ज़की भारतीय
लखनऊ, 11 अक्टूबर। । उत्तर प्रदेश की राजधानी में पत्रकारों के लिए सूचना प्राप्त करने की राह में नई बाधाएँ खड़ी की जा रही हैं। सरकारी और गैर-सरकारी अस्पतालों, पुलिस विभाग, और नगर निगम जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों में पत्रकारों की आवाज को दबाने के लिए नए नियम लागू किए गए हैं। इन नियमों के तहत पत्रकारों को न तो इन स्थानों पर प्रवेश की अनुमति दी जा रही है और न ही निचले स्तर के अधिकारियों से बयान लेने की इजाजत है। इससे जनता और मीडिया के बीच की खाई गहरी हो रही है, और विभिन्न विभागों में अनियमितताएँ, लापरवाही, और मनमानी बेलगाम हो रही हैं। यह स्थिति न केवल पत्रकारिता के लिए खतरा है, बल्कि जनता की समस्याओं को उजागर करने की प्रक्रिया को भी कमजोर कर रही है।
अस्पतालों में पत्रकारों की एंट्री पर रोक से बढ़ रही मनमानी
पिछले कई महीनों से सरकारी और गैर-सरकारी अस्पतालों में पत्रकारों और उनके कैमरामैन की एंट्री पर सख्त पाबंदी लागू है। इस रोक का औचित्य मरीजों की गोपनीयता और अस्पतालों की कार्यप्रणाली में व्यवधान न होने के रूप में बताया जा रहा है, लेकिन इसका दुरुपयोग हो रहा है। पत्रकारों की अनुपस्थिति में अस्पतालों में अनियमितताएँ चरम पर हैं। मरीजों के साथ दुर्व्यवहार, अनावश्यक वेंटिलेटर पर रखकर लाखों रुपये की उगाही, और मृत मरीजों को जिंदा दिखाकर धन वसूली जैसे गंभीर मामले सामने आ रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिनमें मरीजों को वेंटिलेटर पर रखा गया, लेकिन वेंटिलेटर हटाने पर पता चला कि मरीज पहले ही मृत हो चुका था। इसके अलावा, मरीजों के साथ मारपीट और अभद्र व्यवहार की घटनाएँ भी बढ़ रही हैं। सरकारी और अर्ध-सरकारी अस्पतालों की यूनियनों का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि पुलिस भी उनके सामने नतमस्तक है। कई मामलों में पीड़ित मरीजों की शिकायतों पर कार्रवाई करने के बजाय, पुलिस डॉक्टरों के पक्ष में केस दर्ज करती है। इसका कारण यह है कि पुलिस को डर है कि डॉक्टरों की यूनियन हड़ताल पर चली जाएगी, जिससे उनकी नौकरी खतरे में पड़ सकती है। नतीजतन, पीड़ितों के खिलाफ कार्रवाई होती है, जबकि दोषी डॉक्टरों पर कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया जाता। यह स्थिति इसलिए और गंभीर हो रही है क्योंकि पत्रकारों को इन अनियमितताओं को उजागर करने से रोका जा रहा है। कैमरामैन को अस्पतालों में प्रवेश न देने की वजह से डॉक्टरों का मनोबल बढ़ा हुआ है, और वे बिना किसी जवाबदेही के मनमानी कर रहे हैं। यदि पत्रकारों को इन मामलों को उजागर करने की अनुमति नहीं दी गई, तो आने वाले समय में यह स्थिति और विकराल हो सकती है।
पुलिस विभाग में बयान देने पर पाबंदी: जवाबदेही पर सवाल
पुलिस विभाग में भी पत्रकारों के लिए नई मुश्किलें खड़ी की गई हैं। पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) ने एक आदेश जारी कर स्पष्ट किया था कि अब कोई भी चौकी इंचार्ज, सब-इंस्पेक्टर (SI), या स्टेशन ऑफिसर (SO) अपनी ओर से कोई बयान नहीं देगा। इसके बजाय, केवल क्षेत्रीय अधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP), या डीजीपी ही बयान जारी कर सकते हैं। यह नियम कई सवाल खड़े करता है। यदि कोई गलती चौकी इंचार्ज, SI, या SO स्तर पर होती है, तो पत्रकारों को उसी अधिकारी से जवाब लेने का अधिकार होना चाहिए। क्षेत्रीय अधिकारी को निचले स्तर के अधिकारियों की गलतियों की पूरी जानकारी नहीं होती, तो वह पत्रकारों के सवालों का सटीक जवाब कैसे दे पाएंगे? इस नियम का परिणाम यह हुआ है कि निचले स्तर के पुलिस कर्मियों की गलतियों पर पर्दा डाला जा रहा है। पत्रकारों को जवाब देने से रोककर उनकी जवाबदेही को कम किया जा रहा है, जिससे जनता को न्याय मिलने में बाधा आ रही है। यह सवाल उठता है कि यदि कोई गलती सिपाही या चौकी इंचार्ज की है, तो पत्रकार उससे क्यों नहीं पूछ सकते? इस तरह के नियमों से पुलिस कर्मियों की मनमानी बढ़ रही है, और उनकी गलतियों को छिपाने का रास्ता तैयार किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, यदि कोई सिपाही या चौकी इंचार्ज किसी मामले में लापरवाही बरतता है, तो पत्रकारों को उससे सवाल पूछने का अधिकार होना चाहिए। लेकिन जब क्षेत्रीय अधिकारी ही जवाब देने के लिए अधिकृत हैं, और उन्हें पूरी जानकारी नहीं होती, तो यह प्रक्रिया न केवल अव्यवहारिक है, बल्कि अन्याय को बढ़ावा देती है। यह नियम निचले स्तर के अधिकारियों को जवाबदेही से बचाने का एक तरीका प्रतीत होता है, जिससे जनता के साथ होने वाले अन्याय को छिपाया जा सके।
