्लिम काउंसिल (IMC) के जिलाध्यक्ष शमशाद आलम भी शामिल हैं। अब तक 72 आरोपी पकड़े जा चुके हैं। दोपहर 1 बजे प्रशासन ने हिंसा प्रभावित इलाकों में बुलडोजर चलाया, जिसमें अवैध निर्माण ध्वस्त किए गए। सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि दंगाइयों को सबक सिखाया जाएगा, जिससे आने वाली पीढ़ियां दंगा भूल जाएंगी। स्थानीय लोगों ने बताया कि हिंसा में 20 से अधिक लोग घायल हुए, और संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचा। पुलिस ने अब तक 50 से अधिक वाहनों को जब्त किया है, और जांच में पाकिस्तानी संगठनों से लिंक मिलने की बात कही जा रही है। यह घटना यूपी में सांप्रदायिक तनाव को कम करने के प्रयासों पर सवाल खड़ी कर रही है। शाम 4 बजे सपा नेताओं ने डीआईजी से शिकायत की कि निर्दोषों का उत्पीड़न हो रहा है। डीआईजी ने जांच का आश्वासन दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद सोशल मीडिया से भड़का, जहां 500 से अधिक पोस्ट वायरल हुए। राज्य सरकार ने इंटरनेट सस्पेंड किया, लेकिन बहाली की समय सीमा तय की।



