ज़की भारतीय
लखनऊ,21 सितंबर। बारह वफात के जुलूस के दिन कानपुर के रावतपुर क्षेत्र में एक विवादास्पद घटना ने देशभर में सुर्खियां बटोरी। यह मामला बारावफात जुलूस के दौरान शुरू हुआ, जब कुछ लोगों ने “आई लव मोहम्मद” लिखा बैनर एक पंडाल में लगाया । जिसके विरुद्ध कानपुर के कुछ कट्टरपंथी हिंदू संगठनों ने इसको नया रिवाज बताते हुए पुलिस को एक तहरीर देकर कार्रवाई करने की मांग की। पुलिस ने तहरीर के बाद यह सोचना बेहतर नहीं समझा की वह आई लव मोहम्मद लिखने पर किस धारा में मुकदमा करने जा रही है।शायद इसीलिए उन्होंने इस मामले की गंभीरता को ना समझते हुए मुकदमा पंजीकृत कर लिया।
स्थानीय पुलिस ने इसे नई प्रथा और सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश मानते हुए 25 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। इस घटना के बाद से पूरे भारत में मुस्लिम समुदाय के लोग सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक “आई लव मोहम्मद” के समर्थन में उतर आए हैं। प्रदर्शनकारियों ने शर्ट, झंडे, टोपी और बैनर के जरिए अपनी भावनाएं व्यक्त कीं, जबकि समाजवादी पार्टी की महिला नेताओं ने भी इस मुद्दे पर शासन-प्रशासन से कार्रवाई वापस लेने की मांग की।
घटना का आरंभ: कानपुर में विवाद
कानपुर के रावतपुर थाना क्षेत्र में 4 सितंबर 2025 को बारावफात जुलूस के दौरान एक टेंट के सामने “आई लव मोहम्मद” लिखा बैनर लगाया गया। इस बैनर को लेकर हिंदू संगठनों और स्थानीय लोगों ने आपत्ति जताई, जिससे तनाव उत्पन्न हो गया। पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए हस्तक्षेप किया और बैनर हटवाया। हालांकि, बाद में पुलिस ने दावा किया कि जुलूस के दौरान बिना अनुमति के गेट लगाने और भंडारे के बैनर को फाड़ने की घटना के आधार पर 25 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया, जिसमें 8 नामजद और 15 अज्ञात शामिल थे। पुलिस का कहना था कि “आई लव मोहम्मद” का नारा सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ने की कोशिश थी और इसे नई प्रथा के रूप में लागू करने का प्रयास था।
इस कार्रवाई के विरोध में मुस्लिम समुदाय ने शारदा नगर में जुलूस निकाला और एफआईआर रद्द करने की मांग की। प्रदर्शनकारियों का तर्क था कि “आई लव मोहम्मद” पैगंबर मोहम्मद के प्रति सम्मान और प्रेम की अभिव्यक्ति है, जो संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत आता है। दरगाह आला हजरत के संगठन जमात रजा-ए-मुस्तफा और वर्ल्ड सूफी फोरम के नेताओं ने भी पुलिस की कार्रवाई को अनुचित करार दिया।
देशव्यापी प्रदर्शन
कानपुर की इस घटना ने पूरे भारत में तूल पकड़ लिया। मुस्लिम समुदाय के लोग “आई लव मोहम्मद” लिखी शर्ट, झंडे और टोपी पहनकर सड़कों पर उतरे। सोशल मीडिया पर #ILoveMohammad ट्रेंड करने लगा, जहां हजारों लोग अपनी सहानुभूति जता रहे हैं। कई शहरों में विशाल प्रदर्शन हुए, जहां लोगों ने पुलिस कार्रवाई के खिलाफ नारे लगाए और शासन से माफी मांगने की मांग की। इस आंदोलन में महिलाएं और युवा खास तौर पर सक्रिय रहे, जिन्होंने अपने धार्मिक प्रेम को व्यक्त करने की आजादी की बात कही।
समाजवादी पार्टी की भूमिका
