ज़की भारतीय
लखनऊ जो नवाबों की नगरी कहलाती है, आज गंदगी और अतिक्रमण की चपेट में है। नगर निगम द्वारा चलाए जा रहे सफाई अभियान और अतिक्रमण हटाने की कार्रवाइयाँ कागज़ों पर तो प्रभावी दिखती हैं, लेकिन हकीकत में ये खोखली और दिखावटी साबित हो रही हैं। शहर के अधिकतर मोहल्लों की गलियों में कूड़े के ढेर लगे हुए हैं। कूड़ा फेंकने को लेकर पड़ोसियों में झगड़े हो रहे हैं, और थानों में दर्ज होने वाले अधिकतर मामले कूड़ा और नाली की गंदगी को लेकर हैं। यह स्थिति न केवल जनता के लिए परेशानी का सबब है, बल्कि शहर की छवि को भी धूमिल कर रही है।


घर-घर कूड़ा उठाने का नाकाम अभियान

नगर निगम ने कुछ समय पहले घर-घर कूड़ा उठाने का अभियान शुरू किया था, जिसे बड़े जोर-शोर से प्रचारित किया गया। लेकिन यह अभियान अब भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है। सफाई कर्मचारी तीन-चार दिन तक घरों से कूड़ा नहीं उठाते। इससे लोग मजबूर होकर या तो अपने घर में कई दिनों का कूड़ा इकट्ठा करते हैं, जिससे बदबू और गंदगी फैलती है, या फिर सड़क पर किसी के घर के बाहर कूड़ा फेंक देते हैं। जब किसी के घर के बाहर कूड़ा दिखता है, तो वह नाराज़ हो जाता है, और यहीं से झगड़े शुरू होते हैं। हर व्यक्ति अपने घर के बाहर का हिस्सा साफ रखना चाहता है, लेकिन दूसरों के हिस्से को गंदा करने में हिचकता नहीं। यह स्थिति शहर के हर मोहल्ले में आम हो चुकी है।
सफाई कर्मचारियों की लापरवाही और भ्रष्टाचार
सफाई कर्मचारियों की लापरवाही इस समस्या की सबसे बड़ी जड़ है। पुराने लखनऊ के इलाकों जैसे कश्मीरी मोहल्ला, मैदान एल एच खान, रुस्तम नगर, हसन पुरिया, मंसूरनगर, दरगाह हज़रत अब्बास क्षेत्र, न्यू नजफ भोला नाथ कुआं, झवाई टोला सहित कई थाना क्षेत्रों में गंदगी का अंबार लगा हुआ है। यहाँ तक कि सभासद बाबू हकीम, जो सफाई के लिए मशहूर हैं, उनके क्षेत्र में भी हालात सुधर नहीं रहे। अधिकतर सफाई कर्मचारी अपनी ड्यूटी पर नहीं आते। वे घर पर बैठकर तनख्वाह लेते हैं और अपनी जगह 4,000-5,000 रुपये महीने पर दूसरों को काम पर लगा देते हैं।
ये किराए के लोग न तो ठीक से सफाई करते हैं, न ही नालियों की गंदगी हटाते हैं।ऐसे कर्मचारी हर तीन-चार दिन बाद ही सफाई करने गलियों में आते हैं,हल्के हाथ से झाड़ू मारकर चले जाते हैं। कूड़ा अक्सर लोगों के घरों के बाहर ही इकट्ठा कर दिया जाता है, जिससे वह घर कूड़ाघर बन जाता है। घर के मालिक को इसे हटाने के लिए हजार कोशिशें करनी पड़ती हैं, लेकिन समस्या जस की तस बनी रहती है। यह स्थिति न केवल पुराने लखनऊ में, बल्कि शहर के अन्य हिस्सों में भी देखी जा सकती है। लोग कहते हैं कि इन कर्मचारियों को 4,000-5,000 रुपये में काम करने वाले रोज़ झाड़ू क्यों लगाएँगे?
