ज़की भारतीय
कहते हैं, जुबान से निकला तीर और कमान से निकला बाण वापस नहीं लौटता। मध्य प्रदेश के जनजातीय कार्य मंत्री विजय शाह द्वारा भारतीय सेना की वीरांगना लेफ्टिनेंट कर्नल सोफिया कुरैशी पर दी गई आपत्तिजनक टिप्पणी भले ही कुछ समय पुरानी हो, लेकिन इसका दंश आज भी समाज को झकझोर रहा है। यह बयान, जो मई 2025 की शुरुआत में महू के एक सार्वजनिक मंच से दिया गया, न केवल एक सैन्य अधिकारी का अपमान था, बल्कि देश की एकता, सेना की गरिमा, और सेकुलर मूल्यों पर हमला था। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने इस मामले में स्वत: संज्ञान लेकर सख्त कार्रवाई के आदेश दिए, लेकिन पुलिस और डीजीपी की लचर कार्रवाई ने सवाल खड़े किए हैं। सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बावजूद, माफी के नाम पर अपराध को हल्का करने की कोशिशें चिंता का विषय हैं। यह लेख इसलिए लिखा जा रहा है, क्योंकि सच्चाई को दस्तावेज करना और सेकुलर भारत की नींव को मजबूत करना हमारा कर्तव्य है। यह उन लेखकों, कवियों, और कलमकारों को समर्पित है, जो सत्य और एकता के लिए लड़ते हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि उत्तर प्रदेश में भी कुछ लोग थे, जिन्होंने सच्चाई का साथ दिया।
कर्नल सोफिया कुरैशी: देश की शान
लेफ्टिनेंट कर्नल सोफिया कुरैशी भारतीय सेना की पहली मुस्लिम महिला लेफ्टिनेंट कर्नल हैं, जिन्होंने “ऑपरेशन सिंदूर” का नेतृत्व किया। यह ऑपरेशन जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल 2025 को हुए आतंकी हमले के जवाब में शुरू किया गया, जिसमें 26 लोग मारे गए थे। आतंकी संगठन TRF और लश्कर-ए-तैयबा की जिम्मेदारी सामने आई थी। सोफिया कुरैशी ने PoK में आतंकी ठिकानों को ध्वस्त करने में अहम भूमिका निभाई और प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारत की रणनीति को दुनिया के सामने रखा। उनकी वीरता ने देश का सिर गर्व से ऊंचा किया।
विजय शाह का अपमानजनक बयान
मई 2025 की शुरुआत में, मध्य प्रदेश के महू तहसील के रायकुंडा गांव में एक सार्वजनिक सभा में विजय शाह ने सोफिया कुरैशी के खिलाफ सांप्रदायिक और अपमानजनक टिप्पणी की। उन्होंने कथित तौर पर कहा, “हमने उनकी (आतंकवादियों की) बहन को भेजकर उनकी ऐसी-तैसी करवाई।” यह बयान न केवल सोफिया की धार्मिक पहचान पर हमला था, बल्कि सेना की एक महिला अधिकारी की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला था। यह टिप्पणी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई, जिससे देशभर में आक्रोश फैल गया। बसपा सुप्रीमो मायावती ने इसे “अत्यंत दुखद और शर्मनाक” करार दिया, जबकि राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी इसकी निंदा की।विजय शाह ने बाद में माफी मांगी, लेकिन उनकी मंशा पर सवाल उठे। उन्होंने दावा किया कि उनका इरादा सोफिया की तारीफ करना था, लेकिन “गलत शब्द” निकल गए। मगर यह दलील जनता को संतुष्ट नहीं कर सकी। X पर लोगों ने इसे सेना और महिलाओं के अपमान के रूप में देखा। एक यूजर ने लिखा, “सोफिया कुरैशी ऑपरेशन सिंदूर का चेहरा हैं। उन्हें गद्दार या आतंकवादी की बहन कहना देश का अपमान है।
हाई कोर्ट का स्वत: संज्ञान
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट (जबलपुर खंडपीठ) ने 14 मई 2025 को इस मामले में स्वत: संज्ञान लिया। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की युगलपीठ ने विजय शाह के बयान को “गटर की भाषा” और “सशस्त्र बलों के लिए अपमानजनक” बताया। कोर्ट ने डीजीपी को उसी दिन शाम तक भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 (राष्ट्रीय एकता को खतरे में डालना), 196(1)(B) (सांप्रदायिक विद्वेष फैलाना), और 197 (सार्वजनिक शांति भंग करना) के तहत FIR दर्ज करने का आदेश दिया।डीजीपी ने आदेश का पालन करते हुए महू के मानपुर थाने में 14 मई 2025 को देर रात FIR दर्ज की। लेकिन इस FIR में गंभीर धाराओं को शामिल नहीं किया गया। इसके बजाय, हल्की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया, जिसे कोर्ट ने 15 मई 2025 को देखकर तीखी नाराजगी जताई। जस्टिस श्रीधरन ने कहा, “यह FIR खानापूर्ति मात्र है। इसे रद्द करने के लिए ही लिखा गया है।” कोर्ट ने डीजीपी को नई FIR दर्ज करने और सभी निर्देशित धाराओं को शामिल करने का आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट की फटकार
