HomeArticleसत्य को दबाने की साजिश में चलते हुए क़लम, कश्मीर की एकता...

सत्य को दबाने की साजिश में चलते हुए क़लम, कश्मीर की एकता तथाकथित पत्रकारों को नहीं हो रही हज़म

नोट
अगर आप हमारे पोर्टल की खबरों को पढ़ना पसंद करते हैं और आपको लगता है कि इस पोर्टल पर सच्चाई लिखी जा रही है तो आप लोग मेरी सहायता के लिए रोज एक या दो रुपए मेरे द्वारा दिए है इस QR CODE के माध्यम से दे सकते है।
मैं यह चाहता हूं कि मेरे पोर्टल, यूट्यूब चैनल और हिंदी समाचार पत्र न्याय स्रोत के कुछ खर्च आप लोगों की मदद द्वारा पूर्ण हो जाए ।

ज़की भारतीय

आज का दौर पत्रकारिता के लिए एक कठिन दौर है। वह पत्रकारिता, जो कभी समाज का दर्पण थी, सच का आलमबरदार थी, आज धार्मिक उन्माद और सत्ता की गोद में बैठकर अपनी विश्वसनीयता खो रही है। कुछ पत्रकारों ने अपनी कलम को धर्म के लिबास में लपेट लिया है, तो कुछ ने सत्ता के सामने नतमस्तक होकर सच को झूठ और झूठ को सच बनाने का नाकाम प्रयास किया है। यह लेख उस दर्द को बयां करता है, जो एक सच्चा पत्रकार, एक सच्चा भारतीय, देश में बढ़ती नफरत और बंटवारे की साजिश को देखकर महसूस करता है। साथ ही, यह कश्मीर की उस एकता की मिसाल को सामने लाता है, जिसे कुछ कथित पत्रकार और गोदी मीडिया दबाने की कोशिश कर रहे हैं।

पत्रकारिता या धार्मिक उन्माद का खेल?

पत्रकारिता का मूल धर्म है सत्य को उजागर करना, चाहे वह सत्य किसी के भी खिलाफ हो। लेकिन आज कुछ पत्रकार, जो खुद को पत्रकार कहते हैं, धर्म के आधार पर पक्षपात करते हैं। अगर कोई पत्रकार किसी मुस्लिम व्यक्ति को आतंकवादी कहता है, तो मुस्लिम पत्रकार को यह बात बुरी लगती है। ठीक उसी तरह, कुछ हिंदू पत्रकार हिंदुओं के खिलाफ सही बात भी सुनने को तैयार नहीं। यह पक्षपात जहां पत्रकारिता को खोखला कर रही है, वहीं देश के भविष्य के लिए खतरा पैदा कर रही है। एक मित्र, जो उत्तर प्रदेश के हैं और एक पत्रकारिता से जुड़े ग्रुप के संचालक हैं, उनके ग्रुप में मैंने कई वर्षों तक सामान्य खबरें साझा कीं। जब तक खबरें सामान्य थीं, कोई टिप्पणी नहीं होती थी। लेकिन जैसे ही मैंने देश में बढ़ती अराजकता, नफरत और फासीवादी ताकतों के खिलाफ सत्य लिखना शुरू किया, एक कथित पत्रकार ने मेरी सत्य पर आधारित खबर को निशाना बनाया। यह वही व्यक्ति था, जिसने पत्रकारिता का चोला ओढ़कर धर्म का लिबास पहन लिया था। मैं उसका नाम उजागर नहीं करूंगा, क्योंकि मेरी लड़ाई व्यक्ति से नहीं, उस मानसिकता से है, जो सत्य को दबाती है।पत्रकारिता की परिभाषा सत्य को सामने लाना है, न कि किसी समुदाय, धर्म या व्यक्ति को निशाना बनाना। मेरी हर खबर सत्य पर आधारित होती है। मैं न तो किसी समुदाय के खिलाफ लिखता हूं, न ही किसी की आवाज दबाता हूं। अगर कोई गलत है, चाहे वह मेरा भाई हो, कोई मुस्लिम, हिंदू, क्रिश्चियन या किसी और धर्म का, मैं उसे गलत कहूंगा। यही पत्रकारिता का धर्म है।

गोदी मीडिया और सनसनी का बाजार

गोदी मीडिया, जैसा कि पत्रकार रवीश कुमार ने इसे परिभाषित किया, आज सनसनीखेज खबरों और सत्ता के गुणगान का पर्याय बन चुका है। यह मीडिया सत्य को दबाकर धार्मिक उन्माद फैलाने का काम कर रहा है। हिंदू-मुस्लिम के नाम पर रोज नफरत का जहर बोया जाता है, ताकि असल मुद्दों—बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य—से ध्यान हटाया जाए। टीवी चैनलों पर होने वाली डिबेट्स अब पत्रकारिता नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा हैं, जहां किसी एक व्यक्ति या समुदाय को निशाना बनाया जाता है।ऐसे में सवाल उठता है, क्या एंकर बनने से कोई पत्रकार बन जाता है? किसी की आवाज को दबाना, किसी समुदाय को टारगेट करना, या सत्ता के इशारे पर नाचना पत्रकारिता नहीं, बल्कि गोदी मीडिया की पहचान है। यह मीडिया नफरत की आग में घी डाल रहा है, जिससे देश में दुश्मनियां और सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहे हैं।

कश्मीर की जनता द्वारा पेश की गई एकता से नाराज़ हैं देशद्रोही

जब देश में नफरत फैलाने की कोशिशें हो रही हैं, कश्मीर की जनता ने एकता और भाईचारे की ऐसी मिसाल पेश की है, जिसे कोई गोदी मीडिया दबा नहीं सकता। हाल ही में सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हुई, जिसमें पहलगाम के एक युवक को गलत तरीके से पेश किया गया। दावा किया गया कि कश्मीरी घोड़े वालों ने सैलानियों से ज्यादा पैसे वसूले और गोलीबारी की स्थिति में उन्हें छोड़कर भाग गए।

