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भारत में अमरीकी हमले के दौरान ईरान के 180 नाविकों में से 87 की मौत और 32 गंभीर रूप से घायल,क्या भारत देगा अमरीका को जवाब ?

ज़की भारतीय ✍🏼

अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरानी फ्रिगेट IRIS Dena को हिंद महासागर में श्रीलंका के दक्षिणी तट के निकट टॉरपीडो से डुबो दिया, भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और क्षेत्रीय गरिमा पर गहरा सवाल उठाती है। 4 मार्च 2026 को हुई इस घटना में जहाज पर सवार लगभग 180 नाविकों में से 87 की मौत हो चुकी है, 32 गंभीर रूप से घायल बचाए गए हैं, जबकि बाकी लापता बताए जा रहे हैं। यह जहाज भारत द्वारा आयोजित बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास MILAN 2026 और इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू से लौट रहा था, जो विशाखापट्टनम में संपन्न हुआ था। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने पेंटागन की प्रेस कॉन्फ्रेंस में हमले की पुष्टि की और इसे “quiet death” कहकर WWII के बाद टॉरपीडो से दुश्मन जहाज डुबोने का पहला मामला बताया। पेंटागन ने हमले का वीडियो भी जारी किया।

हिंद महासागर भारत का प्राकृतिक प्रभाव क्षेत्र है। यह हमारा समुद्री पिछवाड़ा है, जहां हमारी व्यापारिक लाइनें, ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक हित जुड़े हैं। श्रीलंका के तट से महज कुछ दूरी पर, अंतरराष्ट्रीय जल में ही सही, लेकिन यह भारत के निकटतम क्षेत्र में हुआ हमला है। IRIS Dena भारत के निमंत्रण पर आया था। भारत ने इसे अभ्यास के लिए बुलाया, सुरक्षा प्रदान की और सहयोग किया। लौटते समय अमेरिका ने बिना किसी पूर्व चेतावनी के टॉरपीडो मारकर इसे डुबो दिया। यह न केवल ईरान के खिलाफ युद्ध का विस्तार है, बल्कि भारत की मेहमाननवाजी और क्षेत्रीय जिम्मेदारी का सीधा अपमान है।
अंतरराष्ट्रीय कानून की कई धाराएं इस हमले के खिलाफ जाती हैं। संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS 1982) के अनुच्छेद 87 और 88 के तहत उच्च समुद्रों में शांतिपूर्ण नेविगेशन की स्वतंत्रता है। यह जहाज युद्ध में सक्रिय नहीं था, बल्कि प्रशिक्षण और सहयोग के लिए भारत आया था। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) में बल प्रयोग पर प्रतिबंध है, सिवाय आत्मरक्षा के। अमेरिका ने इसे ईरान के खिलाफ युद्ध का हिस्सा बताया, लेकिन जहाज भारत के मेहमान के रूप में शांतिपूर्ण रूप से जा रहा था। जिनेवा कन्वेंशन्स और उनके अतिरिक्त प्रोटोकॉल में भेदभाव, आनुपातिकता और आवश्यकता के सिद्धांत टूटे हैं। 180 नाविकों पर अचानक टॉरपीडो हमला अनुपातहीन और मानवता के खिलाफ है।
भारत की जिम्मेदारी इसलिए बनती है क्योंकि हमने इस जहाज को बुलाया था। MILAN जैसे अभ्यासों में विदेशी नौसेनाओं को आमंत्रित करना हमारी कूटनीति का हिस्सा है, लेकिन सुरक्षा गारंटी भी हमारी जिम्मेदारी है। अभ्यास समाप्त होने के बाद भी लौटते जहाज की सुरक्षा सुनिश्चित करना भारत का नैतिक और रणनीतिक दायित्व था। हिंद महासागर में अमेरिका ने बिना भारत की सहमति के युद्ध फैलाया, जो हमारी संप्रभुता पर चोट है। यदि भारत चुप रहा, तो ईरान भारत को जिम्मेदार ठहरा सकता है। ईरान कह सकता है कि भारत ने बुलाया, सुरक्षा नहीं दी और अमेरिका को हमारे क्षेत्र में हमला करने दिया। इससे भारत-ईरान संबंध, जैसे चाबहार पोर्ट परियोजना, खतरे में पड़ सकते हैं।
यह घटना विश्व युद्ध के खतरे को भी बढ़ाती है। युद्ध अब मध्य पूर्व से हिंद महासागर तक फैल चुका है। यदि भारत अमेरिका के खिलाफ मजबूत रुख नहीं अपनाता, तो ईरान के सहयोगी जैसे रूस और चीन दबाव डाल सकते हैं। इससे क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ेगी और भारत फंस सकता है। भारतीय जनता में गहरा रोष है। सोशल मीडिया और सार्वजनिक चर्चाओं में लोग पूछ रहे हैं—हमारा हिंद महासागर है, अमेरिका यहां हमला करे और हम चुप रहें? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री और पूरी सरकार को जवाब देना होगा। मेहमान की हत्या हुई, हमारी गरिमा पर हमला हुआ—यह चुप्पी शोभा नहीं देती।
भारत को तत्काल कदम उठाने चाहिए। अमेरिका को कड़ा कूटनीतिक विरोध दर्ज कराना चाहिए। ईरान को गहरा शोक संवेदना व्यक्त करनी चाहिए और पीड़ित परिवारों की मदद का वादा करना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्वतंत्र जांच की मांग करनी चाहिए, जहां UNCLOS और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के उल्लंघन पर जोर दिया जाए। हिंद महासागर में भारतीय नौसेना की पैट्रोलिंग और निगरानी बढ़ानी चाहिए। भविष्य के अभ्यासों में सुरक्षा गारंटी पर सख्त नियम बनाए जाएं। अमेरिका से दोस्ती बनाए रखते हुए स्वतंत्र रुख अपनाना होगा—ईरान, रूस जैसे भागीदारों को नहीं खोना है।
यह सिर्फ एक जहाज की घटना नहीं है। यह भारत की क्षेत्रीय शक्ति, संप्रभुता और इज्जत का सवाल है। हिंद महासागर भारत का है। अमेरिका ने यहां हमला कर चुनौती दी है। मोदी सरकार को जागना होगा, मजबूत आवाज उठानी होगी। चुप्पी से युद्ध की आग और फैलेगी, जबकि कार्रवाई से शांति और सम्मान बचेगा। भारत मजबूत बने—तभी दुनिया सम्मान करेगी।

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