विजय शाह ने हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें FIR रद्द करने की मांग की गई। लेकिन 15 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने की, ने उन्हें कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा, “जाइए और माफी मांगिए। थोड़ी समझदारी दिखाइए।” लेकिन सुप्रीम कोर्ट का यह बयान कई सवाल खड़े करता है। क्या माफी मांगने से इतना गंभीर अपराध माफ हो सकता है? क्या कोई व्यक्ति देश की वीरांगना को गद्दार कहे, उनकी धार्मिक पहचान पर हमला करे, और फिर माफी मांगकर बच जाए?यदि कोई थप्पड़ मार दे, कत्ल कर दे, या किसी की बहन-माता के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी कर दे, तो क्या माफी मांगने से वह अपराध खत्म हो जाएगा? यदि ऐसा होने लगा, तो देश में हर व्यक्ति ऐसी हरकत करेगा और बाद में कहेगा, “मुझे माफ कर दो, गलती हो गई।” सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश को गलत तरीके से पेश नहीं किया जाना चाहिए। हाई कोर्ट में विजय शाह यह दावा नहीं कर सकते कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें माफी मांगने का निर्देश दिया, इसलिए मामला खत्म हो जाए। गलती की सजा मिलनी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई ऐसी हिम्मत न करे। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का सम्मान होना चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अपराध को हल्का किया जाए।
भाजपा की चुप्पी और सांप्रदायिकता का बढ़ता जहर
इस मामले में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की चुप्पी ने कई सवाल खड़े किए। प्रदेश अध्यक्ष वी.डी. शर्मा ने बयान को “अनुचित” बताया, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। सूत्रों के अनुसार, BJP आलाकमान विजय शाह पर दबाव बना रहा है, लेकिन उनकी बर्खास्तगी पर कोई फैसला नहीं हुआ। यह चुप्पी उन कई मामलों की याद दिलाती है, जहां BJP ने अपने नेताओं के विवादास्पद बयानों पर मौन साधा।
भाजपा नेताओं के अन्य विवादास्पद बयान
नूपुर शर्मा (2022): BJP की तत्कालीन प्रवक्ता नूपुर शर्मा ने एक टीवी डिबेट में पैगंबर मोहम्मद पर टिप्पणी की, जिसके बाद देशभर में बवाल मच गया।
BJP ने उन्हें निलंबित किया, लेकिन देरी से कार्रवाई ने विवाद को बढ़ाया। कई देशों ने भारत के खिलाफ नाराजगी जताई।
BJP सांसद प्रज्ञा ठाकुर ने नाथूराम गोडसे को “देशभक्त” बताया। BJP ने दूरी बनाई, लेकिन कोई सख्त कार्रवाई नहीं की।
बिहार के उपमुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद ने अल्पसंख्यकों के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की। BJP ने इसे “निजी राय” बताकर पल्ला झाड़ लिया।
2014 केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने दिल्ली में एक रैली में सांप्रदायिक टिप्पणी की। BJP ने माफी मांगने को कहा, लेकिन कोई सजा नहीं दी।
2023 BJP सांसद रमेश बिधूड़ी ने संसद में बसपा सांसद दानिश अली के खिलाफ सांप्रदायिक टिप्पणी की। BJP ने उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया, लेकिन कोई सख्त कार्रवाई नहीं हुई।इन मामलों में BJP की चुप्पी या देरी ने सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया। विजय शाह के मामले में भी यही पैटर्न दिख रहा है। यह सवाल उठता है कि क्या BJP सांप्रदायिक बयानों को मौन समर्थन दे रही है?
सांप्रदायिकता का खतरा और सेकुलरिज्म की जरूरत
विजय शाह का बयान केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं, बल्कि देश की सेकुलर नींव पर हमला है। सोफिया कुरैशी को “आतंकवादियों की बहन” कहना उनकी धार्मिक पहचान पर हमला था, और यह देश के हर उस नागरिक का अपमान है, जो बिना धर्म या जाति के भेदभाव के देश की सेवा करता है। यह बयान उस मानसिकता को दर्शाता है, जो देश को हिंदू-मुस्लिम के चश्मे से देखना चाहती है।जब हम सो रहे होते हैं, तब हमारे जवान जाग रहे होते हैं। सोफिया कुरैशी जैसी वीरांगनाएं 24 घंटे देश की रक्षा में तैनात हैं। उनके अपमान को बर्दाश्त करना देश के हर नागरिक का अपमान है। सांप्रदायिकता का यह जहर देश की एकता को कमजोर कर रहा है। यदि इसे रोका नहीं गया, तो देश में जंगल राज स्थापित हो जाएगा।
जजों की साहसिक भूमिका
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जजों ने इस मामले में जो साहस दिखाया, वह प्रशंसनीय है। जस्टिस अतुल श्रीधरन और अनुराधा शुक्ला ने न केवल स्वत: संज्ञान लिया, बल्कि पुलिस की लापरवाही को उजागर किया। उनकी यह सक्रियता देश के हर नागरिक के लिए एक उम्मीद की किरण है। यह साबित करता है कि जब सिस्टम सच्चाई को दबाने की कोशिश करता है, तब भी कुछ लोग हैं जो सच के लिए लड़ते हैं।



