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तार-तार होती उत्तर प्रदेश की गंगा-जमुनी तहज़ीब: एक दर्दनाक इतिहास , वर्तमान की गलियों में

लेखक: ज़की भारतीय

उत्तर प्रदेश, वह धरती जिसे गंगा-जमुनी तहज़ीब का प्रतीक माना जाता था, आज अपनी उस पहचान को खोती नजर आ रही है। यह वह भूमि थी, जहां हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, सभी एक-दूसरे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर, प्यार और भाईचारे के साथ रहा करते थे। एक ऐसा दौर था, जब लोग एक-दूसरे के घरों में बिना झिझक आया-जाया करते थे, गपशप करते थे, राय-मशवरा लेते थे। मोहब्बत का आलम यह था कि लोग एक-दूसरे के लिए जान तक देने को तैयार रहते थे। लेकिन यह माहौल धीरे-धीरे बदलने लगा, और आज हम उस दौर में खड़े हैं, जहां यह तहज़ीब तार-तार होती दिखाई दे रही है। आखिर वह कौन सा मोड़ था, जिसने इस खूबसूरत ताने-बाने को छलनी कर दिया? इस लेख में हम इस सवाल का जवाब तलाशेंगे, इतिहास के पन्नों को पलटेंगे और वर्तमान की सच्चाई को सामने लाएंगे।

एक स्वर्णिम दौर का अंत

उत्तर प्रदेश की गंगा-जमुनी तहज़ीब का स्वर्णिम दौर वह था, जब लोग धर्म, जाति या संप्रदाय की दीवारों से परे थे। यह वह समय था, जब होली, दीवाली, ईद और क्रिसमस एक साथ मनाए जाते थे। पड़ोस में रहने वाले हिंदू और मुस्लिम परिवार एक-दूसरे के त्योहारों में शरीक होते थे। गंगा के किनारे होली की मस्ती और रमज़ान की इफ्तारी में एक समान उत्साह दिखता था। लेकिन यह सौहार्द धीरे-धीरे कम होने लगा, और इसका एक बड़ा कारण 1990 के दशक में शुरू हुई वह घटना थी, जिसने न केवल उत्तर प्रदेश, बल्कि पूरे भारत की सामाजिक और राजनीतिक तस्वीर को बदल दिया।

रथ यात्रा और साम्प्रदायिकता का उदय

1984 में भाजपा के पास लोकसभा की मात्र 3 सीटें थी जिसके बाद से भाजपा द्वारा राम मंदिर निर्माण के बावत मुहिम तेज़ हो गई और1989 में भाजपा 84 सीटें हासिल कर चुकी थी।1990 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अयोध्या में राम जन्मभूमि आंदोलन को गति देने के लिए रथ यात्रा शुरू की। यह यात्रा सिर्फ धार्मिक नहीं थी, बल्कि इसका राजनीतिक मकसद भी था। बाबरी मस्जिद को राम जन्मभूमि के रूप में प्रस्तुत कर एक ऐसा माहौल बनाया गया, जिसने हिंदू-मुस्लिम एकता को गहरी चोट पहुंचाई। इस यात्रा ने जहां भाजपा को सियासी लाभ दिलाया, वहीं समाज में ध्रुवीकरण की शुरुआत भी की। उस समय तक भाजपा के पास भारत में केवल 84 संसदीय सीटें थीं। लेकिन रथ यात्रा और उसके बाद हुए घटनाक्रम ने पार्टी को एक नई ताकत दी।उसी दौर में, दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी (सपा) के तत्कालीन नेता मुलायम सिंह यादव ने भी साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का लाभ उठाया। 1990 में कारसेवकों पर गोली चलाने के फैसले ने मुलायम सिंह को मुस्लिम समुदाय का ‘मसीहा’ बना दिया। उनके इस कदम ने हिंदुओं के एक बड़े वर्ग को कट्टर हिंदुत्व की ओर धकेल दिया, जिसका फायदा भाजपा को मिला। मुलायम सिंह के डायलॉग, जैसे “परिंदा भी पर नहीं मार सकता,” ने मुस्लिम समुदाय में उनकी छवि को और मजबूत किया। दीवारों पर “मुल्ला मुलायम सिंह यादव” जैसे नारे लिखे जाने लगे। यह वह दौर था, जब सपा और भाजपा, दोनों ने धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल कर अपने-अपने वोट बैंक बनाए।

