
लखनऊ,21 मई। भारतीय सेना की वरिष्ठ अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी के खिलाफ मध्य प्रदेश के कैबिनेट मंत्री विजय शाह की कथित अपमानजनक टिप्पणी ने न केवल सैन्य बलों की गरिमा पर सवाल उठाया, बल्कि लैंगिक समानता, राजनैतिक जवाबदेही, और सामाजिक न्याय के मुद्दों को भी उजागर किया है। इस घटना ने सुप्रीम कोर्ट और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के हस्तक्षेप, विशेष जांच दल (एसआईटी) के गठन, और महिला संगठनों की तीव्र प्रतिक्रिया को प्रेरित किया है। हालांकि, राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की इस मामले में चुप्पी और एक अन्य मामले में त्वरित कार्रवाई ने दोहरे मापदंडों के गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यह खबर कुरैशी प्रकरण के विभिन्न पहलुओं, खासकर NCW की निष्क्रियता और प्रोफेसर खान के मामले से तुलना करते हुए, इसके सामाजिक और राजनैतिक प्रभावों का विश्लेषण करती है।
प्रकरण की पृष्ठभूमि: कर्नल कुरैशी और विजय शाह का बयानकर्नल सोफिया कुरैशी ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर भारतीय सेना की कार्रवाई के बारे में प्रेस को संबोधित कर देश का गौरव बढ़ाया। उनकी इस भूमिका ने उन्हें नारी शक्ति और सैन्य साहस का प्रतीक बनाया। लेकिन 14 मई 2025 को खंडवा में एक सार्वजनिक सभा में, मंत्री विजय शाह ने कथित तौर पर कहा, “जिन लोगों ने हमारे बहनों के सिंदूर उजाड़े, हमने उनकी बहन को भेजकर ऐसी की तैसी करवाई।” इस टिप्पणी को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने “गटर की भाषा” और “खतरनाक” करार दिया, क्योंकि यह न केवल कुरैशी का अपमान करती थी, बल्कि धार्मिक आधार पर भेदभाव को भी बढ़ावा देती थी।
हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए 14 मई को पुलिस को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 152, 196(1)(b), और 197(1)(c) के तहत विजय शाह के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया। कोर्ट ने पुलिस की प्रारंभिक निष्क्रियता पर नाराजगी जताई और जांच की निगरानी का फैसला किया।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख
19 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप किया। जस्टिस सूर्यकांत और एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने विजय शाह की माफी को “मगरमच्छ के आंसू” और “अपर्याप्त” करार दिया। कोर्ट ने कहा, “आप एक अनुभवी राजनेता हैं। आपके शब्दों में संयम होना चाहिए। यह बयान पूरे देश को शर्मसार करता है।” सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के डीजीपी को 20 मई तक तीन सदस्यीय एसआईटी गठित करने का आदेश दिया, जिसमें मध्य प्रदेश के बाहर के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी और एक महिला अधिकारी शामिल हों। कोर्ट ने शाह की गिरफ्तारी पर रोक लगाई, लेकिन उन्हें जांच में सहयोग करने का निर्देश दिया। अगली सुनवाई 28 मई को निर्धारित है।
राष्ट्रीय महिला आयोग की चुप्पी: दोहरा मापदंड?
इस प्रकरण में NCW की निष्क्रियता ने सामाजिक और राजनैतिक हलकों में तीव्र आलोचना को जन्म दिया है। विभिन्न महिला संगठनों, जैसे ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वीमेन एसोसिएशन (AIDWA) और नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वीमेन (NFIW), ने NCW पर सवाल उठाए कि वह इस मामले में चुप क्यों है। संगठनों ने एक अन्य मामले का हवाला दिया, जिसमें एक प्रोफेसर के खिलाफ कथित अपमानजनक टिप्पणी के लिए NCW ने तुरंत पत्र लिखकर उनकी गिरफ्तारी की मांग की थी। इस मामले में प्रोफेसर को गिरफ्तार किया गया, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें निर्दोष ठहराते हुए जमानत दे दी, क्योंकि कोई ठोस सबूत नहीं मिले।इस तुलना ने NCW की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। AIDWA की नेता मालिनी भट्टाचार्य ने कहा, “जब एक प्रोफेसर के खिलाफ NCW तुरंत कार्रवाई कर सकती है, तो एक कैबिनेट मंत्री के खिलाफ उसकी चुप्पी क्या दर्शाती है? क्या यह बीजेपी नेताओं को संरक्षण देने की नीति का हिस्सा है?” संगठनों ने आरोप लगाया कि NCW ने प्रोफेसर खान के मामले में त्वरित कार्रवाई कर अपनी सक्रियता दिखाई, लेकिन विजय शाह जैसे प्रभावशाली राजनेता के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया। यह दोहरा रवैया लैंगिक समानता और जवाबदेही के लिए खतरा है।
महिला संगठनों का आक्रोश
16 मई 2025 को सपा महिला सभा और कांग्रेस ने बिजनौर और गाजियाबाद में प्रदर्शन कर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को ज्ञापन सौंपा, जिसमें विजय शाह की बर्खास्तगी और गिरफ्तारी की मांग की गई। सपा ने इसे “नारी विरोधी सोच” का प्रतीक बताया, जबकि कांग्रेस ने कहा, “यह टिप्पणी देश की हर महिला और सशस्त्र बलों का अपमान है।” संगठनों ने NCW से इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप की मांग की, लेकिन आयोग की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। यह चुप्पी उन संगठनों के लिए निराशाजनक रही, जो लैंगिक न्याय के लिए संघर्ष कर रहे हैं।सामाजिक और राजनैतिक प्रभावविजय शाह की टिप्पणी ने कई स्तरों पर बहस छेड़ी है। पहला, यह सैन्य बलों के सम्मान का सवाल है। कर्नल कुरैशी जैसी अधिकारी, जो देश की सुरक्षा के लिए जोखिम उठाती हैं, उनके खिलाफ ऐसी टिप्पणी सैन्य मनोबल को प्रभावित कर सकती है। दूसरा, यह लैंगिक समानता का मुद्दा है। NCRB की 2022 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में 4% की वृद्धि हुई, और प्रति लाख जनसंख्या पर 66.4 मामले दर्ज किए गए। ऐसे में एक मंत्री की टिप्पणी नारी सम्मान के लिए चुनौती है। तीसरा, शाह की टिप्पणी को धार्मिक आधार पर भेदभाव बढ़ाने वाला माना गया, जो भारत की बहुलवादी संस्कृति के लिए खतरा है।NCW की चुप्पी ने यह सवाल उठाया कि क्या प्रभावशाली राजनेताओं को विशेष संरक्षण मिलता है? प्रोफेसर खान के मामले में त्वरित कार्रवाई और सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनकी जमानत ने दिखाया कि जल्दबाजी में की गई कार्रवाई गलत हो सकती है। लेकिन शाह के मामले में NCW की निष्क्रियता ने इस धारणा को बल दिया कि कुछ लोग कानून से ऊपर हैं।
कर्नल सोफिया कुरैशी प्रकरण भारत में लैंगिक समानता, राजनैतिक जवाबदेही, और सामाजिक न्याय की लड़ाई का प्रतीक बन गया है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट का कड़ा रुख इस मामले में न्याय की उम्मीद जगाता है, लेकिन NCW की चुप्पी और दोहरे मापदंडों ने संस्थागत विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं। यह प्रकरण न केवल एक टिप्पणी का मामला है, बल्कि देश के मूल्यों और एकता की परीक्षा है।



