HomeArticleदलित उत्पीड़न की घटनाओं पर मायावती की खामोशी पर सवाल

दलित उत्पीड़न की घटनाओं पर मायावती की खामोशी पर सवाल

ज़की भारतीय

लखनऊ, 10 अक्टूबर। उत्तर प्रदेश में दलितों पर लगातार हो रहे अत्याचारों के बीच बहुजन समाज पार्टी (BSP) की सुप्रीमो मायावती की चुप्पी ने दलित समाज में गहरी निराशा पैदा कर दी है। कांशीराम जी की पुण्यतिथि पर 9 अक्टूबर को लखनऊ के कांशीराम स्मारक पर हुई विशाल रैली में मायावती ने समाजवादी पार्टी (SP) और कांग्रेस पर तीखे प्रहार किए, लेकिन BJP सरकार के खिलाफ कोई आक्रामक बयान नहीं दिया। बल्कि, उन्होंने योगी सरकार की सराहना की कि स्मारक के रखरखाव के लिए टिकट राजस्व का सही उपयोग किया गया।
यह चुप्पी तब और सवाल पैदा करती है जब राज्य में दलितों पर हमले बढ़ रहे हैं। NCRB डेटा के मुताबिक, 2024 में UP में दलित अत्याचार के 20% से ज्यादा केस दर्ज हुए।

मायावती की यह रणनीति राजनीतिक सौदेबाजी या ब्लैकमेल की अटकलों को हवा दे रही है, खासकर जब BSP का वोट शेयर 2024 में 9.39% तक गिर चुका है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और पोस्ट्स से संकेत मिलते हैं कि रैली में सरकारी संसाधनों (जैसे UP रोडवेज बसों की निशुल्क सुविधा) का इस्तेमाल हुआ, और कुछ BJP वाहनों पर BSP का नीला झंडा लहराया।
दलित वोटरों का एक हिस्सा PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) की ओर खिसक रहा है, जो बिहार चुनावों में समीकरण बदल सकता है।

अंबेडकर जी के संविधान निर्माण से लेकर कांशीराम जी के प्लेटफॉर्म तक, दलित उत्थान की लड़ाई में मायावती ने मजबूत छवि बनाई थी। लेकिन अब उनकी नरमी से लगता है कि वे दलित हितों से ज्यादा अपनी पार्टी की अस्तित्व रक्षा पर फोकस कर रही हैं।

यह बसपा की रैली नहीं, बीजेपी की रैली थी

SP नेता अखिलेश यादव ने इसे “अंदरूनी साठगांठ” कहा, जबकि कांग्रेस ने BSP को “दलितों का गद्दार” करार दिया। पूर्व BSP नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने भी इस चुप्पी पर तंज कसते हुए कहा कि “यह बसपा की रैली नहीं, बीजेपी की रैली थी”। सिद्दीकी, जो 2017 में BSP से निष्कासित हो चुके हैं, ने रैली को BJP के साथ साठगांठ का प्रमाण बताते हुए कहा कि यह दलित आंदोलन की मौत का संकेत है।
दलित समाज, जो मायावती को अंबेडकर-कांशीराम की तरह सम्मान देता है, अब सवाल कर रहा है: क्या यह खामोशी BJP से गठजोड़ या ED-CBI दबाव का नतीजा है?

2027 UP चुनावों से पहले यह चुप्पी BSP के लिए घातक साबित हो सकती है

2024 से 2025 तक हुई प्रमुख दलित उत्पीड़न घटनाएं पर जहां अन्य पार्टियों (SP, कांग्रेस) ने विरोध दर्ज कराया, लेकिन मायावती का कोई स्पष्ट या आक्रामक बयान नहीं आया। ये NCRB और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित हैं:

जुलाई 2024, श्रावस्ती (UP): 15 साल के दलित लड़के को ऊपरी जाति के युवकों ने जबरन मूत्र पिलाया। SC/ST एक्ट के तहत केस दर्ज, कांग्रेस ने “जंगल राज” कहा, लेकिन मायावती मौन।

जुलाई 2024, मुजफ्फरनगर (UP): दलित दूल्हे को घोड़ी चढ़ने पर ऊपरी जाति वालों ने पीटा, मेहमान घायल। वीडियो वायरल, SP ने सरकार को घेरा, लेकिन मायावती की चुप्पी।

जुलाई 2024, बरेली (UP): दलित नाबालिग छात्र को स्कूल टीचर ने फल तोड़ने से मना करने पर बुरी तरह पीटा। SP ने शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए, मायावती ने कोई टिप्पणी नहीं की।

जुलाई 2024, बांदा (UP): 36 साल की दलित महिला को किसान और उसके बेटे ने पानी लेने पर जातिसूचक गालियां देकर पीटा। कांग्रेस ने महिलाओं पर हिंसा का मुद्दा उठाया, लेकिन मायावती शांत रहीं।

सितंबर 2024, बरेली (UP): दलित लड़की का अपहरण कर व्यापारी के बेटे ने बलात्कार किया। SP ने न्याय की मांग की, मायावती का कोई बयान नहीं।

अक्टूबर 2024, रायबरेली (UP): दलित युवक को BJP समर्थकों ने कथित तौर पर घंटों पीट-पीटकर मार डाला। कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने मायावती से सवाल किया, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं।

अक्टूबर 2025, CJI BR गवई पर जूता फेंकना: दलित CJI पर वकील ने कोर्ट में जूता फेंका। SP, कांग्रेस, AAP ने निंदा की, मायावती ने हल्का “शर्मनाक” कहा लेकिन दलित न्यायपालिका पर कोई फोकस नहीं।
ये घटनाएं दिखाती हैं कि मायावती की चुप्पी दलित वोटरों को अलग-थलग कर रही है, जबकि चंद्रशेखर आजाद जैसे नए चेहरे उभर रहे हैं। दलित समाज को अब मजबूत आवाज चुननी होगी—क्या BSP फिर से संभलेगी, या PDA जैसी नई लहर चलेगी?

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Must Read