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बीजेपी केंद्रीय अनुशासन समिति ने की बड़ी करवाई , दो विधायकों को किया 6 साल के लिए निष्कासित

अनुशासन पर सख्ती या चुनिंदा कार्रवाई?

लखनऊ, 27 मई । भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की केंद्रीय अनुशासन समिति ने मंगलवार को कर्नाटक के दो विधायकों, एस टी सोमशेखर और ए शिवराम हेब्बार, को पार्टी अनुशासन के बार-बार उल्लंघन के आरोप में 6 साल के लिए निष्कासित कर दिया। यह कार्रवाई पार्टी के भीतर अनुशासन को लेकर सख्त रवैये का संदेश देती है, लेकिन यह सवाल भी उठाती है कि क्या समिति की कार्रवाई निष्पक्ष है या केवल चुनिंदा मामलों तक सीमित है। खास तौर पर, देश के शीर्ष संस्थानों और सैन्य अधिकारियों के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियों के बावजूद कुछ नेताओं पर कार्रवाई न होना निष्पक्षता पर सवाल उठाता है।

निष्कासन का आधार और संदर्भ

भाजपा की केंद्रीय अनुशासन समिति ने अपने बयान में कहा कि सोमशेखर और हेब्बार ने पार्टी की नीतियों और नियमों का बार-बार उल्लंघन किया, जिससे संगठन की छवि को नुकसान पहुंचा। हालांकि, उनके विशिष्ट कृत्यों का खुलासा नहीं किया।
जानकारी के अनुसार, यह निष्कासन तत्काल प्रभाव से लागू किया गया है, और दोनों विधायकों को अगले 6 वर्षों तक पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से वंचित रखा जाएगा। यह कदम कर्नाटक में भाजपा के आंतरिक अनुशासन को मजबूत करने का प्रयास माना जा रहा है, लेकिन यह व्यापक बहस का विषय बन गया है कि क्या यह कार्रवाई सभी नेताओं के लिए समान रूप से लागू होती है।

अनुशासनहीनता के गंभीर मामले और निष्पक्षता पर सवाल

मेरे द्वारा सवाल में उठाए गए बिंदु अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। जहां भाजपा ने अपने विधायकों को पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए तुरंत निष्कासित किया, वहीं कुछ नेताओं द्वारा देश के शीर्ष संस्थानों, जैसे सुप्रीम कोर्ट, और भारतीय सेना की वीरांगनाओं, जैसे कर्नल सोफिया कुरैशी, के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। मध्य प्रदेश के कैबिनेट मंत्री विजय शाह ने कर्नल सोफिया कुरैशी को “आतंकवादियों की बहन” कहकर उनकी आन-बान-शान का अपमान किया। सुप्रीम कोर्ट ने 19 मई 2025 को इस मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए शाह को कड़ी फटकार लगाई और एक विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने का आदेश दिया। इसके बावजूद, भाजपा की केंद्रीय अनुशासन समिति ने इस मामले में कोई आंतरिक कार्रवाई नहीं की, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या पार्टी देश के सम्मान से ऊपर अपनी छवि को प्राथमिकता दे रही है?इसी तरह, समाजवादी पार्टी (सपा) के नेता रामगोपाल यादव द्वारा महिला सैन्य अधिकारी व्योमिका सिंह पर जातिसूचक टिप्पणी और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों पर विवादास्पद बयानों ने सामाजिक तनाव को बढ़ाया। सपा विधायक सुरेश यादव ने तो भाजपा को “हिंदू आतंकवादी संगठन” करार दिया, जिसे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने “राष्ट्रविरोधी” बताया। लेकिन सपा ने भी अपने नेताओं के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। यह स्थिति दर्शाती है कि अनुशासनहीनता का मुद्दा केवल भाजपा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सभी दलों में व्याप्त है।क्या पार्टी देश से ऊपर है? क्या भाजपा देश को तोड़ने वाले बयानों और सांप्रदायिकता फैलाने वाले नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करने में विफल रही है, गंभीर चिंता का विषय है। सुप्रीम कोर्ट जैसे संवैधानिक संस्थानों और सेना जैसे राष्ट्रीय गौरव का अपमान करने वाले बयान न केवल सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि देश की एकता और अखंडता को भी चुनौती देते हैं। ऐसे में, यह अपेक्षा की जाती है कि भाजपा की केंद्रीय अनुशासन समिति, जो पार्टी विरोधी गतिविधियों पर त्वरित कार्रवाई करती है, उन नेताओं के खिलाफ भी सख्त कदम उठाए जो देश के खिलाफ भड़काऊ बयान देते हैं।उदाहरण के लिए, विजय शाह का बयान न केवल एक महिला सैन्य अधिकारी का अपमान था, बल्कि यह भारतीय सेना की गरिमा पर भी हमला था। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बावजूद, भाजपा की चुप्पी से यह संदेश जाता है कि पार्टी अपने नेताओं को संरक्षण दे रही है। इसी तरह, सपा नेताओं के बयान, जो सांप्रदायिकता को बढ़ावा देते हैं, उनके खिलाफ भी कोई सख्त कार्रवाई न होना विपक्ष की कमजोरी दर्शाता है।

