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इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष: वैश्विक खामोशी और भारत का आतंकवाद-विरोधी रुख

 जकी भारतीय

इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष दशकों से वैश्विक मंच पर चर्चा का विषय रहा है, लेकिन 2023-2025 के बीच गाजा में इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों ने मानवता को झकझोर दिया है। हजारों निहत्थे फिलिस्तीनी, जिनमें बच्चे, महिलाएँ, और बुजुर्ग शामिल हैं, बमबारी में मारे गए हैं। संयुक्त राष्ट्र और Amnesty International ने इजरायल पर युद्ध अपराधों के आरोप लगाए, फिर भी वैश्विक समुदाय की चुप्पी चौंकाने वाली है। दूसरी ओर, भारत ने पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों पर “ऑपरेशन सिंदूर” के तहत सटीक हमले किए, जो आतंकवाद के खिलाफ उसकी जीरो-टॉलरेंस नीति को दर्शाते हैं। यह लेख इजरायल की कार्रवाइयों और भारत की नीति के बीच अंतर को उजागर करता है, और वैश्विक खामोशी के भू-राजनीतिक, आर्थिक, और मीडिया-संबंधी कारणों की पड़ताल करता है

इजरायल का नरसंहार बनाम भारत का आतंकवाद-विरोधी अभियान

भारत ने 6-7 मई 2025 को ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान और PoK में 9 आतंकी ठिकानों को नष्ट किया। इन हमलों में जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठनों को निशाना बनाया गया, और नागरिक क्षेत्रों को नुकसान नहीं पहुँचाया गया। भारतीय सेना ने सटीक खुफिया जानकारी के आधार पर कार्रवाई की, और विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने स्पष्ट किया कि यह “नपी-तुली और गैर-उग्र” कार्रवाई थी। भारत का उद्देश्य आतंकवाद को खत्म करना था, न कि किसी देश की मासूम जनता को नुकसान पहुँचाना।इसके विपरीत, इजरायल की गाजा में कार्रवाइयाँ अंधाधुंध रही हैं। अस्पताल, स्कूल, और रिहायशी इलाकों पर बमबारी ने लाखों फिलिस्तीनियों को बेघर कर दिया। Amnesty International की रिपोर्ट्स के अनुसार, इजरायल ने जानबूझकर नागरिक क्षेत्रों को निशाना बनाया, जो युद्ध अपराध की श्रेणी में आता है। इजरायल का दावा है कि वह हमास जैसे आतंकी संगठनों को निशाना बना रहा है, लेकिन मासूम बच्चों और महिलाओं की हत्याएँ इसे आतंकवादी कृत्य के करीब लाती हैं। जहाँ भारत ने आतंकियों को सजा दी, वहीं इजरायल की कार्रवाइयाँ पूरे फिलिस्तीनी समुदाय को दंडित करती प्रतीत होती हैं।

वैश्विक खामोशी के कारणभू-राजनीतिक हित

इजरायल अमेरिका का प्रमुख सहयोगी है, जो उसे $3.8 बिलियन की वार्षिक सैन्य सहायता देता है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इजरायल के खिलाफ प्रस्तावों को अमेरिका वीटो करता है।सऊदी अरब और यूएई जैसे देश अब्राहम समझौते (2020) के बाद इजरायल के साथ व्यापारिक और रणनीतिक संबंध बना रहे हैं, जिससे वे फिलिस्तीन मुद्दे पर कम मुखर हैं।

यूरोप का रुख

जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देश ऐतिहासिक कारणों (होलोकॉस्ट) और व्यापारिक हितों के चलते इजरायल की निंदा से बचते हैं।इजरायल की तकनीकी और सैन्य श्रेष्ठता (आयरन डोम, साइबर युद्ध) इसे वैश्विक मंच पर प्रभावशाली बनाती है। कई देश इसके साथ व्यापारिक संबंधों को प्राथमिकता देते हैं।भारत, जो इजरायल से रक्षा उपकरण खरीदता है, ने भी मानवीय सहायता के साथ फिलिस्तीन का समर्थन किया, लेकिन कठोर बयानबाजी से बचा है।