समाजवादी पार्टी (सपा) की महिला नेताओं ने भी इस मुद्दे पर सक्रियता दिखाई। लखनऊ में सपा की महिला सभा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुमैया राना की अगुवाई में महिलाओं ने विधानभवन के सामने प्रदर्शन किया। उन्होंने “आई लव मोहम्मद” लिखी तख्तियां लेकर नारेबाजी की और एफआईआर वापस लेने की मांग की। सुमैया राना ने कहा कि कानपुर में मुस्लिम समुदाय के खिलाफ दर्ज मुकदमा बेहद अफसोसनाक है और यह लोकतंत्र पर सवाल उठाता है। प्रदर्शन के दौरान पुलिस और महिलाओं के बीच धक्का-मुक्की हुई, जिसके बाद पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेकर इको गार्डन ले गई।
तौहीद सिद्दीकी ने दिया लखनऊ में ज्ञापन
21 सितंबर 2025 को लखनऊ में एक और महत्वपूर्ण घटना हुई। तौहीद सिद्दीकी नाम के एक व्यक्ति ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर की, जिसमें उन्होंने कानपुर के रावतपुर थाने में दर्ज मामले का उल्लेख किया। पोस्ट में उन्होंने लिखा, “आज दिनांक 21/9/2025 को *तहफ्फुज ए अक़ीदत सोसाइटी के अधयक्ष मौ. तौहीद नजमी के नेतृत्व में I Love Mohammad मामले में कानपुर के रावतपुर थाने में हुई F…”। इस पोस्ट के साथ एक तस्वीर भी थी, जिसमें एक पुलिस अधिकारी तौहीद नजमी को कागज दिखाते हुए नजर आ रहे हैं, जबकि अन्य लोग “आई लव मोहम्मद” लिखी शर्ट पहने खड़े हैं।
लखनऊ में प्रदर्शनकारियों ने रावतपुर थाने में दर्ज मुकदमे के खिलाफ ज्ञापन सौंपा और मांग की कि “आई लव मोहम्मद” को लेकर किसी भी व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज न की जाए। उनका कहना था कि यह धार्मिक प्रेम की अभिव्यक्ति है और इसे अपराध नहीं माना जाना चाहिए।
कानूनी और सामाजिक पहलू
इस विवाद ने कानूनी और सामाजिक बहस को जन्म दिया है। पुलिस का तर्क है कि “आई लव मोहम्मद” जैसे नारे, यदि बिना अनुमति के सार्वजनिक स्थानों पर लगाए जाएं और सामाजिक तनाव पैदा करें, तो यह भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A (साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने) और धारा 505 (सार्वजनिक शांति भंग करने) के तहत अपराध हो सकता है। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारी संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) का हवाला दे रहे हैं।
सवाल यह उठता है कि क्या “आई लव मोहम्मद” कहना अपराध है? अगर कोई “आई लव राम”, “आई लव सलमान”, “आई लव अक्षय कुमार” या “आई लव मदर/फादर” कहता है, तो क्या यह गलत माना जाएगा? एक मां अपने बेटे से प्यार जताने के लिए ऐसा कह सकती है, तो फिर धार्मिक प्रेम व्यक्त करना क्यों विवादास्पद हो रहा है? कानपुर पुलिस का दावा है कि मुकदमा बैनर फाड़ने और गेट लगाने जैसे कृत्यों के लिए है, न कि नारे के लिए, लेकिन प्रदर्शनकारी इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला मान रहे हैं।
यह मामला अभी सुलझा नहीं है और देशभर में इसके खिलाफ प्रदर्शन जारी हैं। शासन-प्रशासन पर दबाव बढ़ रहा है कि वे मुकदमे वापस लें और “आई लव मोहम्मद” को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में मानें। वहीं, पुलिस का कहना है कि वे कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई कर रही है। यह विवाद न केवल कानूनी बल्कि सामाजिक सौहार्द को भी प्रभावित कर रहा है।
अंत में, यह देखना होगा कि क्या “आई लव मोहम्मद” जैसे नारे भविष्य में स्वीकार्य होंगे या इन्हें नियंत्रित करने के लिए सख्त नियम बनाए जाएंगे। यह भी विचारणीय है कि क्या व्यक्तिगत प्रेम और धार्मिक प्रेम के बीच की रेखा को समझते हुए समाज एक संतुलन बना पाएगा। वर्तमान में, यह मुद्दा भारत के सामाजिक ताने-बाने की परीक्षा बन गया है, और इसका हल आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।



