ज़की भारतीय
मेरे घर में जब मेरा नाम लिया जाता था, तो उसमें भी “भारतीय” की पहचान झलकती थी। लोग प्यार से मुझे “भईया भारतीय कहा करते थे। यही एहसास मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी रही है।
आज जब मैं पत्रकारिता और शायरी के रास्ते पर हूँ, तो मेरा नाम सिर्फ़ “सैयद ज़की हुसैन रिजवी” नहीं रह जाता, बल्कि उसमें मेरी मिट्टी, मेरा वतन भी सांस लेता है। यही वजह है कि मैं अपने नाम के आगे “रिज़वी” नहीं लिखता, बल्कि “भारतीय” लिखता हूँ—क्योंकि मुझे अपने भारत से, अपनी इस धरती से, इतनी मोहब्बत है कि शब्द भी मेरे साथ झुककर सलाम करते हैं।
भारत मेरे लिए महज़ एक मुल्क नहीं, मेरी आत्मा है। जब कोई कोशिश करता है कि हिंदू-मुसलमान, सिख-ईसाई के बीच दीवार खड़ी कर दे, तो मेरे दिल से आह निकलती है। मैं सोचता हूँ—क्या उन्हें मालूम है कि इस देश का हर कतरा, हर कण, हर साँस हमारे मेल-जोल से बनी है? यहाँ मोहब्बत का दरिया बहता है, और नफ़रत की आग बुझ जानी चाहिए। मैंने अपनी ज़िंदगी में यही सीखा है कि इंसानियत सबसे बड़ी पहचान है। मैं नफ़रत की इस आग को देखकर टूट जाता हूँ। सोचता हूँ, काश लोग मेरे दिल की तरह इस मिट्टी को चाहने लगें, तो शायद कोई आँख सूखी न रहे।
आज भी जब मैं अपनी कलम उठाता हूँ, तो उसमें सिर्फ़ स्याही नहीं होती, उसमें मेरे आँसू बहते हैं, मेरा वतन बोलता है, मेरी मोहब्बत गूँजती है। और जब मैं लिखता हूँ, तो चाहता हूँ कि लोग पढ़ें और महसूस करें—यह मुल्क हम सबका है। यहाँ कोई हिंदू, कोई मुसलमान अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे का सहारा हैं।
अगर इस लेख को पढ़कर किसी की आँख भर आए, तो समझिए मेरी मोहब्बत रंग लाई। क्योंकि मेरा सपना यही है—लोग नफ़रत छोड़कर मोहब्बत को अपना लें। यही मेरा भारत है, यही मेरी पहचान है।
करीब तीस साल पहले की बात है। मेरा बचपन उसी कश्मीरी मोहल्ले में बीता, जहाँ मैं पैदा भी हुआ। मोहल्ला मिलाजुला था—चारों तरफ हिंदुओं के घर थे, और बीच-बीच में मुसलमानों के भी कुछ घर। वही मेल-जोल, वही साथ रहना ही हमारी असली पहचान था। मेरा अपना घर भी उन चंद मुस्लिम घरों में था, जो हिंदू कश्मीरी पंडित परिवारों से घिरा हुआ था।
मेरे सभी बचपन के दोस्त हिंदू थे, लेकिन कभी किसी ने इस रिश्ते पर धर्म की लकीर नहीं खींची। हमारी बहनें हिंदू परिवारों से थीं, लेकिन वे हमें राखी बाँधती थीं। रक्षाबंधन का दिन मोहल्ले में भाईचारे का त्योहार होता था—राखी के धागे सिर्फ़ हाथ पर नहीं, दिल पर भी बंधते थे।
उन दिनों दीपावली, होली, सुंदरकांड या रामायण पाठ हो, तो हम पूरे दिल से शरीक होते। और जब हमारे यहाँ मुहर्रम, रमज़ान, ईद या बकरीद आती, तो वही दोस्त, वही बहनें और वही मोहल्ले वाले हमारे साथ खड़े मिलते। हर त्योहार, हर रस्म, हर जश्न में मोहब्बत और बराबरी की वही रौशनी होती थी। यही था कश्मीरी मोहल्ले का असली जादू, जो मोहब्बत और भाईचारे से मशहूर था।
