ज़की भारतीय
आतंकवादियों द्वारा जम्मू कश्मीर के पहलगांव में नाम पूछ कर हत्या करने वाली ये घटना नई नहीं है । दरअस्ल ये सिलसिला भारत से ही शुरू हुआ था । शायद कट्टरपंथी संगठन इस बात को या तो भूल गए और या फिर उसको याद करना नहीं चाहते।
आज वह पहलगांव के इस मुद्दे को लेकर देश भर में अपनी गुंडई द्वारा सीधे-साधे मुसलमान को डराने का नाकाम प्रयास कर रहे हैं । जबकि वह बहुत जल्दी भूल गए कि अगर पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के आतंकवादियों ने भारत के मजलूम लोगों को मौत के घाट उतारा तो वही भारत के मुसलमान ने ही उनकी मदद की , उनको सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया और कश्मीर के ही नौजवानों ने अपनी पीठ पर लादकर लोगों को अपने घरों में पनाह दी, खाना दिया,पानी दिया और उनको आश्वासन दिया कि वह बिल्कुल मत घबराए हम उनके साथ हैं । इस तरह की अनगिनत पोस्टें और रील सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है । लेकिन इसके बाद भी इन कट्टरपंथी हिंदू संगठनों की अक्ल पर पत्थर पड़े हैं और वह निरंतर जहां मुसलमान के विरुद्ध आपत्तिजनक बयान देते हुए नजर आ रहे हैं वहीं कुछ दुकानों को तोड़ते फोड़ते हुए और उनसे पाकिस्तान चले जाने को कहते हुए नजर आ रहे हैं।
मैं पाठकों को याद दिलाना चाहता हूं कि 31 जुलाई 2023 को, मुंबई से जयपुर जा रही, “जयपुर एक्सप्रेस ट्रेन” में एक रेलवे सुरक्षा बल (RPF) के कांस्टेबल चेतन सिंह ने एक भयावह घटना को अंजाम दिया था। उसने ट्रेन में यात्रियों से उनके नाम और धर्म पूछे और चार लोगों—तीन मुसलमान यात्रियों (अब्दुल कादर भाई, आसिफ, और सैफी) और एक RPF सहकर्मी (अमय अचर्य)—को गोली मार दी थी। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया और धार्मिक घृणा से प्रेरित हिंसा का एक नया अध्याय खोल दिया। चेतन सिंह ने कथित तौर पर गोली चलाने से पहले कहा, “पाकिस्तान चले जाओ, तुम्हारा भारत में कोई काम नहीं,” जिससे यह स्पष्ट हुआ कि उसका इरादा धार्मिक आधार पर निशाना साधना था।इस घटना ने न केवल साम्प्रदायिक तनाव को बढ़ाया, बल्कि यह सवाल भी उठाया कि एक वर्दीधारी पुलिसकर्मी, जिसका कर्तव्य लोगों की सुरक्षा करना है, इतने जघन्य अपराध को कैसे अंजाम दे सकता है। इस घटना की तुलना हाल ही में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले से की जा रही है, जहां आतंकियों ने पर्यटकों से उनके नाम और धर्म पूछकर, विशेष रूप से हिंदुओं को निशाना बनाया। यह समानता दर्शाती है कि धार्मिक आधार पर हिंसा का यह तरीका दोनों तरफ से समाज को विभाजित करने और गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा करने की साजिश का हिस्सा हो सकता है।ये है भारत का आतंकी चेतन सिंह, जिसने नाम पूछकर गोली मारने की परंपरा शुरू की।

22 अप्रैल 2025 को, जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में लश्कर-ए-तैयबा के सहयोगी संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) ने एक आतंकी हमला किया, जिसमें 26 लोग मारे गए, जिनमें ज्यादातर पर्यटक थे। आतंकियों ने पर्यटकों से उनके नाम और धर्म पूछे, कुछ को इस्लामी आयत ‘कलमा’ पढ़ने के लिए कहा, और जो लोग ऐसा नहीं कर पाए, उन्हें गोली मार दी। इस हमले में आतंकियों ने पुरुषों के निजी अंगों की जांच की और उनकी पैंट उतारने जैसे अपमानजनक कृत्य किए, जो न केवल हिंसक बल्कि गहरे स्तर पर अमानवीय थे। लेकिन इस तरह के घिनौने कृत भारत के कुछ कट्टरपंथी हिंदू संगठन द्वारा भी किए गए थे। बहरहाल इस हमले की जिम्मेदारी TRF ने ली, और कई स्रोतों ने इसे पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद से जोड़ा। यह हमला उस समय हुआ जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सऊदी अरब के दौरे पर थे, और अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भारत में थे, जिससे इसकी टाइमिंग को संदिग्ध माना जा रहा है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह हमला भारत की छवि को धूमिल करने और आंतरिक अशांति पैदा करने की साजिश थी।आतंकियों की यह रणनीति—नाम और धर्म पूछकर हत्या करना—चेतन सिंह की घटना से प्रेरित हो सकती है। यह एक सुनियोजित प्रयास हो सकता है, जिसका मकसद भारत में साम्प्रदायिक तनाव को भड़काना और कट्टरपंथी संगठनों को प्रतिक्रिया के लिए उकसाना हो। आतंकी संगठन जानते हैं कि ऐसी घटनाएं भारत में कट्टरपंथी हिंदू संगठनों को मुसलमानों के खिलाफ हिंसा के लिए प्रेरित कर सकती हैं, जिससे देश में अराजकता और गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।

