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पत्रकार मुईद खान और KGMU यूरोलॉजी विभाग की अनुकरणीय मिसाल: किडनी ट्रांसप्लांट की जीवटता और चिकित्सा उत्कृष्टता

ज़की भारतीय

लखनऊ, 11 अक्टूबर । दैनिक समाचार पत्र हिंदुस्तान ब्यूरो के स्वामी,निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकार मुईद खान ने न केवल अपनी लेखनी से समाज की कमजोरियों को उजागर किया और सत्य को सामने लाए, बल्कि अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी जंग—किडनी ट्रांसप्लांट—को भी अटूट हौसले और साहस के साथ जीतकर एक प्रेरणादायक मिसाल कायम की। इस जीत में उनका साथ दिया किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के यूरोलॉजी विभाग ने, जिसने अपनी चिकित्सकीय विशेषज्ञता, समर्पण और मानवीय दृष्टिकोण से न केवल मोहित को नया जीवन दिया, बल्कि यह भी साबित किया कि KGMU का हर विभाग अनियमितताओं या शिकायतों का पर्याय नहीं है। यूरोलॉजी विभाग ने अपनी मेहनत और निष्ठा से एक बार फिर सिद्ध किया कि यह संस्थान चिकित्सा के क्षेत्र में उत्कृष्टता का प्रतीक है।

अचानक बीमारी का सामना और अडिग हौसला

कुछ समय पहले मुईद खान को अचानक गंभीर स्वास्थ्य समस्या का सामना करना पड़ा। शुरू में सामान्य लगने वाली परेशानी ने जल्द ही गंभीर रूप ले लिया। जब वे KGMU के यूरोलॉजी विभाग में जांच के लिए पहुंचे, तो डॉक्टरों ने पाया कि उनकी एक किडनी पूरी तरह खराब हो चुकी थी, और दूसरी किडनी भी तेजी से प्रभावित हो रही थी। डॉक्टरों ने तत्काल किडनी ट्रांसप्लांट की सलाह दी, क्योंकि देरी दूसरी किडनी को भी निष्क्रिय कर सकती थी। यह खबर किसी के लिए भी डरावनी हो सकती थी, लेकिन मुईद खान, जिनकी लेखनी हमेशा से साहस और सत्य की प्रतीक रही, ने इस चुनौती को भी उसी निडरता से स्वीकार किया।

KGMU यूरोलॉजी विभाग की अनुकरणीय भूमिका

KGMU का यूरोलॉजी विभाग लंबे समय से जटिल सर्जरी और उच्चस्तरीय चिकित्सा सुविधाओं के लिए जाना जाता है। इस बार भी विभाग ने अपनी काबिलियत का परिचय दिया। विभागाध्यक्ष और उनकी टीम ने मुईद की स्थिति को गंभीरता से लिया और तुरंत एक व्यापक उपचार योजना तैयार की। सर्जरी से पहले मरीज को मानसिक रूप से तैयार करने के लिए डॉक्टरों ने न केवल उनकी शंकाओं का समाधान किया, बल्कि उन्हें और उनके परिवार को हर कदम पर विश्वास में लिया। यह विभाग की मानवीय संवेदनशीलता और पेशेवर दृष्टिकोण का प्रमाण था।
सुबह 8 बजे शुरू हुआ यह किडनी ट्रांसप्लांट ऑपरेशन करीब पांच घंटे तक चला। सर्जरी अत्यंत जटिल थी, क्योंकि मरीज की स्थिति गंभीर थी और इसमें जोखिम की संभावना अधिक थी। लेकिन यूरोलॉजी विभाग की टीम ने अपनी विशेषज्ञता, अत्याधुनिक तकनीक और समन्वित प्रयासों से इस सर्जरी को सफल बनाया। ऑपरेशन थिएटर में मौजूद हर डॉक्टर, नर्स और टेक्नीशियन ने अपने कर्तव्य को पूरी निष्ठा से निभाया। सर्जरी के बाद मुईद को 28 टांके लगाए गए, और उनकी स्थिति को स्थिर करने के लिए गहन निगरानी की गई।