आज हालात अलग हैं। वक्त ने हमें दूर कर दिया। मेरे बचपन के साथी—पंकज टिक्कू, प्रेम कुमार जायसवाल, श्यामू, विपिन भैया, गप्पू भैया, संजीव कुलश्रेष्ठ, राकेश और मोहित माथुर—सब अपने-अपने रास्तों पर निकल गए। कोई घर छोड़ गया, कोई काम की वजह से दूर चला गया, और सब अपनी-अपनी ज़िंदगी की व्यस्तता में गुम हो गए।
लेकिन मेरे लिए वे दोस्त, वे दिन, वे यादें अब भी मेरी आँखों में सजी हुई हैं। कभी सोचता हूँ तो दिल भारी हो जाता है। मोहल्ले की वह गलियाँ, त्यौहारों की रौनक, राखियों के रंग, दीपों की जगमग, इबादतों की गूँज—सब जैसे आज भी दिल में जिंदा हैं।
हम अलग ज़रूर हो गए, मगर उन दिनों की मोहब्बत और दोस्ती आज भी मेरी सबसे बड़ी ताक़त है। यही यादें बताती हैं कि असली भारत कैसा है—जहाँ हिंदू-मुसलमान, सिख-ईसाई, सब मिलकर एक-दूसरे की खुशियों और ग़मों में शरीक होते हैं। वही भारत मेरे दिल में है, वही मोहब्बत मेरी पहचान है।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में दशहरा और अन्य त्योहारों के दौरान शांति भंग करने वालों को कड़ी चेतावनी दी है, लेकिन प्रदेश भर में मुस्लिम धार्मिक स्थलों पर हुई हिंसक घटनाओं ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है: क्या शासन में दोहरे मापदंड अपनाए जा रहे हैं? स्थानीय निवासी, सोशल मीडिया पर वायरल क्लिप्स और विभिन्न समाचार रिपोर्ट्स इन घटनाओं का हवाला दे रही हैं, जहां पुलिस की भूमिका पर गंभीर संदेह जताया जा रहा है। मुख्यमंत्री की चेतावनी स्वागतयोग्य है, लेकिन जब बात मुस्लिम समुदाय के खिलाफ हमलों की आती है, तो पुलिस की निष्क्रियता या पक्षपाती कार्रवाई स्पष्ट नजर आती है। क्या यह इशारा योगी सरकार की तरफ से है कि पुलिस चुनिंदा रूप से कार्रवाई करे? इन घटनाओं से यह धारणा मजबूत हो रही है कि कानून सबके लिए बराबर नहीं है, और इससे सामाजिक सद्भाव को खतरा है।
प्रमुख घटनाएं और पुलिस की भूमिका का विश्लेषण
उत्तर प्रदेश में 2025 की शुरुआत से ही धार्मिक तनाव की घटनाएं बढ़ी हैं, खासकर मुस्लिम स्थलों और व्यक्तियों पर हमले। इनमें से कई घटनाएं राम नवमी या अन्य त्योहारों से पहले या बाद में हुईं, लेकिन पिछले महीनों की घटनाओं पर फोकस करते हुए देखें तो पुलिस की भूमिका संदिग्ध रही है। उदाहरण के तौर पर, फतेहपुर जिले में अगस्त 2025 में एक 200 साल पुराने मजार पर हमला हुआ। यहां करीब 1,000 सदस्यों वाली एक भीड़, जिसमें दक्षिणपंथी संगठनों के कार्यकर्ता शामिल थे, ने मजार पर चढ़कर भगवा झंडा फहराया और संरचना को नुकसान पहुंचाया। वीडियो क्लिप्स में साफ दिखता है कि भीड़ ने पुलिस बैरिकेड तोड़े, नारे लगाए और संपत्ति को क्षति पहुंचाई। पुलिस ने करीब 150 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की, लेकिन एक महीने बाद भी मुख्य आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं हुई। स्थानीय निवासियों का कहना है कि पुलिस घटना स्थल पर मौजूद थी, लेकिन सख्त कार्रवाई करने की बजाय मूकदर्शक बनी रही। क्या यह मुख्यमंत्री के इशारे पर था? अगर त्योहारों में गड़बड़ी पर सख्ती की बात है, तो यहां क्यों हाथ पर हाथ धरे बैठी रही पुलिस? इससे क्षेत्र में मुस्लिम समुदाय में भय का माहौल फैल गया, और तनाव कई दिनों तक बना रहा।