मीडिया पक्षपात

पश्चिमी मीडिया, जैसे बीबीसी, अक्सर इजरायली पीड़ितों को अधिक कवरेज देता है, जबकि फिलिस्तीनी पीड़ितों की कहानियाँ कम उजागर होती हैं।सोशल मीडिया पर इजरायल-विरोधी सामग्री को सेंसर करने के मामले सामने आए हैं, जिससे वैश्विक जागरूकता सीमित होती है।पश्चिमी देशों में इस्लामोफोबिया के कारण हमास को आतंकी संगठन के रूप में देखा जाता है, जिससे इजरायल की कार्रवाइयों को औचित्य मिलता है।यह धारणा फिलिस्तीनी नागरिकों के प्रति सहानुभूति को कम करती है।

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ने गाजा में नागरिकों की हत्याओं को “नरसंहार” करार दिया

दक्षिण अफ्रीका ने 2023 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में इजरायल के खिलाफ नरसंहार का मुकदमा दायर किया, जिसमें गाजा में नागरिकों की हत्याओं को “नरसंहार” करार दिया गया। यह मुकदमा मानवाधिकार के लिए एक ऐतिहासिक कदम है, क्योंकि यह इजरायल की जवाबदेही तय करने की माँग करता है। दक्षिण अफ्रीका, जिसने खुद रंगभेद का दंश झेला है, फिलिस्तीन को “अपार्थियड” का शिकार मानता है। हालाँकि, ICJ की कार्रवाई सीमित रही, क्योंकि इजरायल और अमेरिका इसकी सदस्यता को मान्यता नहीं देते।

भारत का रुख आतंकवाद का खात्मा, मानवता की रक्षा

भारत का आतंकवाद-विरोधी रुख सटीक और जिम्मेदार है। ऑपरेशन सिंदूर में केवल आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया, और नागरिकों को नुकसान नहीं पहुँचाया गया। भारत के 140 करोड़ नागरिक, जिनमें करोड़ों मुसलमान शामिल हैं, इस कार्रवाई के साथ हैं। आगरा के मुस्लिम समुदाय ने कहा, “आतंकवाद किसी धर्म का नहीं, मानवता का दुश्मन है।” यह एकता दर्शाती है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई धर्म से ऊपर है।इजरायल की कार्रवाइयाँ, जो पूरे फिलिस्तीनी समुदाय को दंडित करती हैं, आतंकवाद-विरोधी लड़ाई के सिद्धांतों का उल्लंघन करती हैं। जब मासूम बच्चे और महिलाएँ मारे जाते हैं, तो इसे आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई नहीं, बल्कि नरसंहार कहा जाता है। ईरान ने इजरायल को “आतंकवादी शासन” करार दिया, लेकिन अन्य देशों की चुप्पी मानवाधिकारों के प्रति उनकी उदासीनता को दर्शाती है।

मानवता की पुकार

आतंकवाद का खात्मा जरूरी है, लेकिन यह सटीक और मानवीय तरीके से होना चाहिए, जैसा भारत ने ऑपरेशन सिंदूर में किया। इजरायल की अंधाधुंध कार्रवाइयाँ न केवल फिलिस्तीनियों के लिए, बल्कि वैश्विक मानवता के लिए खतरा हैं। वैश्विक खामोशी भू-राजनीतिक हितों, आर्थिक लालच, और मीडिया पक्षपात का परिणाम है। दक्षिण अफ्रीका का ICJ मुकदमा एक उम्मीद की किरण है, लेकिन इसके लिए वैश्विक एकजुटता चाहिए। भारत के मुसलमानों और अन्य नागरिकों ने दिखाया है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में धर्म कोई बाधा नहीं है। दुनिया को भी यह सीख लेनी चाहिए कि आतंकवाद का खात्मा मानवता की रक्षा के साथ ही संभव है।

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