निडरता की मिसाल: खुद किया सिग्नेचर

ऑपरेशन से पहले एक ऐसा क्षण आया, जो मुईद खान के साहस को दर्शाता है। सामान्यतः ऐसी जटिल सर्जरी में परिजनों या जिम्मेदार व्यक्तियों से सहमति के लिए हस्ताक्षर लिए जाते हैं। लेकिन मुईद ने अपनी हिम्मत का परिचय देते हुए खुद ही सर्जरी की सहमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय न केवल उनकी निडरता को दर्शाता है, बल्कि उनके आत्मविश्वास और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण को भी उजागर करता है। इस कदम ने अस्पताल के स्टाफ को भी हैरान कर दिया, और डॉक्टरों ने उनकी इस हिम्मत की सराहना की।

ऑपरेशन के बाद की प्रेरणा

सर्जरी के बाद जब मुईद को होश आया, तो उनके चेहरे पर डर की कोई रेखा नहीं थी। इसके बजाय, उन्होंने एक हल्की मुस्कान के साथ डॉक्टरों और स्टाफ को धन्यवाद दिया। उनकी यह जिंदादिली देखकर अस्पताल में मौजूद हर व्यक्ति प्रभावित हुआ। जहां अधिकांश मरीज इतनी जटिल सर्जरी के बाद लंबे समय तक आराम करते हैं और शारीरिक-मानसिक कमजोरी का सामना करते हैं, वहीं मुईद ने सभी को चौंका दिया। डिस्चार्ज होने के दूसरे ही दिन, वो अपने निजी वाहन खुद ड्राइव करके KGMU में ड्रेसिंग के लिए पहुंच गए। यह अपने आप में एक असाधारण उदाहरण था कि इंसान का हौसला और इच्छाशक्ति कितनी बड़ी ताकत हो सकती है।
मुईद यहीं नहीं रुके। अस्पताल में मौजूद अन्य मरीजों के बीच जाकर उन्होंने मिठाइयां बांटीं और उन्हें हौसला दिया। “देखिए, मैं चल रहा हूं, आपसे बात कर रहा हूं, आप भी हिम्मत रखें। बीमारी से डरने की जरूरत नहीं है,” कहकर उन्होंने मरीजों को मानसिक रूप से मजबूत किया। उन्होंने सभी से गले मिलकर दुआएं दीं और उनके चेहरों पर मुस्कान बिखेरी। उनकी यह सकारात्मकता और दूसरों को प्रेरित करने का जज़्बा अस्पताल में चर्चा का विषय बन गया।

मुईद का प्रेरणादायक संदेश

मुईद खान ने ऑपरेशन के बाद अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए कहा,
“जिंदगी और मौत ईश्वर के हाथ में हैं, लेकिन हौसला इंसान का अपना होता है। बीमारी शरीर को कमजोर कर सकती है, लेकिन इरादों को नहीं।”
उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा, “डॉक्टरों ने मेरी किडनी की स्टोरी को हैप्पी एंडिंग दी, अब मैं जिंदगी की नई स्टोरी लिखूंगा।” उनकी यह बातें न केवल अस्पताल के स्टाफ और मरीजों के लिए, बल्कि समाज के हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा हैं, जो मुश्किलों से घबराते हैं।

