USCIRF की सिफारिशें और भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति
ज़की भारतीय
भारत, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र, अपनी विविधता के लिए जाना जाता है। यहां हिंदू, मुसलमान, ईसाई, सिख, दलित और अन्य समुदाय सदियों से साथ रहते आए हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर सवाल उठते रहे हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) ने अपनी 2026 की वार्षिक रिपोर्ट में भारत को ‘कंट्री ऑफ पार्टिकुलर कंसर्न’ (CPC) घोषित करने की सिफारिश की है, जो कि लगातार सातवीं बार है। रिपोर्ट में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर लक्षित प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है, जिसमें संपत्ति जब्त करना और अमेरिका में प्रवेश पर रोक शामिल है। यह सिफारिश भारत में मुसलमानों, ईसाइयों और दलितों पर होने वाले कथित अत्याचारों पर आधारित है। लेकिन क्या यह सिफारिश पूरी तरह निष्पक्ष है? या इसमें राजनीतिक पूर्वाग्रह हैं? इस लेख में हम इन मुद्दों पर तथ्य-आधारित चर्चा करेंगे, दोनों पक्षों को ध्यान में रखते हुए।
USCIRF की 2026 रिपोर्ट: मुख्य सिफारिशें
USCIRF एक अमेरिकी सरकारी निकाय है जो दुनिया भर में धार्मिक स्वतंत्रता की निगरानी करता है। इसकी 2026 रिपोर्ट में भारत पर विशेष ध्यान दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा, भेदभावपूर्ण कानून और उत्पीड़न बढ़ा है। USCIRF ने सिफारिश की है कि अमेरिकी सरकार RSS और रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) जैसे संगठनों से जुड़े व्यक्तियों पर लक्षित प्रतिबंध लगाए, जैसे संपत्ति फ्रीज करना और अमेरिका में प्रवेश रोकना। रिपोर्ट में RSS को धार्मिक स्वतंत्रता के गंभीर उल्लंघनों के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है, और कहा गया है कि इससे अल्पसंख्यक समुदाय भय में जी रहे हैं।
हालांकि, USCIRF की सिफारिशें बाध्यकारी नहीं हैं; ये केवल सलाह हैं, और ट्रंप प्रशासन इन्हें लागू करे या नहीं, यह उस पर निर्भर है। रिपोर्ट में 1990 और 2002 की घटनाओं का जिक्र भी है, जो पुरानी हैं। आलोचक कहते हैं कि USCIRF पक्षपाती है। इसके 9 सदस्यों में 6 ईसाई, 2 मुस्लिम और 1 यहूदी हैं, लेकिन कोई हिंदू नहीं। उपाध्यक्ष असिफ महमूद पाकिस्तानी मूल के हैं, और एक अन्य सदस्य पाकिस्तान में शरिया का अध्ययन कर चुके हैं।
इससे सवाल उठता है कि क्या रिपोर्ट में इस्लामिक देशों पर कम ध्यान दिया गया है? 53 मुस्लिम-बहुल देशों में से केवल 15 को चिंताजनक बताया गया है, जबकि भारत पर फोकस ज्यादा है। भारत सरकार ने USCIRF को ‘एंटिटी ऑफ कंसर्न’ घोषित किया है, और कहा है कि यह राजनीतिक रूप से प्रेरित है।
फिर भी, रिपोर्ट की कुछ बातें ध्यान देने योग्य हैं। भारत में FCRA, UAPA, CAA, NRC, वक्फ बिल और इमिग्रेशन बिल जैसे कानूनों पर USCIRF ने चिंता जताई है, जिन्हें अल्पसंख्यकों के खिलाफ बताया गया है। भारत सरकार इनका बचाव करती है, कहती है कि ये राष्ट्रीय सुरक्षा और पारदर्शिता के लिए हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इनकी वजह से भारत की छवि प्रभावित हो रही है।
भारत में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार और हाल के उदाहरण
2025 में भारत में धार्मिक हिंसा और हेट स्पीच में वृद्धि दर्ज की गई है। इंडिया हेट लैब की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में 1,318 हेट स्पीच इवेंट्स हुए, जो 2024 से 13% ज्यादा हैं। इनमें से 98% मुसलमानों को टारगेट करते थे, और 162 ईसाइयों को।