बरेली में सितंबर 2025 के अंत में ‘आई लव मुहम्मद’ अभियान से जुड़े प्रदर्शनों ने हिंसा का रूप ले लिया। यहां प्रदर्शनकारी मस्जिदों के बाहर इकट्ठा हुए, लेकिन पुलिस ने भारी कार्रवाई की। क्लैश में पत्थरबाजी हुई, और पुलिस ने सैकड़ों एफआईआर दर्ज कीं, दर्जनों गिरफ्तारियां कीं, और यहां तक कि इंटरनेट सेवाएं बंद कर दीं। एक प्रमुख क्लरिक तौकीर रजा खान समेत आठ लोगों को गिरफ्तार किया गया, और कुछ संपत्तियों पर बुलडोजर चलाया गया। रिपोर्ट्स में कहा गया कि पुलिस ने मस्जिदों में घुसकर इमामों और नमाजियों को परेशान किया। लेकिन सवाल यह है कि जब हिंदू संगठनों द्वारा हमले होते हैं, तो पुलिस इतनी तत्पर क्यों नहीं दिखती? बरेली में मुस्लिम प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज और बर्बरता की खबरें आईं, जबकि फतेहपुर जैसी घटनाओं में पुलिस ने हाथ पैर बांधे रखे। क्या यह पक्षपात नहीं? स्थानीय लोग आरोप लगाते हैं कि पुलिस मुस्लिमों के खिलाफ तुरंत एक्शन लेती है, लेकिन हिंदू दंगाइयों को थाने में मुस्कुराते हुए चेहरे के साथ छोड़ दिया जाता है। इससे लगता है कि योगी सरकार का इशारा है कि पुलिस दशहरा या अन्य त्योहारों के नाम पर चुनिंदा कार्रवाई करे।
अलीगढ़ में सितंबर 2025 में एक इमाम पर हमला हुआ, जहां हमलावरों ने उन्हें ‘जय श्री राम’ चैंट करने को मजबूर किया और ‘पाकिस्तान जाओ’ जैसे नारे लगाए। इमाम की दाढ़ी खींची गई, टोपी उतारी गई, और मारपीट की गई। वीडियो में घायल इमाम अपनी चोटें दिखाते नजर आते हैं। पुलिस ने क्लैश का नाम देकर मामला रफा-दफा करने की कोशिश की, लेकिन एफआईआर में सांप्रदायिक एंगल से इनकार किया। यहां भी पुलिस की निष्क्रियता साफ है—कोई गिरफ्तारी नहीं, जांच में देरी। अगर मुख्यमंत्री गड़बड़ी करने वालों को नहीं बख्शने की बात करते हैं, तो यहां क्यों सख्ती नहीं दिखी? इससे मुस्लिम समुदाय में असुरक्षा बढ़ी है।
आगरा में मार्च 2025 में करनी सेना ने समाजवादी पार्टी के सांसद रामजी लाल सुमन के घर पर हमला किया। भीड़ ने पत्थरबाजी की, खिड़कियां तोड़ीं और वाहनों को नुकसान पहुंचाया। कारण था सांसद का राणा सांगा पर बयान। पुलिस ने दावा किया कि त्वरित कार्रवाई की, लेकिन कई आरोपियों को जल्दी छोड़ दिया गया। यहां भी पक्षपात नजर आता है—मुस्लिमों पर सख्ती, लेकिन हिंदू संगठनों पर नरम रुख।
सोशल मीडिया पर कई क्लिप्स वायरल हैं, जहां मस्जिदों या मजारों के बाहर जुलूस रुककर घंटों आपत्तिजनक नारेबाजी करते हैं। इनमें धार्मिक अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल होता है, लेकिन पुलिस अक्सर हस्तक्षेप नहीं करती।
नागरिकों के सवाल और पक्षपात के आरोप
