HomeCITY15 और 16 जून को होगा लखनऊ में जश्न-ए-ईद-ए-ग़दीर का आयोजन

15 और 16 जून को होगा लखनऊ में जश्न-ए-ईद-ए-ग़दीर का आयोजन

 

लखनऊ, 7 जून । रसूलुल्लाह (स.अ.व.व ) द्वारा हजरत अली (अ.स.) को अपना जानशीन घोषित किए जाने की खुशी में लखनऊ में जश्न-ए-ईद-ए- ग़दीर का भव्य आयोजन 15 जून मुताबिक 18 जिलहिज्जा और 16 जून (सोमवार ) मुताबिक 19 जिलहिज्जा को लखनऊ के रौज़ा ए कlज़मैन में 8 बजे शब में होगा।

16 जून को होने वाले जश्ने ईद ए ग़दीर का आगाज़ तिलावते हदीस ए किसा से मौलाना अतहर अब्बास साहब करेंगे। हदीस ए किसा के बाद मौलाना इब्तिदाई तक़रीर भी करेंगे।
मौलाना की तकरीर के बाद शोअराए कराम बारगाहे मौला ए ग़दीर में मंज़ूम नज़रानए अक़ीदत पेश करेंगे।
जिसके बाद महफिल को मौलाना अली मुतक्की ज़ैदी साहब खिताब फरमाएंगे। महफ़िल के बाद बजरिये क़ुरआनदाज़ी मोमिनीन के दरमियान तबर्रुकात तक़सीम किए जाएंगे।ये इत्तिला शायर ए अहलेबैत खुशनूद मुस्तफा साहब ने दी है।

ईद-ए-घदीर और गदीर-ए-खुम का महत्व

ईद-ए-घदीर को इस्लाम में सबसे बड़ी ईद माना जाता है। यह वह पवित्र दिन है जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने हज के दौरान गदीर-ए-खुम के मैदान में हजरत अली (अ.स.) को अपना जानशीन घोषित किया। हज से लौटते समय रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने आगे निकल गए लोगों का इंतजार किया और पीछे रह गए लोगों के आने की प्रतीक्षा की। गदीर-ए-खुम के मैदान में ऊंट के कजावों से मिम्बर बनाया गया और रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने हजरत अली (अ.स.) का हाथ उठाकर फरमाया, “मन कुन्तु मौला फहाजा अली-युन मौला” यानी “जिसका मैं मौला, उसका अली मौला।”इस ऐलान के बाद कुरआन में आयत नाजिल हुई, “अल-यौम अकमल्तु लकुम दीनकुम” अर्थात “आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मुकम्मल कर दिया।” यही कारण है कि इस ईद को ईद-ए- अकबर कहा जाता है, क्योंकि यह दिन इस्लाम के पूर्ण होने का प्रतीक है। हजरत अली (अ.स.) की विलायत को इस दिन विशेष महत्व दिया गया, जिसे इस्लाम में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है।

महफिल का आयोजन और उत्साह

लखनऊ में होने वाली इन महफिल में शायरों द्वारा हजरत अली (अ.स.) की शान में नजराने-ए-अकीदत पेश किया जाएंगा। यह आयोजन न केवल धार्मिक उत्साह को बढ़ाएगा, बल्कि हजरत अली (अ.स.) के जीवन और उनके योगदान को याद करने का एक अवसर भी प्रदान करेगा। शहर के लोग इस जश्न में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने की तैयारी कर रहे हैं।यह आयोजन लखनऊ की सांस्कृतिक और धार्मिक एकता का प्रतीक होगा, जिसमें सभी शिया समुदाय के लोग शामिल होकर इस पवित्र अवसर को मनाएंगे।

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