निष्पक्षता और जनता का विश्वास

भाजपा की केंद्रीय अनुशासन समिति की भूमिका केवल पार्टी के भीतर अनुशासन बनाए रखने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यदि पार्टी वास्तव में “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय एकता” के सिद्धांतों पर चलती है, जैसा कि उसकी वेबसाइट पर दावा किया गया है, तो उसे सांप्रदायिकता फैलाने वाले, सेना का अपमान करने वाले, और संवैधानिक संस्थानों पर हमला करने वाले नेताओं के खिलाफ तुरंत और सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।ऐसी कार्रवाइयां न केवल पार्टी की निष्पक्षता को स्थापित करेंगी, बल्कि जनता के बीच उसका विश्वास भी बढ़ाएंगी। विशेष रूप से, कर्नल सोफिया कुरैशी जैसे सैन्य अधिकारियों का सम्मान देश की जनता के लिए गर्व का विषय है। उनके खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियों पर कार्रवाई न करना जनता में नाराजगी पैदा करता है। यदि भाजपा विजय शाह जैसे नेताओं को निष्कासित करती है, तो यह न केवल देश के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाएगा, बल्कि आने वाले चुनावों में जनता का समर्थन हासिल करने में भी मदद करेगा।

ऐतिहासिक संदर्भ और सबक

ऐतिहासिक रूप से, 1992 के बाबरी मस्जिद विध्वंस और 2002 के गुजरात दंगों के दौरान भी भाजपा नेताओं पर भड़काऊ बयानबाजी के आरोप लगे थे, लेकिन आंतरिक कार्रवाई की बजाय बाहरी जांचों पर निर्भरता दिखी। यह प्रवृत्ति आज भी जारी है, जहां गंभीर मामलों में समिति चुप्पी साध लेती है। दूसरी ओर, विपक्षी दल जैसे कांग्रेस और सपा भी अपने नेताओं के खिलाफ कार्रवाई में ढिलाई बरतते हैं, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या सभी दल केवल राजनीतिक लाभ के लिए अनुशासन का उपयोग करते हैं?

देश पहले, पार्टी बाद में

भाजपा की केंद्रीय अनुशासन समिति ने दो विधायकों के निष्कासन से यह संदेश दिया है कि वह अनुशासन के प्रति गंभीर है। लेकिन यह कार्रवाई तब तक अधूरी मानी जाएगी, जब तक समान मापदंड उन नेताओं पर लागू नहीं होते जो देश के शीर्ष संस्थानों और सैन्य अधिकारियों का अपमान करते हैं। विजय शाह जैसे मामलों में त्वरित निष्कासन और सांप्रदायिकता फैलाने वाले बयानों पर सख्ती से पार्टी की छवि निखरेगी और जनता का विश्वास बढ़ेगा।साथ ही, सपा जैसे दलों को भी अपने नेताओं के भड़काऊ बयानों पर अंकुश लगाना चाहिए। भारतीय लोकतंत्र में नेताओं की भाषा और आचरण सामाजिक सौहार्द और राष्ट्रीय गौरव के लिए महत्वपूर्ण हैं। यदि भाजपा और अन्य दल देश को तोड़ने वाले बयानों और सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करें, तो यह न केवल उनकी निष्पक्षता को स्थापित करेगा, बल्कि आम जनता में उनकी विश्वसनीयता को भी मजबूत करेगा। यह कदम निश्चित रूप से आने वाले चुनावों में भाजपा को राजनीतिक लाभ भी दिला सकता है, क्योंकि जनता ऐसी पार्टी का समर्थन करती है जो देश को पहले रखे, न कि केवल अपनी छवि को।

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