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जब प्रोफेसर अली खान गिरफ्तार किए जा सकते हैं तो ,बीजेपी मंत्री विजय शाह आज़ाद क्यों है ?

ज़की भारतीय

हरियाणा के सोनीपत में अशोका यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद की गिरफ्तारी ने देश में एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के कथित दोहरे मापदंडों पर सवाल खड़े किए हैं। दूसरी ओर, मध्य प्रदेश के बीजेपी मंत्री विजय शाह, जिन्होंने भारतीय सेना की कर्नल सोफिया कुरैशी को “आतंकवादियों की बहन” कहकर अपमानित किया, के खिलाफ हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद कोई सख्त कार्रवाई नहीं हुई। यह विडंबना न केवल कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत को चुनौती देती है, बल्कि बीजेपी के धर्म-आधारित पक्षपात के आरोपों को भी हवा देती है।

प्रोफेसर अली खान की गिरफ्तारी: क्या था उनका “अपराध”?

18 मई 2025 को हरियाणा पुलिस ने प्रोफेसर अली खान को “ऑपरेशन सिंदूर” और कर्नल सोफिया कुरैशी पर उनकी सोशल मीडिया टिप्पणी के लिए गिरफ्तार किया। उनकी फेसबुक पोस्ट में कहा गया था, “मुझे खुशी है कि दक्षिणपंथी टिप्पणीकार कर्नल सोफिया कुरैशी की तारीफ कर रहे हैं, लेकिन वे शायद उतनी ही जोर से मॉब लिंचिंग, मनमाने बुलडोजर कार्यवाही और बीजेपी के नफरत फैलाने वाले एजेंडे के शिकार लोगों के लिए भी न्याय की मांग कर सकते हैं।”इस पोस्ट को हरियाणा राज्य महिला आयोग ने “महिला अधिकारियों का अपमान” और “सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने” वाला माना। बीजेपी युवा मोर्चा के महासचिव योगेश जठेरी की शिकायत पर दो एफआईआर दर्ज की गईं, जिनमें “संप्रभुता और अखंडता को खतरा” जैसे गंभीर आरोप शामिल थे। प्रोफेसर को तुरंत दिल्ली से गिरफ्तार कर लिया गया, बिना यह स्पष्ट किए कि उनकी टिप्पणी में ऐसा क्या था जो इतनी तेज कार्रवाई को उचित ठहराता हो। कई बुद्धिजीवियों और विपक्षी नेताओं, जैसे टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा और पत्रकार सुहासिनी हैदर, ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताया।

बीजेपी मंत्री विजय शाह का मामला: अपमान के बावजूद राहत

दूसरी ओर, मध्य प्रदेश के जनजातीय कार्य मंत्री विजय शाह ने 12 मई 2025 को इंदौर के रायकुंडा गांव में एक कार्यक्रम के दौरान कर्नल सोफिया कुरैशी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की। उन्होंने कुरैशी को “आतंकवादियों की बहन” कहकर न केवल एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी का अपमान किया, बल्कि भारतीय सेना की गरिमा और राष्ट्रीय एकता पर भी सवाल उठाए।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए 4 घंटे के भीतर शाह के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया। हालांकि, इंदौर के मानपुर पुलिस थाने में दर्ज एफआईआर को हाई कोर्ट ने “अपूर्ण” और “राज्य सरकार की घोर धोखाधड़ी” करार दिया, क्योंकि इसमें गंभीर धाराएं शामिल नहीं थीं। शाह ने सुप्रीम कोर्ट में राहत की मांग की, लेकिन मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने उनकी टिप्पणी को “अस्वीकार्य और असंवेदनशील” बताते हुए फटकार लगाई और राहत देने से इनकार कर दिया।हैरानी की बात है कि शाह के खिलाफ अब तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई। बीजेपी ने उन्हें केवल माफी मांगने को कहा, और पार्टी नेतृत्व ने मामले को “संवेदनशीलता से संभालने” का दावा किया। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी केवल “सेना के प्रति सम्मान” की बात की, बिना कोई ठोस कार्रवाई की।

बीजेपी का दोहरा रवैया: धर्म और सत्ता का खेल?

