HomeUTTAR PRADESHनिजीकरण के विरोध में उत्तर प्रदेश में बिजली विभाग की हड़ताल

निजीकरण के विरोध में उत्तर प्रदेश में बिजली विभाग की हड़ताल

सरकार बिजली चोरी और घाटे का हवाला देकर बिजली विभाग को निजी हाथों में सौंपने की बना रही है योजना

लखनऊ,25 मई। उत्तर प्रदेश में विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति के बैनर तले बिजली कर्मचारियों का आंदोलन तेजी पकड़ चुका है। यह आंदोलन मुख्य रूप से पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के प्रस्तावित निजीकरण के खिलाफ चल रहा है। कर्मचारियों का आरोप है कि सरकार बिजली चोरी और घाटे का हवाला देकर बिजली विभाग को निजी हाथों में सौंपने की योजना बना रही है, जिससे न केवल कर्मचारियों की नौकरी खतरे में है, बल्कि आम जनता को भी महंगी बिजली और खराब सेवाओं का सामना करना पड़ेगा। इस आंदोलन में भ्रष्टाचार और प्रबंधन की कथित अनियमितताओं के खिलाफ भी आवाज उठ रही है, जिसने इस मुद्दे को और जटिल बना दिया है।

हड़ताल और प्रदर्शन का स्वरूप

विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने 29 मई 2025 से अनिश्चितकालीन कार्य बहिष्कार की चेतावनी दी है। इसके पहले, 21 मई से 28 मई तक पूरे प्रदेश में दोपहर 2 बजे से शाम 5 बजे तक तीन घंटे का विरोध प्रदर्शन शुरू हो चुका है। लखनऊ, वाराणसी, आगरा, मेरठ, कानपुर, गोरखपुर, प्रयागराज, अलीगढ़, नोएडा, गाजियाबाद, मिर्जापुर, और अन्य 30 से अधिक जिलों में कर्मचारियों ने कार्यालयों के बाहर प्रदर्शन किए। लखनऊ के शक्ति भवन में प्रदर्शन के दौरान तनाव की स्थिति तब पैदा हुई, जब पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन ने भवन के सभी गेट बंद कर दिए, जिससे कामकाज प्रभावित हुआ। कर्मचारियों ने ऊर्जा मंत्री और पावर कॉरपोरेशन के चेयरमैन पर गलत आंकड़े पेश कर जनता को गुमराह करने का आरोप लगाया।

निजीकरण का मुद्दा और बिजली चोरी का बहाना

कर्मचारियों का कहना है कि सरकार बिजली चोरी और वित्तीय घाटे को निजीकरण का आधार बना रही है, लेकिन यह केवल बड़े औद्योगिक घरानों को फायदा पहुंचाने की साजिश है। ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेंद्र दुबे ने आरोप लगाया कि पूर्वांचल और दक्षिणांचल निगमों की अरबों रुपये की संपत्ति को औने-पौने दामों पर बेचने की कोशिश हो रही है। कर्मचारी यह भी दावा करते हैं कि प्रबंधन द्वारा नियुक्त कंसल्टेंट, जैसे ग्रांट थॉर्टन, अवैध ढंग से काम कर रहे हैं और बैक डेटिंग जैसे फर्जीवाड़े में शामिल हैं। दूसरी ओर, बिजली चोरी का मुद्दा भी चर्चा में है। मध्यांचल विद्युत वितरण निगम के 2022 के आंकड़ों के अनुसार, बीकेटी और चिनहट जैसे क्षेत्रों में बिजली चोरी के मामले सर्वाधिक पाए गए, जिसके लिए अभियान चलाए गए और लाखों रुपये का जुर्माना वसूला गया। कर्मचारियों का मानना है कि बिजली चोरी को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की बजाय, सरकार इसे निजीकरण का बहाना बना रही है।

भ्रष्टाचार और प्रबंधन पर सवाल

आंदोलन में शामिल कर्मचारियों ने पावर कॉरपोरेशन के प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि प्रबंधन निजीकरण की जिद पर अड़ा है और कर्मचारियों के शांतिपूर्ण आंदोलन को दबाने के लिए हड़ताल थोपने की कोशिश कर रहा है। इसके अलावा, कुछ भ्रष्ट अधिकारियों पर भी सवाल उठ रहे हैं, जो कथित तौर पर बिजली चोरी से होने वाली कमाई को निजीकरण के बाद भी जारी रखना चाहते हैं। कर्मचारियों का तर्क है कि सरकार निजीकरण के जरिए इन समस्याओं को हल करने के बजाय, चुनिंदा पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने की दिशा में काम कर रही है, जैसा कि लखनऊ हवाई अड्डे जैसे अन्य क्षेत्रों के निजीकरण में देखा गया।

सरकार का रुख और कर्मचारियों की मांग

उत्तर प्रदेश सरकार ने हड़ताल के प्रति सख्त रुख अपनाया है। पावर कॉरपोरेशन ने कार्मिक नियमावली में संशोधन कर इसे और कड़ा कर दिया है, जिसे कर्मचारियों ने उत्पीड़न का हथियार बताया। कर्मचारी और उपभोक्ता परिषद निजीकरण के फैसले को तत्काल वापस लेने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि निजीकरण से बिजली दरों में बढ़ोतरी होगी और गरीब-मध्यम वर्ग पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा। साथ ही, 25,000 से अधिक संविदा कर्मचारियों की नौकरी पर खतरा मंडरा रहा है।

उत्तर प्रदेश में बिजली विभाग की हड़ताल और प्रदर्शन निजीकरण के खिलाफ एक बड़े आंदोलन का हिस्सा हैं। कर्मचारी और उपभोक्ता संगठन इसे जनविरोधी कदम मानते हैं, जो भ्रष्टाचार और बिजली चोरी जैसे मुद्दों को हल करने के बजाय, निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने की दिशा में उठाया जा रहा है। सरकार और कर्मचारियों के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है, और यदि मांगें नहीं मानी गईं, तो यह आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है।

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