नागरिक सवाल उठा रहे हैं: यदि मुख्यमंत्री त्योहारों में गड़बड़ी पर सख्ती की बात करते हैं, तो मजारों पर हमलों, मस्जिदों के बाहर नारेबाजी और मुस्लिमों पर हमलों में पुलिस क्यों चुप है? एफआईआर किसके खिलाफ दर्ज होती है? आरोप है कि हिंदू समूहों की हिंसा पर कार्रवाई धीमी, जबकि मुस्लिम प्रदर्शनों पर तुरंत सख्ती। पुलिस कई क्लिप्स में मूकदर्शक नजर आती है। क्या यह योगी सरकार का इशारा है? मुख्यमंत्री को यह पक्षपात छोड़ना होगा। उन्होंने शपथ ली थी कि कानून का पालन करेंगे, संविधान के अनुसार चलेंगे। लेकिन संविधान कहता है कि दंगाइयों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो, न कि पक्षपात। अगर कोई खूंखार अपराधी है, तो जेल भेजें, न कि चुनिंदा समुदाय को टारगेट करें। सारे हिंदू ऐसे नहीं, लेकिन कट्टरपंथी संगठन सोशल मीडिया से बढ़ रहे हैं, जो मुस्लिमों से अटूट नफरत रखते हैं। वे मुगल शासन से जलते हैं, दावा करते हैं कि मुगलों ने मंदिर तोड़े और हिंदुओं पर अत्याचार किया। लेकिन इतिहास गलत व्याख्या है।
मुगल इतिहास की गलत व्याख्या और कट्टरपंथ का उदय
कट्टरपंथी हिंदू संगठन मुगलों को हिंदुओं का दुश्मन बताते हैं, लेकिन इतिहास की गहराई से देखने पर तस्वीर कुछ और ही सामने आती है। सोशल मीडिया पर अक्सर यह प्रचार किया जाता है कि मुगल शासकों ने सिर्फ़ अत्याचार किए, मंदिर तोड़े और हिंदुओं को सताया। जबकि सच यह है कि मुगलों ने सत्ता और राजनीति के लिए कदम उठाए, लेकिन धर्म के आधार पर पूरे हिंदू समाज को दुश्मन मानकर कोई अभियान नहीं चलाया।
मुगलों के शासनकाल में हिंदू समाज न सिर्फ़ सुरक्षित रहा, बल्कि उनकी सक्रिय भागीदारी भी रही। आज यदि भारत में 80 करोड़ हिंदू मौजूद हैं, तो यह खुद इस बात का प्रमाण है कि धार्मिक आधार पर सामूहिक उत्पीड़न की कहानी तथ्य नहीं बल्कि अफ़वाह है।
औरंगज़ेब के फैसले और मंदिरों का संरक्षण
औरंगज़ेब को अक्सर सबसे बड़ा कट्टरपंथी सम्राट बताकर पेश किया जाता है। यह सही है कि उन्होंने कुछ राजनीतिक कारणों से मंदिर ध्वस्त कराए, लेकिन उतना ही सच यह भी है कि औरंगज़ेब ने दर्जनों आदेश जारी किए जिनमें मंदिरों में हस्तक्षेप न करने की बात कही गई। कई मंदिरों को ज़मीन की ग्रांट दी, पुजारियों को अनुदान दिलवाए और कई जगहों पर पूजा-पाठ के लिए सरकारी मदद सुनिश्चित की। इतिहास की किताबों में स्पष्ट दर्ज है कि बनारस, उज्जैन और गुजरात के मंदिरों को औरंगज़ेब ने संरक्षण देने के आदेश दिए थे।
हिंदू सेनापति और प्रशासनिक अधिकारी
मुगल दरबार और सेना में बड़ी संख्या में हिंदू सेनापति और अधिकारी मौजूद थे। राजपूतों की तो महत्वपूर्ण भूमिका रही। मान सिंह जैसे सेनापति मुगलों की सेना का नेतृत्व करते रहे। अगर शासन धर्म आधारित भेदभाव पर खड़ा होता तो क्या किसी हिंदू सेनापति को इतनी ऊँची ज़िम्मेदारी दी जाती? यही नहीं, जागीर और ज़मींदारी भी कई हिंदू कुलों को सौंपी गई।
अवध के नवाब और बड़ा मंगल
मुगलों के बाद जब अवध में नवाबों का दौर आया, तब भी सांप्रदायिक सौहार्द की मिसालें कायम की गईं। लखनऊ के नवाबों ने हिंदुओं के प्रमुख त्योहारों और धार्मिक आयोजनों को बढ़ावा दिया। बड़ा मंगल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