कश्मीरी छात्रों पर हमले,पंजाब और अन्य क्षेत्रों में स्थिति
पहलगाम हमले के बाद, देश के कई हिस्सों, विशेष रूप से पंजाब में, कश्मीरी छात्रों के खिलाफ हिंसा की खबरें सामने आई हैं। पंजाब के बठिंडा में गुरु काशी यूनिवर्सिटी में बिहारी और कश्मीरी छात्रों पर तलवारों से हमले हुए, जिसमें कई छात्र घायल हो गए। पीड़ित छात्रों का कहना है कि पिछले कई दिनों से माहौल भयावह बना हुआ है, और वे अपनी जान बचाने के लिए मदद की गुहार लगा रहे हैं। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने दावा किया कि यह विवाद बिहारी छात्रों के दो गुटों के बीच था, लेकिन छात्रों का कहना है कि कश्मीरी छात्रों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया। ऐसी घटनाएं कश्मीरी छात्रों के लिए शिक्षा प्राप्त करने के अवसरों को खतरे में डाल रही हैं। ये छात्र, जो अपने भविष्य को बेहतर बनाने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में पढ़ने आते हैं, अब डर और असुरक्षा के माहौल में जी रहे हैं।
उनकी मांग स्पष्ट है
वे आतंकवाद से कोई संबंध नहीं रखते और उन्हें शिक्षा का अधिकार मिलना चाहिए। कश्मीरी छात्रों ने बार-बार कहा है कि वे भारत के नागरिक हैं और आतंकवाद का विरोध करते हैं, फिर भी उन्हें सामाजिक बहिष्कार और हिंसा का सामना करना पड़ रहा है।
मुसलमानों की देशभक्ति और आतंकवाद के खिलाफ आवाज
पहलगाम हमले के बाद भारत के मुसलमानों ने इसकी कड़ी निंदा की और आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठाई। भोपाल में हिंदू-मुस्लिम समुदाय ने एक साथ आतंकवाद के खिलाफ प्रदर्शन किया। जम्मू-कश्मीर में पीपुल्स कॉन्फ्रेंस पार्टी ने विरोध मार्च निकाला, जिसमें सज्जाद लोन ने कहा कि यह हमला कश्मीर की पहचान पर हमला है। यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, वर्ल्ड मुस्लिम लीग, ईरान, और यूएई जैसे मुस्लिम-बहुल संगठनों और देशों ने भी इस हमले की निंदा की।भारत के मुसलमानों ने यह साबित कर दिया कि वे आतंकवाद के खिलाफ हैं और भारत की एकता और अखंडता के लिए प्रतिबद्ध हैं। फिर भी, कुछ कट्टरपंथी हिंदू संगठन इस घटना का इस्तेमाल मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने के लिए कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसी खबरें सामने आई हैं, जिनमें मुसलमानों की दुकानों को जलाने और उन्हें “पाकिस्तान चले जाओ” कहने की घटनाएं दर्ज की गई हैं। ये कृत्य न केवल गैरकानूनी हैं, बल्कि भारत के संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक ताने-बाने के खिलाफ हैं।
कट्टरपंथी संगठनों की भूमिका और साम्प्रदायिक तनाव
पहलगाम हमले के बाद, कुछ कट्टरपंथी हिंदू संगठनों ने प्रदर्शन किए और मुसलमानों के खिलाफ भड़काऊ नारेबाजी की। इन संगठनों ने इस घटना को मुसलमानों के खिलाफ सामान्यीकरण करने की कोशिश की, जिससे साम्प्रदायिक तनाव बढ़ा। सोशल मीडिया पर ऐसी पोस्ट्स सामने आईं, जिनमें मुसलमानों को देश छोड़ने के लिए कहा गया और उनकी दुकानों को निशाना बनाया गया। यह स्थिति खतरनाक है, क्योंकि यह समाज को और अधिक ध्रुवीकृत कर सकती है।दूसरी ओर, मुस्लिम संगठनों की ओर से ऐसी कोई बड़ी प्रतिक्रिया सामने नहीं आना यह दर्शाता है कि भारत के मुसलमान इस संकट में संयम बरत रहे हैं और देश में शांति बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, यदि कट्टरपंथी हिंदू संगठन अपनी सीमाएं लांघते रहे, तो यह संभव है कि मुसलमानों का धैर्य टूटे और स्थिति और बिगड़ जाए।
एक तरफ अगर कट्टरपंथी देश को तोड़ने वाले संगठन हैं तो वहीं भारतीय जनता पार्टी में अरविंद अग्रवाल जैसे नेता भी हैं जो सच बोलने से नहीं चूकते।