क्रिसमस 2025 के दौरान कई घटनाएं हुईं और छत्तीसगढ़ के रायपुर में बाजार में क्रिसमस डेकोरेशन तोड़े गए, मध्य प्रदेश में नेत्रहीन बच्चों के क्रिसमस लंच पर हमला हुआ, दिल्ली में सांता कैप पहनी महिलाओं को धमकाया गया। केरल में स्कूलों को क्रिसमस मनाने से रोका गया।
मुसलमानों के खिलाफ लिंचिंग्स जारी रहीं ओर हरियाणा में एक मुस्लिम मजदूर को बीफ खाने के शक में मार डाला गया, महाराष्ट्र में ट्रेन में मुस्लिम बुजुर्ग को पीटा गया।दलितों और आदिवासियों पर भी हमले हुए, खासकर ईसाई दलितों पर ‘जबरन धर्मांतरण’ के आरोप में।
12 राज्यों में एंटी-कन्वर्जन लॉ हैं, जो अल्पसंख्यकों को परेशान करने के लिए इस्तेमाल होते हैं।
मणिपुर में जातीय हिंसा में 200 से ज्यादा मौतें हुईं, जिसमें धार्मिक पहलू भी शामिल था।
लखनऊ में हाल की घटनाएं में एक मुस्लिम बच्चे की हत्या पर कार्रवाई न होने की शिकायतें हैं, जबकि हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़काने की कोशिशें हुईं। न्यायिक और पुलिस सिस्टम में पूर्वाग्रह के आरोप लगते हैं। हालांकि, सरकार इन घटनाओं को अलग-थलग बताती है और कहती है कि कानून सबके लिए बराबर है। कई मामलों में गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन आलोचक कहते हैं कि अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण मिलता है। हेट स्पीच में 23% में हिंसा की कॉल थी, जो चिंताजनक है।
दलितों पर मनुस्मृति का हवाला देकर उत्पीड़न के आरोप हैं, लेकिन यह अतिरंजित हो सकता है। दलितों की स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन जातीय हिंसा बनी हुई है।
RSS की ऐतिहासिक भूमिका और विवाद
RSS की स्थापना 1925 में के.बी. हेजगेवार ने की थी। इसका उद्देश्य हिंदू समाज को संगठित करना था, लेकिन स्वतंत्रता संग्राम में इसने कोई भूमिका नहीं निभाई। 1925 से 1947 तक RSS ने किसी आंदोलन में भाग नहीं लिया, न ब्रिटिशों के खिलाफ कोई अभियान चलाया।इसका फोकस हिंदू राष्ट्रवाद पर था, न कि भारतीय राष्ट्रवाद पर।
विभाजन के समय RSS पर कम्युनल हिंसा भड़काने के आरोप लगे। 1947 के दंगों में इसके सदस्यों की भूमिका बताई जाती है। महात्मा गांधी की हत्या (1948) में नाथूराम गोडसे, जो RSS का पूर्व सदस्य था, शामिल था। गोडसे ने RSS छोड़ा था, लेकिन हत्या में RSS का वातावरण बनाने का आरोप है।सरदार पटेल ने RSS पर बैन लगाया, लेकिन बाद में हटा लिया। RSS गांधी हत्या में अपनी संलिप्तता से इनकार करता है।
RSS पर हिंदू-मुस्लिम विभाजन को बढ़ावा देने का आरोप है, ताकि हिंदू राष्ट्र बन सके। लेकिन कई मुस्लिम क्रांतिकारी जैसे मौलाना अबुल कलाम आजाद ने भारत को अपना वतन माना और पाकिस्तान नहीं गए। RSS आज सामाजिक सेवा में सक्रिय है, लेकिन आलोचक इसे राजनीतिक संगठन कहते हैं।
USCIRF की सिफारिशें भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की समस्याओं को उजागर करती हैं, लेकिन इन्हें राजनीतिक रूप से देखा जा रहा है। भारत में हिंसा और हेट स्पीच को रोकने की जरूरत है, और सरकार को अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। RSS को भी अपनी छवि सुधारनी होगी। लेकिन भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, और सभी समुदायों को साथ लेकर चलना होगा। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स उपयोगी हैं, लेकिन आंतरिक सुधार से ही समस्याएं हल होंगी।