वे दो-तीन दिन बाद आते हैं, और महीनों तक नालियाँ साफ नहीं होतीं।
अधिकारियों और सफाई कर्मचारियों मिली भगत
नगर निगम के अधिकारी और सभासद इस समस्या से पूरी तरह वाकिफ हैं, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाते। सफाई कर्मचारी अपनी तनख्वाह का कुछ हिस्सा रिश्वत के रूप में अपने अधिकारी की सेवा में हाज़िर कर देते हैं, जिससे उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं होती। सभासद भी सिर्फ़ यह सोचते हैं कि उनके क्षेत्र में सफाई का दिखावा बना रहे। कुछ सभासद, जो सफाई पर ध्यान देते हैं, उनकी कोशिशें सराहनीय हैं, लेकिन उनकी संख्या बेहद कम है।जब लोग शिकायत करते हैं, तो नगर निगम दिखावे के लिए सक्रियता दिखाता है। जाँच की बात होती है, कर्मचारियों को डाँट-फटकार लगाई जाती है, लेकिन यह सब कुछ दिनों का नाटक साबित होता है। इसके बाद फिर वही गंदगी और लापरवाही शुरू हो जाती है। लोग कहते हैं, “शिकायत करें तो कौन सुनेगा?” यह निराशा जनता के बीच गहरी हो चुकी है।
अतिक्रमण की बार-बार वापसी
सफाई के साथ-साथ अतिक्रमण की समस्या भी लखनऊ के लिए सिरदर्द बनी हुई है। नगर निगम साल में दो-तीन बार बड़े-बड़े अभियान चलाता है। नखास, विक्टोरिया स्ट्रीट, टूरियागंज, नादान महल रोड, मेडिकल कॉलेज के पास मंडी, और चिड़ियाघर (सुन्नी इंटर कॉलेज) के बाहर की दुकानों को तोड़ा जाता है। लाखों रुपये खर्च करके बुलडोजर चलाए जाते हैं, दीवारें गिराई जाती हैं, और सड़कें साफ करने का दावा किया जाता है। लेकिन यह सब बेकार साबित होता है।अभियान खत्म होते ही कुछ ही दिनों में अतिक्रमण फिर से पनप जाता है।
नखास, टूरियागंज, और विक्टोरिया स्ट्रीट जैसे व्यस्त बाजारों में दुकानें फिर से बन जाती हैं। सुन्नी इंटर कालेज के निकट , खैरात खाने के बाहर, दुकानें गिराई गई थीं, लेकिन अब वे फिर से उसी तरह खड़ी हैं। छोटा इमामबाड़ा और हुसैनाबाद के पास भी यही हाल है। हुसैनाबाद ट्रस्ट के सचिव /एडीएम ने मेरे एन एस लाइव न्यूज़ यूट्यूब चैनल पर चली अतिक्रमण की खबर का हवाला देते हुए नगर निगम को कार्रवाई किए जाने के बाबत पत्र भेजा था। पत्र के आधार पर नगर निगम ने कार्रवाई भी की लेकिन अगले ही दिन कार्रवाई बेअसर हो गई। मेरे द्वारा खबर से पहले दुकानदार न तो नगर निगम को कोई रिश्वत देते थे और न ही हुसैनाबाद ट्रस्ट के कर्मचारियों को कोई रिश्वत की दक्षिणा चढ़ाई जाती थी, लेकिन मेरी खबर के बाद से जाम तो फिर वैसे ही लगने लगा लेकिन दोनों विभागों के कुछ कर्मचारियों की लॉटरी निकल आई। आज भी इन इलाकों में अतिक्रमण साफ देखा जा सकता है। नगर निगम की लापरवाही का यह आलम है कि कोई भी कार्रवाई स्थायी नहीं हो पाती। चाहे वह सफाई हो या अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई, सब कुछ, कुछ दिनों का दिखावा बनकर रह जाता है। लोग कहते हैं कि नगर निगम के अधिकारी और कर्मचारी सिर्फ़ अपनी जेब भरने में लगे हैं। जनता की परेशानियों से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। जब लोग इन समस्याओं को लेकर सवाल उठाते हैं, तो उन्हें सिर्फ़ आश्वासन मिलते हैं, लेकिन कोई ठोस समाधान नहीं।
जनता की परेशानी और निराशा
लखनऊ की जनता इन समस्याओं से तंग आ चुकी है। कूड़े के ढेर, गंदी नालियाँ, और सड़कों पर अतिक्रमण ने उनका जीना मुहाल कर दिया है। लोग चाहते हैं कि नगर निगम अपनी जिम्मेदारी समझे और स्थायी समाधान निकाले। लेकिन बार-बार की नाकामी ने उनकी उम्मीदें तोड़ देती हैं। लोग कहते हैं कि अगर नगर निगम को जनता की फिक्र होती, तो हालात इतने बदतर न होते।न
लखनऊ नगर निगम की सफाई और अतिक्रमण हटाने की कार्रवाइयाँ सिर्फ़ कागज़ी और दिखावटी हैं। न कूड़ा प्रबंधन में सुधार हो रहा है, न ही अतिक्रमण पर लगाम लग रही है। कर्मचारियों का भ्रष्टाचार, अधिकारियों की चुप्पी, और सभासदों की लापरवाही ने जनता को परेशानी में डाल रखा है। नगर निगम को चाहिए कि वह अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करे, कर्मचारियों पर सख्ती करे, और ऐसी व्यवस्था बनाए कि सफाई और अतिक्रमण की समस्या जड़ से खत्म हो। लखनऊ की जनता को साफ-सुथरा माहौल मिलना उनका हक है, और नगर निगम को यह हक देना होगा।



