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मोहम्मद अली शाह की वक्फ मंशा पर उठे सवाल, हुसैनाबाद ट्रस्ट के वर्तमान कार्यों पर शिया समुदाय में नाराज़गी
ज़की भारतीय ✍🏼
मोहम्मद अली शाह द्वारा स्थापित हुसैनाबाद वक्फ और उससे जुड़ी संपत्तियों को लेकर एक बार फिर विवाद गहराता जा रहा है। रूमी गेट और हुसैनाबाद क्षेत्र में पार्किंग, कॉरिडोर और अन्य निर्माण कार्यों की योजनाओं के बीच शिया उलेमा, अधिवक्ताओं और सामाजिक संगठनों ने सवाल उठाया है कि क्या वर्तमान प्रशासन वाकिफ़ यानी वक्फ स्थापित करने वाले नवाब की मूल मंशा के अनुसार कार्य कर रहा है या नहीं ऐतिहासिक अभिलेखों और शोध पत्रों के अनुसार हुसैनाबाद एंड एलाइड ट्रस्ट की बुनियाद नवाब मोहम्मद अली शाह ने वर्ष 1838-39 में रखी थी। उस समय उन्होंने लगभग 12 लाख रुपये ईस्ट इंडिया कंपनी के खजाने में जमा कर एक स्थायी ट्रस्ट व्यवस्था बनाया था, जिससे मिलने वाले ब्याज और आमदनी का उपयोग धार्मिक, सामाजिक और जनकल्याण के कार्यों में किया जाना तय किया गया था।

इतिहासकारों और वक्फ मामलों के जानकारों के अनुसार मोहम्मद अली शाह की मंशा केवल इमारतें खड़ी करना नहीं थी, बल्कि शिया समाज की धार्मिक और सामाजिक जरूरतों को स्थायी रूप से सहारा देना था। उनके द्वारा बनाए गए इमामबाड़ों, अजाखानों और धार्मिक स्थलों की देखरेख, मुहर्रम की अजादारी, जरूरतमंद शिया मोमिनों की सहायता, गरीबों को राहत, लड़कियों की शादी, जियारत और धार्मिक शिक्षा जैसे कार्यों को प्राथमिक उद्देश्य माना गया था। यही कारण था कि उन्होंने ट्रस्ट की आय को एक नियमित धार्मिक-सामाजिक व्यवस्था से जोड़ा था। जानकार बताते हैं कि अवध के शासकों में यह परंपरा रही कि जो धार्मिक और ऐतिहासिक इमारतें बनाई जाएं, उनके रखरखाव और धार्मिक उपयोग के लिए स्थायी आर्थिक प्रबंध भी छोड़ा जाए। मोहम्मद अली शाह ने भी इसी नीति के तहत हुसैनाबाद वक्फ की व्यवस्था की थी। बाद में अंग्रेजी शासन और स्वतंत्रता के बाद प्रशासनिक नियंत्रण बदलते रहे, लेकिन वक्फ की मूल प्रकृति धार्मिक न्यास की ही बनी रही।

अब शिया समुदाय के लोगों का आरोप है कि वर्तमान समय में ट्रस्ट की संपत्तियों के साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा है मानो वह सामान्य सरकारी भूमि हो, जबकि वक्फ कानून के अनुसार यह संपत्ति वाकिफ़ की शर्तों और मंशा से बंधी होती है। उनका कहना है कि जिलाधिकारी केवल प्रशासकीय “केयरटेकर” या निगरानीकर्ता की भूमिका में होते हैं, मालिक नहीं। इसलिए किसी भी निर्माण, व्यावसायिक उपयोग, पार्किंग या स्थायी ढांचे का निर्णय वक्फ की मूल शर्तों के अनुरूप होना चाहिए। समुदाय के कई लोगों ने यह भी कहा कि यदि मोहम्मद अली शाह की वसीयत और वक्फ अनुबंध की मूल भावना को नज़रअंदाज़ कर प्रशासनिक परियोजनाएं चलाई जाएंगी तो यह वाकिफ़ की मंशा के खिलाफ माना जाएगा। शिया उलेमा और अधिवक्ताओं से मांग की जा रही है कि वह अदालत में रिट दाखिल कर यह स्पष्ट करवाएं कि हुसैनाबाद ट्रस्ट की संपत्तियों का उपयोग केवल उन्हीं उद्देश्यों के लिए हो सकता है जिनके लिए यह वक्फ स्थापित किया गया था। विरोध करने वालों का कहना है कि हुसैनाबाद की जमीनें केवल ऐतिहासिक धरोहर नहीं बल्कि शिया समाज की धार्मिक अमानत हैं, इसलिए किसी भी विकास योजना से पहले वक्फ दस्तावेज, ट्रस्ट डीड और मोहम्मद अली शाह की मूल मंशा को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
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