KGMU यूरोलॉजी विभाग: उत्कृष्टता का प्रतीक

KGMU का यूरोलॉजी विभाग इस पूरी कहानी में एक नायक की तरह उभरकर सामने आया। कुछ समय से मेडिकल कॉलेज के कुछ विभागों में अनियमितताओं और स्टाफ के व्यवहार को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं। लेकिन यूरोलॉजी विभाग ने यह साबित किया कि KGMU का हर कोना ऐसी कमियों का पर्याय नहीं है। इस विभाग ने न केवल अपनी चिकित्सकीय विशेषज्ञता का परिचय दिया, बल्कि मरीजों के प्रति संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण का भी उदाहरण पेश किया।
डॉक्टरों ने मुईद की सर्जरी को न केवल तकनीकी रूप से सफल बनाया, बल्कि उनकी तेज रिकवरी में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सर्जरी के बाद मरीज की स्थिति को स्थिर करने और रिकवरी को गति देने में विभाग की अत्याधुनिक सुविधाएं, अनुभवी चिकित्सक और समर्पित स्टाफ का योगदान सराहनीय रहा। विभागाध्यक्ष ने बताया, “मुईद जैसे मरीज हम डॉक्टरों के लिए प्रेरणा हैं। उनकी हिम्मत और सकारात्मक रवैये ने हमारा काम आसान कर दिया, लेकिन यह हमारी जिम्मेदारी थी कि हम उन्हें सर्वश्रेष्ठ इलाज दें।”
यूरोलॉजी विभाग की इस उपलब्धि को नजरअंदाज करना नाइंसाफी होगी। जिस तरह से डॉक्टरों ने मुईद की सर्जरी को अंजाम दिया, उनकी हर छोटी-बड़ी जरूरत का ध्यान रखा, और उनकी तेज रिकवरी सुनिश्चित की, वह अपने आप में एक मिसाल है। यह विभाग न केवल चिकित्सा के क्षेत्र में उत्कृष्टता का प्रतीक है, बल्कि यह भी दिखाता है कि KGMU जैसे संस्थान अपने मरीजों के प्रति कितने समर्पित हैं।

लेखनी और जिंदगी में एक जैसी सच्चाई

मुईद खान की लेखनी हमेशा से सत्य, निष्पक्षता और समाज हित के लिए जानी जाती है। उनकी खबरें न केवल लोगों की समस्याओं को उजागर करती हैं, बल्कि सरकार और प्रशासन तक उनकी आवाज पहुंचाती हैं। जिस तरह उनकी लेखनी में साहस और सत्य की झलक दिखती है, उसी तरह उनकी जिंदगी में भी यह साहस और निडरता साफ नजर आई। ऑपरेशन से पहले उन्होंने डॉक्टरों से हंसते हुए कहा, “मेरे सामने ऑपरेशन हो रहा है, कम से कम मैं देख तो रहा हूं। कुछ दुश्मन तो पीठ पीछे वार करते हैं।” इस मौके पर उन्होंने एक शेर भी सुनाया:

“मेरे दुश्मन झिझकता है क्यों,पुशत पर वार करता है क्यों।
या मुकाबल में आ जा मेरे,या मेरा रास्ता छोड़ दे!”

इस शेर के जरिए उन्होंने न केवल अपने निजी और पेशेवर जीवन में पीठ पीछे हमला करने वालों को जवाब दिया, बल्कि यह भी साबित किया कि उनकी लेखनी और जिंदगी दोनों में एक ही सिद्धांत है—सच का साथ और सामने से हर चुनौती का सामना। मुईद का मानना है कि जो इंसान सच के रास्ते पर चलता है, उसके दुश्मन तो बनते हैं, लेकिन साहस और हौसला ही उसे हर जंग में जीत दिलाता है।

एक प्रेरणादायक कहानी

मुईद खान की यह कहानी सिर्फ एक सफल किडनी ट्रांसप्लांट की नहीं, बल्कि एक ऐसे शख्स की है, जिसने अपनी लेखनी की तरह अपनी जिंदगी में भी सच्चाई, निडरता और हौसले को जिंदा रखा। उनकी यह जंग उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है, जो बीमारी या मुश्किलों से डर जाते हैं। मुईद ने साबित किया कि 50% जंग तो इंसान का हौसला ही जीत लेता है। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि—
“परेशानी आज है, कल नहीं होगी। हौसला रखें, जिंदगी आपको नया मौका जरूर देगी।”

KGMU के यूरोलॉजी विभाग की मेहनत और मुईद खान के साहस ने मिलकर एक ऐसी कहानी लिखी, जो न केवल चिकित्सा जगत की उपलब्धि है, बल्कि इंसानी हौसले और विश्वास की जीत भी है। हम कामना करते हैं कि मुईद खान हमेशा इसी तरह लोगों की सेवा करते रहें, उनकी लेखनी समाज के कमजोर तबके की आवाज बने, और उनका समाचार पत्र हिंदुस्तान ब्यूरो हर घर तक पहुंचे। साथ ही, KGMU का यूरोलॉजी विभाग अपनी इस उत्कृष्टता को बनाए रखे और मरीजों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहे।

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