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ऑपरेशन सिंदूर की सफलता का विश्व में ढिंढोरा क्यों ? वैश्विक यात्राओं पर उठने लगे हैं सवाल

ज़की भारतीय

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद विजयंत पांडा के नेतृत्व में एक सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल कुवैत पहुँचा, जो ऑपरेशन सिंदूर और भारत की आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को वैश्विक मंच पर प्रदर्शित करने की एक और कड़ी है। यह प्रतिनिधिमंडल, जिसमें असदुद्दीन ओवैसी (एआईएमआईएम), गुलाम नबी आज़ाद, और रेखा शर्मा जैसे नेता शामिल हैं, कुवैत से पहले बहरीन और सऊदी अरब की यात्रा कर चुका है। भारत सरकार ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद सात सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडलों को 32 देशों और यूरोपीय संघ में भेजा है, ताकि पहलगाम आतंकी हमले (22 अप्रैल 2025) और इसके जवाब में भारत की कार्रवाई को विश्व समुदाय के सामने रखा जाए। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस वैश्विक ढिंढोरे की वास्तव में आवश्यकता थी? क्या यह केवल सरकार की पीठ थपथपाने का नाटक है, या जनता की नज़रों से कमियों को छिपाने की रणनीति?

वैश्विक यात्राओं की आवश्यकता पर सवाल

भारत सरकार का दावा है कि ये प्रतिनिधिमंडल आतंकवाद के खिलाफ भारत की “शून्य सहनशीलता” नीति को दुनिया के सामने रख रहे हैं। विदेश मंत्रालय के अनुसार, ये यात्राएँ 23 मई 2025 से शुरू हुईं और विभिन्न देशों में संसद सदस्यों, विदेश मंत्रालयों, और थिंक टैंक्स के साथ बैठकें शामिल हैं। लेकिन क्या यह वैश्विक दौड़-धूप वास्तव में ज़रूरी थी?

ऑपरेशन सिंदूर, जिसे भारत सरकार आतंकवाद के खिलाफ एक निर्णायक कदम बताती है, 7 मई 2025 को शुरू हुआ, जब भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए। सरकार का दावा है कि इस ऑपरेशन में 100 से अधिक आतंकवादी मारे गए और 11 हवाई ठिकाने नष्ट किए गए। लेकिन इस “सफलता” के बावजूद, कई सवाल अनुत्तरित हैं। पहलगाम हमले में 26 लोगों की मौत हुई, और आतंकवादी बिना किसी रुकावट के हमला कर वापस चले गए। इस हमले के लिए ज़िम्मेदार आतंकवादियों की कोई तस्वीर, पहचान, या ठोस सबूत सार्वजनिक नहीं किए गए। वैश्विक मीडिया, जैसे बीबीसी या अन्य स्वतंत्र समाचार चैनल, ने भी इस बात पर सवाल उठाए कि भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के परिणामों को लेकर पारदर्शिता क्यों नहीं दिखाई।

पहलगाम हमले और ऑपरेशन सिंदूर की कमियाँ

पहलगाम हमला, जिसने 26 लोगों की जान ली, भारत की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। आतंकवादी न केवल हमला करने में सफल रहे, बल्कि बिना किसी तत्काल प्रतिक्रिया के भाग भी गए। ऑपरेशन सिंदूर को सरकार ने इसका जवाब बताया, लेकिन इसकी सफलता के दावों पर कई संदेह हैं। उदाहरण के लिए, भारत ने दावा किया कि उसने आतंकी ठिकानों को नष्ट किया, लेकिन पाकिस्तान ने उल्टा दावा किया कि उसने भारतीय राफेल जेट्स को मार गिराया। भारत ने इस दावे का खंडन नहीं किया, न ही कोई ठोस सबूत पेश किया। वैश्विक मीडिया ने भारत से हमले के सबूत, जैसे इंटरसेप्टेड संचार या मारे गए आतंकवादियों की जानकारी, माँगी, लेकिन सरकार ने केवल सामान्य बयान दिए। इसके अलावा, भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम की घोषणा को लेकर भी भ्रम है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने इस युद्धविराम में मध्यस्थता की, लेकिन भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने इसे द्विपक्षीय बताया। इस अस्पष्टता ने भारत की कूटनीतिक विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं। यदि ऑपरेशन सिंदूर इतना सफल था, तो युद्धविराम की शर्तें क्या थीं? क्या भारत ने पाकिस्तान को कोई रियायत दी? इन सवालों का जवाब न तो सरकार ने दिया, न ही ये प्रतिनिधिमंडल इनका जवाब देने में सक्षम हैं।

जनता पर आर्थिक बोझ

इन वैश्विक यात्राओं का सबसे बड़ा सवाल यह है कि इसका खर्च कौन उठा रहा है? सात प्रतिनिधिमंडल, 59 सांसद, और 8 पूर्व राजनयिक 32 देशों और यूरोपीय संघ में यात्रा कर रहे हैं। इन यात्राओं का खर्च, जिसमें हवाई यात्रा, आवास, और अन्य सुविधाएँ शामिल हैं, करोड़ों रुपये में है। यह पैसा अंततः भारतीय जनता की जेब से निकल रहा है। हाल के वर्षों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार वृद्धि देखी गई है। 2025 में पेट्रोल की कीमतें लखनऊ में 95-100 रुपये प्रति लीटर के आसपास हैं, और डीजल 90 रुपये प्रति लीटर के करीब। घरेलू गैस सिलेंडर की कीमतें भी 900-1000 रुपये तक पहुँच चुकी हैं। चावल और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में भी 10-15% की वृद्धि हुई है। इन यात्राओं का खर्च सरकार के बजट पर बोझ डाल रहा है, और यह बोझ अंततः करदाताओं पर पड़ता है।