नवाब आसिफ-उद-दौला के समय में शुरू हुआ यह आयोजन आज भी लखनऊ की पहचान है। हनुमान मंदिरों में भंडारे होते हैं, पूरे शहर में लाखों लोग धर्म, जाति और मज़हब से ऊपर उठकर प्रसाद और भोजन ग्रहण करते हैं। यह सिर्फ़ त्योहार नहीं बल्कि गंगा-जमुनी तहज़ीब की जीवंत परंपरा है, जिसकी नींव नवाबी शासनकाल में रखी गई थी।
हिंदुओं को पेंशन और सहायता
इतिहास में दर्ज है कि अवध के नवाबों ने न सिर्फ़ हिंदू त्योहारों को समर्थन दिया बल्कि कई हिंदू परिवारों को पेंशन की व्यवस्था भी दी। आज भी कई परिवार उस पेंशन पर अपनी पीढ़ियों को पालते आ रहे हैं। यह साबित करता है कि नवाब केवल मुस्लिम समाज के बारे में नहीं सोचते थे, बल्कि अपने राज्य के हर नागरिक की भलाई उनके लिए महत्वपूर्ण थी।
मंदिर निर्माण और संरक्षण की परंपरा
मुगल और नवाबी काल में कई मंदिरों का निर्माण और संरक्षण किया गया। लखनऊ के अलिगंज हनुमान मंदिर की स्थापना एक नवाबी बेगम के प्रयासों से हुई। यही नहीं, मंदिरों के पुनर्निर्माण और मरम्मत के लिए राजकोष से धन जारी किया गया। यदि शासन का उद्देश्य हिंदू धर्म को नष्ट करना होता तो क्या मंदिरों को इस तरह समर्थन दिया जाता?
मुगलों की नीतियाँ जातिवाद या सांप्रदायिक नहीं
मुगलों की राजनीति और नीतियाँ मुख्यतः सत्ता बनाए रखने और विद्रोहों को दबाने के इर्द-गिर्द घूमती थीं। कहीं-कहीं कठोर फैसले भी हुए, लेकिन वे किसी खास धर्म के खिलाफ़ नहीं बल्कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ़ थे। यह कहना कि मुगलों ने संगठित रूप से हिंदुओं को दुश्मन माना, इतिहास से खिलवाड़ है।
मुग़ल शासकों ने अगर कट्टरपंथी मानसिकता दिखाई होती, तो कम से कम आज कट्टरपंथी न होते? यह भी विचारणीय है कि यदि सचमुच 350 साल तक मुगल शासन ने लगातार हिंदुओं को सताया होता, तो आज इतने बड़े पैमाने पर हिंदू जनसंख्या कैसे बचती? असलियत यह है कि उस दौर में हिंदू भी उतने ही फलते-फूलते रहे जितना मुस्लिम समाज। खेती, व्यापार, कला और प्रशासन सभी में उनकी समान भागीदारी रही।
आज का परिदृश्य और नफरत की राजनीति
आज सोशल मीडिया के ज़रिए मुगलों के नाम पर नफरत फैलाई जा रही है। कट्टरपंथी संगठन बार-बार एक ही पक्षीय कहानी दोहराते हैं। जबकि सच यह है कि सिर्फ़ 2% कट्टरवादी ही सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने के लिए पर्याप्त हैं। बहुसंख्यक भारतीय आज भी शांति और भाईचारे के पक्षधर हैं। लेकिन संगठित नफरत का असर इतना गहरा है कि समाज में दरारें डाली जा रही हैं। इसमें अब मुस्लिम कट्टरता भी बढ़ रही है ,जो सोशल मीडिया पर देखने को मिल रही है। ऐसा नहीं कि सिर्फ हिंदू ही सांप्रादिकता को हवा दे रहे हैं,बल्कि मुसलमान भी इसके जवाब में उसी पंक्ति में खड़ा हो गया है , जिस पंक्ति में हिंदू कट्टरपंथी खड़े हैं।
इस चुनौती से निपटने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे:
1. समान नियम और पारदर्शिता – किसी भी धर्म या समुदाय के लिए अलग कानून न हो। एफआईआर, गिरफ्तारियाँ और जाँच की प्रगति सार्वजनिक हो।
2. फॉरेंसिक जाँच – जहाँ भी नुकसान या हिंसा हुई हो, वहाँ निष्पक्ष फॉरेंसिक जाँच हो ताकि अफ़वाहों की गुंजाइश न रहे।
