लखनऊ, 31 जुलाई । अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर भारत को आर्थिक निशाने पर लिया है। 30 जुलाई 2025 को उन्होंने भारत पर 25% टैरिफ लगाने की धमकी दी, साथ ही रूस के साथ भारत के व्यापार, खासकर सैन्य उपकरण और तेल की खरीद को “अनुचित” करार देते हुए अतिरिक्त “जुर्माना” लगाने की चेतावनी दी। यह घोषणा ऐसे समय में आई है, जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्तों को मजबूत करने की बातें जोर-शोर से हो रही थीं। ट्रंप, जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी “अच्छा दोस्त” कहते आए हैं, बार-बार भारत को नजरअंदाज करते हुए ऐसे कदम उठा रहे हैं, जो दोस्ती की बजाय दुश्मनी की ओर इशारा करते हैं। इस खबर ने न केवल भारत के आर्थिक हलकों में हलचल मचाई है, बल्कि उन कट्टरपंथी समूहों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है, जो अमेरिका और इजरायल को भारत का “संरक्षक” मानते हैं।
ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच ट्रुथ सोशल पर लिखा, “भारत हमारा मित्र है, लेकिन उनके टैरिफ बहुत ऊंचे हैं, और गैर-मौद्रिक व्यापार अवरोध सबसे कठिन हैं। हमें उनके साथ व्यापार में नुकसान हो रहा है। 1 अगस्त से 25% टैरिफ लागू होगा, और रूस के साथ उनके सौदों पर अतिरिक्त जुर्माना लगेगा।” यह बयान भारत के लिए चौंकाने वाला है, क्योंकि ट्रंप ने पहले भी 2018-19 में भारत के खिलाफ टैरिफ युद्ध छेड़ा था, जिसका जवाब भारत ने अमेरिकी उत्पादों पर जवाबी टैरिफ लगाकर दिया था। इस टैरिफ की धमकी से भारत की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ सकता है। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि 2025-26 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 40 बेसिस पॉइंट तक कम हो सकती है। खासकर स्मार्टफोन, टेक्सटाइल, और फार्मास्यूटिकल्स जैसे क्षेत्र, जो अमेरिकी बाजार पर निर्भर हैं, सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। भारत का अमेरिका के साथ 2024 में 190 बिलियन डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार था, जिसमें भारत को 40 बिलियन डॉलर का अधिशेष प्राप्त हुआ। ट्रंप इस अधिशेष को “अनुचित” मानते हैं और इसे कम करने के लिए दबाव बना रहे हैं।
भारत सरकार ने इस धमकी का जवाब देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा, “हम अमेरिका के साथ निष्पक्ष और पारस्परिक व्यापार समझौता चाहते हैं। भारत अपने किसानों, उद्यमियों, और एमएसएमई के हितों की रक्षा करेगा।” सरकार ने उच्च स्तरीय बैठक बुलाई है, जिसमें जवाबी टैरिफ और विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में शिकायत दर्ज करने जैसे विकल्पों पर विचार हो रहा है। विदेश मंत्रालय ने भी कहा कि भारत रूस के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को बनाए रखेगा, क्योंकि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और ऊर्जा जरूरतों के लिए जरूरी है।ट्रंप का यह रवैया भारत के लिए नया नहीं है। 2019 में उन्होंने भारत को “टैरिफ किंग” कहकर तंज कसा था और जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज (जीएसपी) से भारत को बाहर कर दिया था। इसके बावजूद, प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप के साथ व्यक्तिगत तौर पर अच्छे संबंध बनाए रखे। 2019 में ह्यूस्टन के “हाउडी मोदी” और 2020 में अहमदाबाद के “नमस्ते ट्रंप” जैसे आयोजनों में दोनों नेताओं की दोस्ती की खूब चर्चा हुई। लेकिन ट्रंप की नीतियाँ भारत के प्रति हमेशा ठंडी रहीं। वह भारत को एक उभरती शक्ति के रूप में देखने की बजाय, अपने “अमेरिका फर्स्ट” एजेंडे के तहत दबाव बनाने की रणनीति अपनाते हैं।इस घटना ने भारत में उन कट्टरपंथी समूहों को भी झकझोरा है, जो अमेरिका को एंटी-मुस्लिम नीतियों के कारण अपना “आदर्श” मानते हैं और उसे इजरायल के साथ मिलकर भारत का “संरक्षक” समझते हैं। ट्रंप का यह कदम साफ करता है कि अमेरिका अपने आर्थिक हितों को हर रिश्ते से ऊपर रखता है। ऐसे में, भारत को दोष देने और उसकी पीठ में छुरा भोंकने वाले देश को “दोस्त” मानना कितना उचित है? यह सवाल उन लोगों के लिए है, जो अमेरिका की हर नीति का अंध समर्थन करते हैं।
इस खबर ने भारत के शेयर बाजार को भी प्रभावित किया। 31 जुलाई को सेंसेक्स 800 अंक गिरकर 81,500 पर बंद हुआ, और निफ्टी 250 अंक लुढ़ककर 24,700 पर आ गया। टाटा स्टील, रिलायंस इंडस्ट्रीज, और इन्फोसिस जैसे शेयरों में 2-3% की गिरावट दर्ज की गई। विश्लेषकों का कहना है कि अगर टैरिफ लागू हुआ, तो भारतीय निर्यातकों को 10 बिलियन डॉलर का नुकसान हो सकता है। भारत के सामने अब कई विकल्प हैं। वह डब्ल्यूटीओ में अमेरिका के खिलाफ शिकायत दर्ज कर सकता है, जवाबी टैरिफ लगा सकता है, या कूटनीतिक बातचीत के जरिए समझौता कर सकता है। लेकिन ट्रंप की अप्रत्याशित नीतियों को देखते हुए, भारत को अपनी आर्थिक संप्रभुता और रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करने की जरूरत है। यह समय है कि भारत अपने हितों को प्राथमिकता दे और उन “दोस्तों” पर भरोसा करने से बचे, जो मौका पड़ने पर पीठ दिखा देते हैं।