फेसबुक द्वारा ये जानकारी हमे अली अब्बास के हैंडल से प्राप्त हुई है जिसे आपसे साझा कर रहे हैं।

आतंकवादियों की ये रणनीति भारत को गृहयुद्ध की तरफ ले जा सकती है
आतंकियों की यह रणनीति—नाम और धर्म पूछकर हत्या करना—सिर्फ हिंसा तक सीमित नहीं है। यह एक गहरी साजिश का हिस्सा हो सकती है, जिसका मकसद भारत में गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा करना है। आतंकी संगठन जानते हैं कि ऐसी घटनाएं कट्टरपंथी संगठनों को उकसाएंगी, जो बदले में मुसलमानों के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देंगे। इससे सामाजिक अशांति बढ़ेगी, और आतंकी संगठन इस अराजकता का फायदा उठाकर और हमले कर सकते हैं।पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर के हालिया बयान, जिसमें उन्होंने कश्मीर को “पाकिस्तान की नस” बताया और हिंदुओं व मुसलमानों को अलग-अलग बताया, ने भी इस साजिश को बल दिया। भारत ने इसका कड़ा जवाब देते हुए कहा कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, और पाकिस्तान की मंशा आंतरिक संकटों से ध्यान भटकाने की है।
ये एक प्रदेश का सरकारी ग्रुप है जिसपर पहलगाम की घटना के बाद देश हिंदू भाइयों से कुछ अपील की गई है । पढ़िए और अनुमान लगाए कि इनका कहने का क्या तात्पर्य है ?

सरकार और समाज की जिम्मेदारी
इस संकट से निपटने के लिए सरकार और समाज को मिलकर काम करना होगा। सरकार द्वारा निष्पक्ष कार्रवाई कर कट्टरपंथी संगठनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए, चाहे वे किसी भी धर्म से हों। पहलगाम हमले के बाद 1450 लोगों को हिरासत में लिया गया है, लेकिन यह सुनिश्चित करना होगा कि निर्दोष लोग निशाना न बनें।
कानून व्यवस्था
उन लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो जो मुसलमानों की दुकानों को जलाने या उन्हें देश छोड़ने के लिए कहने जैसे कृत्य कर रहे हैं। कानून व्यवस्था को मजबूत करना होगा ताकि ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।
सामाजिक सौहार्द
सरकार को धार्मिक नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, और नागरिक संगठनों के साथ मिलकर साम्प्रदायिक सौहार्द को बढ़ावा देना चाहिए। समाज को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। भारत का इतिहास विविधता और सहिष्णुता का रहा है। हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई—सभी ने मिलकर इस देश को बनाया है। कट्टरपंथी संगठनों को यह समझना होगा कि उनकी नफरत भरी हरकतें न केवल देश को कमजोर करती हैं, बल्कि आतंकियों के मंसूबों को भी मजबूत करती हैं।
कश्मीरी छात्रों का संदेश
कश्मीरी छात्र, जो देश के विभिन्न हिस्सों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, बार-बार यह कह रहे हैं कि वे आतंकवाद का समर्थन नहीं करते। उनका एकमात्र उद्देश्य शिक्षा प्राप्त करना और अपने भविष्य को बेहतर बनाना है। उनकी मांग है कि उन्हें बिना किसी भेदभाव के पढ़ने का मौका दिया जाए। यह हम सभी की जिम्मेदारी है कि इन युवाओं को सुरक्षा और सम्मान प्रदान करें, ताकि वे भारत के विकास में योगदान दे सकें।
चेतन सिंह की घटना और पहलगाम आतंकी हमला दोनों ही भारत के सामाजिक ताने-बाने पर गहरे घाव छोड़ गए हैं। ये घटनाएं न केवल हिंसक हैं, बल्कि इनका मकसद समाज को बांटना और गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा करना है। भारत के मुसलमानों ने आतंकवाद के खिलाफ आवाज उठाकर यह साबित कर दिया कि वे इस देश के प्रति उतने ही वफादार हैं जितना कोई और। फिर भी, कट्टरपंथी संगठनों की भड़काऊ हरकतें और मुसलमानों के खिलाफ हिंसा की घटनाएं देश को एक खतरनाक मोड़ पर ले जा रही हैं।यह समय संयम, एकता, और निष्पक्षता का है। सरकार को कट्टरपंथी तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी होगी, और समाज को यह समझना होगा कि नफरत और हिंसा से कोई विजय नहीं मिलती। भारत की ताकत उसकी विविधता में है, और हमें इसे हर हाल में संरक्षित करना होगा। कश्मीरी छात्रों को सुरक्षा और सम्मान देना, आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होना, और कट्टरपंथ को खारिज करना ही इस संकट से निकलने का रास्ता है।