विपक्षी नेता, जैसे डी. राजा, ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह विदेशी सरकारों को ऑपरेशन सिंदूर के बारे में जानकारी दे रही है, लेकिन भारतीय संसद और जनता को अंधेरे में रखा गया है। कोई विशेष संसद सत्र नहीं बुलाया गया, और न ही जनता को बताया गया कि इन यात्राओं का उद्देश्य क्या है। यदि सरकार आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता दिखाना चाहती थी, तो क्या यह काम भारत में तिरंगा रैलियों या जय हिंद रैलियों के ज़रिए नहीं हो सकता था?

अन्य देशों से तुलना

यदि हम इतिहास के पन्नों को पलटें, तो क्या इज़राइल ने फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों में अपनी सैन्य कार्रवाइयों की सफलता का ढिंढोरा पीटने के लिए दुनिया भर में प्रतिनिधिमंडल भेजे? इज़राइल ने, जिसने ईरान के खिलाफ कई गुप्त हमले किए, कभी वैश्विक मंच पर अपनी पीठ थपथपाने के लिए ऐसी नौटंकी नहीं की। इसी तरह, रूस ने यूक्रेन पर हमले के बाद अपनी “सफलता” का जश्न मनाने के लिए कोई वैश्विक यात्राएँ नहीं कीं। अमेरिका ने 2011 में ओसामा बिन लादेन की हत्या के बाद भी दुनिया भर में जाकर क्रेडिट लेने का प्रयास नहीं किया। फिर भारत क्यों इस तरह की नाटकीयता दिखा रहा है? क्या यह केवल घरेलू राजनीति में लाभ उठाने की कोशिश है?  X पर कुछ पोस्ट्स (@BJP4India, 12 मई 2025) में ऑपरेशन सिंदूर को भारत की सैन्य और रणनीतिक शक्ति का प्रतीक बताया गया है। लेकिन अन्य पोस्ट्स (@epanchjanya, 9 मई 2025) में इसे “राष्ट्र के सम्मान” और “मानवता के पक्ष” में एक कदम बताया गया, जो भावनात्मक अपील तो करता है, लेकिन तथ्यों की कमी को उजागर करता है। क्या यह सब जनता का ध्यान पहलगाम हमले की नाकामी और ऑपरेशन सिंदूर की अस्पष्टता से हटाने की कोशिश है?

विदेशी यात्राओं में असफलताएँ

इन प्रतिनिधिमंडलों की यात्राएँ भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहीं। उदाहरण के लिए, एक अन्य प्रतिनिधिमंडल के ऑस्ट्रेलिया पहुँचने से पहले, सिडनी हवाई अड्डे पर एक ड्रोन हमला हुआ, जिसे यूक्रेनी समूहों से जोड़ा गया। हालांकि इस घटना का भारत से सीधा संबंध नहीं था, लेकिन यह वैश्विक सुरक्षा की जटिलता को दर्शाता है। क्या भारत इन यात्राओं के ज़रिए वैश्विक मंच पर अपनी छवि मजबूत कर रहा है, या अनावश्यक जोखिम उठा रहा है?

मूर्खता या रणनीति?

ये वैश्विक यात्राएँ, जिनमें करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, न केवल जनता के पैसे की बर्बादी प्रतीत होती हैं, बल्कि सरकार की प्राथमिकताओं पर भी सवाल उठाती हैं। यदि भारत आतंकवाद के खिलाफ अपनी प्रतिबद्धता दिखाना चाहता था, तो यह काम घरेलू मंचों, जैसे संसद सत्र या जनसभाओं के ज़रिए, हो सकता था। इसके बजाय, सरकार ने एक भव्य कूटनीतिक अभियान शुरू किया, जो कई सवालों को जन्म देता है। पहलगाम हमले के आतंकवादियों को क्यों नहीं पकड़ा गया? ऑपरेशन सिंदूर के ठोस परिणाम क्या हैं? युद्धविराम की शर्तें क्या थीं? इन सवालों के जवाब देने के बजाय, सरकार वैश्विक मंच पर अपनी पीठ थपथपाने में व्यस्त है।यह सब देखकर लगता है कि ये यात्राएँ जनता का ध्यान सरकार की कमियों से हटाने और घरेलू राजनीति में लाभ उठाने की कोशिश हैं। लेकिन इसका खामियाज़ा जनता को भुगतना पड़ रहा है। पेट्रोल, डीजल, गैस सिलेंडर, और चावल की कीमतों में वृद्धि, और बढ़ते करों का बोझ, इन यात्राओं के प्रत्यक्ष परिणाम हो सकते हैं। भारत को आतंकवाद के खिलाफ अपनी लड़ाई को मजबूत करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए, न कि वैश्विक मंच पर दिखावे की राजनीति करनी चाहिए। यह न केवल मूर्खता है, बल्कि जनता के साथ विश्वासघात भी है।

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