नगर निगम में भी बयान देने पर रोक: जनता की समस्याएँ अनसुनी
नगर निगम में भी स्थिति कुछ अलग नहीं है। जोन 6 के जोनल अधिकारी मनोज यादव ने हाल ही में एक मामले पर बात करते हुए कहा कि अब उन्हें या अन्य जोनल अधिकारियों को बयान देने का अधिकार नहीं है। कोई भी जानकारी या बयान लेने के लिए पत्रकारों को मुख्यालय स्तर पर नगर आयुक्त या मुख्य नगर आयुक्त से संपर्क करना होगा। यह नियम भी जनता और पत्रकारों के बीच दूरी बढ़ाने वाला साबित हो रहा है। उदाहरण के लिए, यदि कोई टैक्स निरीक्षक या जोनल अधिकारी गलत हाउस टैक्स वसूली कर रहा है, तो पत्रकार उससे सीधे सवाल क्यों नहीं कर सकते? पुराने लखनऊ जैसे क्षेत्रों में हाउस टैक्स के नाम पर मनमानी वसूली की शिकायतें आम हैं। स्थायी निवासियों को बार-बार नोटिस भेजे जा रहे हैं, और टैक्स माफी की कोई व्यवस्था नहीं की जा रही। इसके बावजूद, बुनियादी सुविधाएँ जैसे सड़क, स्ट्रीट लाइट, और सीवर सिस्टम की स्थिति बदहाल है। कई इलाकों में सड़कें टूटी हुई हैं, स्ट्रीट लाइटें नहीं हैं, और सीवर ठीक नहीं हैं। फिर भी, हाउस टैक्स के नाम पर जनता से पैसा वसूला जा रहा है। हाउस टैक्स का उद्देश्य सड़क निर्माण, स्ट्रीट लाइट, और सीवर सिस्टम जैसी सुविधाओं के लिए धन जुटाना है, लेकिन पिछले 10-20 सालों से कई इलाकों में ये सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं। सड़कों पर पेचवर्क नहीं हुआ, आरसीसी रोड्स नहीं बनीं, और इंटरलॉकिंग रोड्स भी टूटी पड़ी हैं। इसके बावजूद, टैक्स की दरें बढ़ाई जा रही हैं। अंग्रेजों के समय से चले आ रहे टैक्स जैसे रोड टैक्स, दवाइयों पर टैक्स, खाने पर टैक्स, और इनकम टैक्स आज भी लागू हैं, लेकिन जनता को बदले में मूलभूत सुविधाएँ नहीं मिल रही हैं।
पत्रकारों की भूमिका और बढ़ती खाई
पत्रकारों पर लगाई गई ये पाबंदियाँ न केवल उनकी कार्यक्षमता को प्रभावित कर रही हैं, बल्कि जनता की आवाज को भी दबा रही हैं। यदि पत्रकारों को अस्पतालों पर प्रवेश और बयान लेने से रोका जाएगा, तो अनियमितताएँ और लापरवाही कैसे उजागर होंगी? पत्रकारों और उनके कैमरामैन को इन स्थानों पर जाने की अनुमति होनी चाहिए ताकि वे गलतियों को कैमरे में कैद कर सकें और जनता के सामने ला सकें। यदि यह स्थिति जारी रही, तो आने वाले समय में हालात और विकराल हो सकते हैं। पत्रकारों के साथ सौतेला व्यवहार और जनता के बीच बढ़ती खाई से आम लोगों की समस्याएँ और बढ़ेंगी। नगर निगम के मुख्य आयुक्त के पास पूरे लखनऊ की समस्याओं को सुनने और जवाब देने का समय नहीं है। इसी तरह, यदि हर छोटी-बड़ी जानकारी के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से संपर्क करना पड़े, तो यह व्यवस्था अव्यवहारिक होगी।
मुख्यमंत्री और डीजीपी से अपील
वर्तमान डीजीपी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को इस मामले में त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए। पत्रकारों को हर विभाग में प्रवेश और बयान लेने की अनुमति दी जानी चाहिए। प्रत्येक क्षेत्र के अधिकारी को अपनी जिम्मेदारी के तहत जवाब देने का अधिकार होना चाहिए। यदि कोई गलती टैक्स निरीक्षक, चौकी इंचार्ज, या डॉक्टर की है, तो उसे ही जवाब देना चाहिए। अस्पताल, पुलिस, और नगर निगम जैसे विभाग जनता की सुविधा और उनकी आवाज सुनने के लिए बनाए गए हैं। इनका वेतन और खर्च जनता के टैक्स से चलता है। इसलिए, अधिकारियों को यह समझना होगा कि वे जनता के नौकर हैं और उनकी जवाबदेही जनता के प्रति है। पत्रकारों को इन विभागों में प्रवेश और सवाल पूछने की आजादी मिलनी चाहिए ताकि अनियमितताएँ उजागर हों और दोषियों पर कार्रवाई हो। यदि पत्रकारों की आवाज को दबाया गया, तो यह न केवल लोकतंत्र के लिए खतरा है, बल्कि जनता की समस्याओं को अनसुना करने की साजिश भी है। मुख्यमंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों को इस दिशा में तत्काल कदम उठाने चाहिए ताकि पत्रकारिता अपनी भूमिका निभा सके और जनता को न्याय मिल सके।