सियासत का जहरीला खेल

इस ध्रुवीकरण का नतीजा यह हुआ कि उत्तर प्रदेश की राजनीति पूरी तरह साम्प्रदायिक हो गई। जहां एक तरफ भाजपा ने हिंदुओं को यह विश्वास दिलाया कि वह उनकी ‘रक्षक’ है, वहीं सपा ने मुस्लिम समुदाय को अपनी तरफ खींचा। इस खेल में कांग्रेस जैसी सेकुलर पार्टियां हाशिए पर चली गईं। अटल बिहारी वाजपेई जैसे दिग्गज नेता, जो लखनऊ से चुनाव लड़ते थे, उस दौर में हार का सामना कर चुके थे। कांग्रेस, जो कभी उत्तर प्रदेश और देश की राजनीति में एकछत्र राज करती थी, धीरे-धीरे मिट्टी में मिलने लगी।इस बीच, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की नेता मायावती ने भी दलित वोटों को एकजुट करने की कोशिश की। लेकिन बाद में उनके कुछ फैसलों ने दलित वोटों का एक हिस्सा भाजपा की तरफ मोड़ दिया। मायावती के इस कदम के पीछे कई सवाल उठे, लेकिन यह स्पष्ट था कि सियासी गठजोड़ और दबाव ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई।सामाजिक ताने-बाने पर चोटइस साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का सबसे बड़ा नुकसान उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना को हुआ। दलितों, मुस्लिमों और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ हिंसा की घटनाएं बढ़ने लगीं। बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर की मूर्तियों को तोड़ा जाने लगा, उनकी मूर्तियों पर जूतों की माला चढ़ाई जाने लगी। दलितों को मंदिरों में प्रवेश करने से रोका गया, उनकी बारातों को ठाकुरों के घरों के सामने से गुजरने की इजाजत नहीं दी गई। घोड़े पर चढ़कर बारात निकालने की परंपरा को भी रोकने की कोशिशें हुईं। ये घटनाएं यह दर्शाती हैं कि भारत का सामाजिक ताना-बाना कितना कमजोर हो चुका है।सुप्रीम कोर्ट और न्याय की उम्मीदइस बीच, सुप्रीम कोर्ट ने कई बार सामाजिक और धार्मिक मुद्दों पर महत्वपूर्ण फैसले दिए। अयोध्या राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसे मुस्लिम समुदाय ने भी स्वीकार किया। लेकिन कुछ नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट पर भी उंगली उठाने की कोशिश की। हाल ही में भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने सुप्रीम कोर्ट पर विवादित बयान दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि कोर्ट दंगे करवाना चाहता है। ऐसे बयान न केवल न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाते हैं, बल्कि लोकतंत्र के लिए भी खतरा हैं। फिर भी, सुप्रीम कोर्ट ने हमेशा अपनी स्वतंत्रता और निष्पक्षता को बनाए रखा है।वर्तमान और भविष्यआज उत्तर प्रदेश में गंगा-जमुनी तहज़ीब की जगह साम्प्रदायिकता और नफरत ने ले ली है। लोग अब रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी समस्याओं की बजाय धार्मिक मुद्दों में उलझे हुए हैं। मुफ्त राशन और सांप्रदायिक उन्माद ने लोगों को इस कदर जकड़ लिया है कि वे अपनी वास्तविक समस्याओं को भूल चुके हैं। लेकिन क्या यह स्थिति हमेशा रहेगी? नहीं, इतिहास गवाह है कि जब भी समाज में अंधेरा गहराता है, तब कोई न कोई रोशनी की किरण उभरती है।आज जरूरत है कि हम अपनी गंगा-जमुनी तहज़ीब को फिर से जीवित करें। लेखकों, कवियों, पत्रकारों और समाज के हर जागरूक व्यक्ति को इस दिशा में कदम उठाने होंगे। हमें उन कहानियों को फिर से लिखना होगा, जो प्यार, भाईचारे और एकता की बात करती हैं। हमें उन कविताओं को गाना होगा, जो नफरत की दीवारों को तोड़ती हैं। हमें उन किताबों को पढ़ना और पढ़ाना होगा, जो हमें हमारी साझा विरासत की याद दिलाती हैं।

उत्तर प्रदेश की गंगा-जमुनी तहज़ीब हमारी सबसे बड़ी ताकत थी, और इसे बचाना हमारी जिम्मेदारी है। यह तहज़ीब कोई किताबी बात नहीं है; यह उन लोगों की जिंदगियों में बसी थी, जो एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े होते थे। आज, जब हम देखते हैं कि यह तहज़ीब तार-तार हो रही है, तो हमें चुप नहीं रहना चाहिए। हमें अपनी कलम, अपनी आवाज, और अपने कार्यों से इस तहज़ीब को फिर से मजबूत करना होगा।जाकी भारतीय के रूप में, मैं यह अपील करता हूं कि हम सब मिलकर उस उत्तर प्रदेश को फिर से बनाएं, जहां गंगा और यमुना की तरह हिंदू और मुस्लिम एक साथ बहें, एक-दूसरे को मजबूत करें, और एक ऐसी धरती बनाएं, जो प्यार, शांति और एकता का प्रतीक हो। यह लेख उस स्वर्णिम तहज़ीब को समर्पित है, जो कभी हमारी पहचान थी, और जिसे हमें फिर से अपनी पहचान बनाना है।

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