3. शांति कमेटियाँ – जिला स्तर पर शांति कमेटियाँ बनाई जाएँ जिनमें सभी धर्मों के प्रतिनिधि हों।
4. धार्मिक नेताओं से संवाद – समय-समय पर सभी धर्मों के नेताओं से बातचीत कर माहौल को शांत करने की कोशिश हो।
5. पुलिस की निष्पक्ष ट्रेनिंग – पुलिस को सिखाया जाए कि वे किसी भी दबाव से मुक्त होकर कार्रवाई करें।
6. सोशल मीडिया रेगुलेशन – नफरत फैलाने वाले कंटेंट को रोकने के लिए सख्त कानून बनें और प्लेटफॉर्म जवाबदेह हों।
इतिहास को आधा-अधूरा बताकर नफरत फैलाना किसी भी देश और समाज के लिए घातक है। मुगलों और नवाबों का काल केवल संघर्ष की कहानी नहीं, बल्कि साझी संस्कृति, साझा उत्सव और आपसी सहयोग की भी कहानी है। और अगर मान भी लिया जाए , मुगलों ने बहुत अत्याचार किये ,तो सिर्फ हिंदुओं पर ही नहीं किये इसमें शिया संप्रदाय जो खुद मुसलमान है ,उन पर भी औरंगजेब के समय में बहुत अत्याचार हुए लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि वह आज सुन्नी मुसलमान से बदला लिया जाए । अगर कोई पिता गलती करे तो उसके बच्चों से बदला नहीं लिया जाता है । यह कट्टरपंथी हिंदू संगठनों को सोचना चाहिए। देश में अगर ऐसा हुआ था तो उसे भूल जाना चाहिए ।अब नए अंदाज़ से जिंदगी गुजारना चाहिए, हमें अपने भारत को एकजुट करके मजबूत रखना होगा, हम सब भारतीय हैं हमें अपने देश के प्रति रहने वाली जनता के प्रति ईर्ष्या नहीं रखता है प्यार रखना है। क्योंकि हम सब भारतीय हैं हम सब भाई हैं इसलिए मुसलमानों पर होने वाले अत्याचारों पर कट्टरपंथी हिंदुओं को खुश होने की जरूरत नहीं।
इंतिहा तो यह है कि ईरान पर इजरायल हमला कर रहा है सोशल मीडिया पर इजरायल जिंदाबाद, जय श्री राम के नारे लिखे गए। यह क्या है? ठीक है पाकिस्तान द्वारा हमारे भारत पर निरंतर आतंकवादी हमले होते हैं,लेकिन मुसलमान भी पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाते हैं लेकिन ये भी सत्य है, कुछ कट्टरपंथी मुसलमान द्वारा जुलूस में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे भी लगाए गए। ऐसे लोगों के विरुद्ध देशद्रोही की कार्रवाइयां होनी चाहिए। लेकिन अब हाल ये हो गया है,मुसलमान कहीं भी मारा जाए, जैसे गाजा , फिलिस्तीन, ईरान या भारत में तो सोशल मीडिया मुबारकबाद दी जाती है, जय श्री राम लिखा जाता है। जिसके जवाब में मुसलमान भी अभद्रता करने लगते हैं। इन सब चीजों पर पाबंदी लगाना पड़ेगी, इन सब चीजों पर नजर रखना पड़ेगी ,निरंतर पुलिस यह कहती है, सोशल मीडिया पर निगरानी रखी जा रही है और मैं ढेरों ऐसे सबूत दे सकता हूं कि सोशल मीडिया की निगरानी नहीं की जा रही है। ऐसे लोगों को खुली छूट दी हुई है ।कोई कार्रवाई नहीं की जाती इसलिए इसके प्रति भी प्रशासन को सोचना होगा।
कट्टरपंथी संगठनों को यह सोचना चाहिए कि अगर मुगलों ने सचमुच बदला लिया होता, तो आज हिंदू धर्म इतनी मज़बूती से खड़ा न होता। आज ज़रूरत है कि हम सब खुद को पहले भारतीय समझें—हिंदू, मुस्लिम, सिख या ईसाई बाद में। तभी यह मुल्क शांति और भाईचारे की राह पर आगे बढ़ सकता है।