यह खबर पूरी तरह से भ्रामक थी। वास्तविकता इसके ठीक उलट है। कश्मीर में हाल के आतंकी हमलों के दौरान कश्मीरी जनता ने सैलानियों की जान बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाली। कई सैलानियों, जिनमें हिंदू भाई-बहन शामिल थे, ने बताया कि कश्मीरी मुस्लिम परिवारों ने उन्हें अपने घरों में शरण दी, खाना खिलाया, पानी पिलाया, और सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया। एक सैलानी ने कहा, “हम कश्मीरी मुस्लिम भाइयों की मदद को कभी नहीं भूल सकते। अगर वे न होते, तो हमारा क्या हाल होता, पता नहीं।

तथाकथित पत्रकार और कट्टरपंथी संगठन किसी न किसी बहाने हिंदू और मुस्लिम के बीच खाई पैदा करने का मौका तलाशते रहते हैं। वे अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति पर चलना चाहते हैं। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि भारतीय मुस्लिम भी इस देश का अभिन्न हिस्सा है। उनके पूर्वजों ने भी स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया था। आज जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव की स्थिति है, भारतीय मुस्लिम सड़कों पर ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ के नारे लगा रहे हैं। कश्मीर में मारे गए बेकसूर लोगों के लिए जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे हैं, कैंडल मार्च निकाले जा रहे हैं, और पाकिस्तान के खिलाफ नारेबाजी हो रही है। यह भारत की एकता का प्रतीक है।यह धारणा गलत है कि पाकिस्तान में मुस्लिम हैं, इसलिए भारतीय मुस्लिम उनके साथ हैं। भारत के मुस्लिमों के लाखों रिश्तेदार पाकिस्तान में हो सकते हैं, लेकिन अगर भारत पर हमला होता है, तो भारतीय मुस्लिम उसी तरह आगे बढ़कर देश की रक्षा करता है, जैसे कोई हिंदू, सिख या अन्य भारतीय।

भारत में रहने वाला सिर्फ भारतीय है—न हिंदू, न मुस्लिम, न सिख, न ईसाई

हर भारतीय का कर्तव्य है कि जब देश पर मुसीबत आए, तो वह बिना किसी धार्मिक चश्मे के उसका मुकाबला करे।दुख की बात यह है कि कश्मीर में पर्यटकों की जान बचाने वाले उन घोड़े वालों की वीरता को कुछ तथाकथित पत्रकारों और कट्टरपंथी हिंदू संगठनों ने नजरअंदाज कर दिया। एक कश्मीरी युवक, जिसने अपनी जान जोखिम में डालकर सैलानियों को बचाया, उसकी शहादत को इन लोगों ने न तो सराहा, न ही उसे भारतीय के रूप में सम्मान दिया। यह दोहरी मानसिकता भारत को तोड़ने की साजिश का हिस्सा है।इसी तरह, जब सैलानी कश्मीर से वापस लौट रहे थे, तो एयरपोर्ट पर टिकटों की कीमतें आसमान छू रही थीं। 10,000 रुपये का टिकट 70,000 रुपये तक कर दिया गया। यह लूट थी, लेकिन न तो इन तथाकथित पत्रकारों ने, न ही कट्टरपंथी संगठनों ने इसके खिलाफ आवाज उठाई। घोड़े वालों को, जिन्होंने कोई गलती नहीं की, बदनाम किया गया, लेकिन इस लूट के खिलाफ एक शब्द नहीं बोला गया। यह कैसी पत्रकारिता है? यह कैसी मानसिकता है? सौभाग्य से, कुछ सच्चे पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस मुद्दे को उठाया, जिसके बाद सरकार के हस्तक्षेप से टिकटों की कीमतें सामान्य की गईं।ऐसे में, कुछ कथित पत्रकार और सोशल मीडिया पर भ्रामक खबरें फैलाने वाले लोग कश्मीर की इस एकता को खंडित करने की कोशिश कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि कश्मीरी मुस्लिमों को बदनाम किया जाए, ताकि हिंदू-मुस्लिम के बीच नफरत की खाई और गहरी हो। लेकिन सत्य को दबाया नहीं जा सकता। कश्मीर की जनता ने दिखाया है कि इंसानियत धर्म से ऊपर है।

सत्य की जीत होगी

पत्रकारिता का धर्म सत्य को सामने लाना है, न कि नफरत फैलाना। हमें ऐसी पत्रकारिता को नकारना होगा, जो गोदी मीडिया बनकर सत्ता की कठपुतली बन चुकी है। हमें कश्मीर की एकता से सीख लेनी होगी, जहां हिंदू-मुस्लिम एक-दूसरे के लिए जान देने को तैयार हैं। यह वही भारत है, जिसे पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, सुभाष चंद्र बोस और मौलाना आजाद ने देखा था।मेरा कलम हमेशा सत्य के लिए चलेगा। चाहे कोई कितनी भी कोशिश कर ले, सत्य को दबाया नहीं जा सकता। मैं उन लोगों का शुक्रिया अदा करता हूं, जो मेरी खबरों को पढ़ते हैं, सराहते हैं, और कहते हैं, “ज़की भाई, आपने सत्य लिखा।” यह आपका प्यार और समर्थन ही है, जो मुझे और मजबूत करता है।आइए, हम सब मिलकर नफरत फैलाने वालों के खिलाफ एकजुट हों। आइए, कश्मीर की एकता को सलाम करें और भारत को वही प्यार, भाईचारा और अखंडता का देश बनाए रखें, जिसका सपना हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Must Read