इन दो मामलों की तुलना साफ तौर पर बीजेपी के कथित पक्षपात को उजागर करती है। प्रोफेसर अली खान, जो एक मुस्लिम शिक्षाविद हैं, को एक सोशल मीडिया पोस्ट के लिए तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि उनकी टिप्पणी में न तो कोई अपमान था, न ही सैन्य बलों के खिलाफ कोई प्रत्यक्ष हमला। दूसरी ओर, बीजेपी के हिंदू मंत्री विजय शाह, जिन्होंने एक मुस्लिम महिला सैन्य अधिकारी को खुले तौर पर अपमानित किया, को न केवल गिरफ्तारी से छूट दी गई, बल्कि उनकी पार्टी और राज्य सरकार ने उनके बचाव में तर्क पेश किए।
विपक्षी नेताओं ने इस दोहरे मापदंड पर कड़ा ऐतराज जताया है। कांग्रेस के पवन खेड़ा ने कहा, “महमूदाबाद की गिरफ्तारी उनकी पहचान और उनकी मुखर टिप्पणी के कारण हुई।” बीएसपी प्रमुख मायावती ने शाह की टिप्पणी को “अति-दुखद और शर्मनाक” बताते हुए बीजेपी से सख्त कार्रवाई की मांग की। सोशल मीडिया पर भी लोग इस असमानता पर सवाल उठा रहे हैं, जैसे @manojkjhadu ने लिखा, “एक बीजेपी नेता कर्नल सोफिया को उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर बदनाम करता है, और उसकी पार्टी उसे डांटने की भी जहमत नहीं उठाती।
क्या यह केवल धर्म और सत्ता का खेल है?प्रोफेसर अली खान की त्वरित गिरफ्तारी और विजय शाह के खिलाफ कार्रवाई में देरी यह सवाल उठाती है कि क्या बीजेपी का रवैया धर्म और सत्ता के आधार पर तय होता है। एक मुस्लिम शिक्षाविद को मामूली टिप्पणी पर जेल भेज दिया जाता है, जबकि एक हिंदू बीजेपी मंत्री को देश की बेटी और सेना की वीरांगना का अपमान करने के बावजूद संरक्षण मिलता है। यह न केवल कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है, बल्कि देश की एकता और सेना के सम्मान पर भी सवाल खड़ा करता है।जब तक बीजेपी इस तरह के दोहरे मापदंडों को स्पष्ट नहीं करती, तब तक यह धारणा मजबूत होती रहेगी कि सत्ताधारी पार्टी के लिए न्याय का आधार धर्म और राजनीतिक रसूख है, न कि सत्य और निष्पक्षता।

सुप्रीम कोर्ट में प्रोफेसर अली खान की गिरफ्तारी के खिलाफ याचिका, सुनवाई 20-21 मई को संभावित

सुप्रीम कोर्ट ने प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद की गिरफ्तारी के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई है। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने मुख्य न्यायाधीश के समक्ष यह मामला उठाया, जिसके बाद कोर्ट ने 20 या 21 मई 2025 को सुनवाई का भरोसा दिया। याचिका में दावा किया गया है कि प्रोफेसर अली खान की गिरफ्तारी गलत तथ्यों और बाहरी दबाव के आधार पर हुई। यदि यह साबित होता है कि गिरफ्तारी फर्जी या गलत आधार पर की गई, तो सुप्रीम कोर्ट को उन अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई, जिसमें निलंबन भी शामिल हो, करनी चाहिए, जिन्होंने सरकार या अन्य दबाव में आकर प्रोफेसर को फंसाया। एक शिक्षित व्यक्ति और प्रोफेसर के खिलाफ ऐसी कार्रवाई से पहले पुलिस को उनके बयानों की जांच और स्पष्टीकरण के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस करनी चाहिए थी। बिना ठोस सबूत के किसी को देशद्रोही करार देना गलत है। कपिल सिब्बल को चाहिए कि वे दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करें, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों।

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